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सरकार का स्वाभिमान, देना नहीं पाना सम्मान

सार

सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन और न्याय की कथाएं हमारी विरासत हैं. विरासत इतिहास है लेकिन सुशासन और न्याय की जरूरत सनातन है..!!

janmat

विस्तार

    इतिहास से सबक लेकर अगर सुशासन के वर्तमान कथानक को मंचित किया जाएगा तब हर नागरिक अपनी भूमिका निभाएगा. फिर विरासत की जानकारी देने कलाकारों द्वारा मंचित महानाट्य की खास भूमिका नहीं होगी. एमपी सरकार राज्य की सीमाओं से बाहर जाकर भी विक्रमादित्य महानाट्य का मंचन करा रही है, उनके नाम पर एक करोड़ रुपए के अंतर्राष्ट्रीय सम्मान की शुरुआत की है. 

    अभी हाल ही में बाबा विश्वनाथ की नगरी में महानाट्य का मंचन किया गया है. इसके पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी इसका मंचन किया गया था. प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र में महानाट्य राज्य सरकार की महत्वपूर्ण सफलता हो सकती है. यूपी और एमपी दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री इस महानाट्य के शुभारंभ अवसर पर उपस्थित थे, इससे ही इसका महत्व समझा जा सकता है.

    सम्राट विक्रमादित्य सप्तपुरी उज्जैयनी के शासक रहे हैं. उनकी विरासत और इतिहास भारतीय शासन प्रणाली का चिंतन है. मध्यप्रदेश सरकार हमेशा से विक्रमादित्य के सुशासन और न्याय को युवाओं तक पहुँचाने का प्रयास करती रही है. मध्यप्रदेश के वर्तमान शासक CM डॉक्टर मोहन यादव उज्जैन के ही जनप्रतिनिधि हैं. इसके पहले उज्जैन के किसी नेता को मध्यप्रदेश सरकार का नेतृत्व करने का मौका नहीं मिला था. जब उन्हें ये अवसर आया है तब से सम्राट विक्रमादित्य की विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास ज्यादा हो रहा है.

    विरासत और संस्कृति पब्लिसिटी के लिए नॉन कंट्रोवर्शियल और प्रोजेक्शन के लिए महत्वपूर्ण हैं. सरकार के प्रयास निश्चित ही सही दिशा में हो सकते हैं लेकिन केवल इतिहास की विरासत पर जिया नहीं जा सकता है. देश का लंबे समय तक शासन संचालन करने वाली पार्टी कांग्रेस की तो विरासत पर ही जीने की शैली है. निश्चित ही इस पार्टी की विरासत चमकदार है लेकिन केवल विरासत पर कोई भी पार्टी अपने वर्तमान को नहीं चमका सकती है. कांग्रेस अपनी विरासत की उपलब्धियों पर नाज़ करती है तो बीजेपी इतिहास में उसकी गलतियों पर राजनीति करती है. 

    मध्यप्रदेश सरकार ने सम्राट विक्रमादित्य सम्मान के नामांकन आमंत्रण में इसकी अवधारणा को बताया है. सरकार का कहना है कि सम्राट मादित्य विक्रमादित्य के बहुविध गुणों- न्याय, दानशीलता, सुशासन, खगोल एवं ज्योतिष विज्ञान, कला, शौर्य राजनय, आध्यात्म, युग निर्माण, विश्व मानव कल्याण, समाज अभ्युदय, अंतर्राष्ट्रीय भाईचारा, सर्वधर्म समन्वय, भारतीय संस्कृति के उत्थान, सामाजिक नवोन्मेष, भारतीय दर्शन, धर्म परंपरा, वेदांत के व्यापक प्रचार-प्रसार रचनात्मक एवं जन कल्याणकारी कार्य के क्षेत्र में उपलब्धियों एवं उल्लेखनीय योगदान करने वाले भारत सहित दुनिया भर में सक्रिय साधनारत व्यक्ति, संस्थाओं से नामांकन आमंत्रित हैं. 

    इस सम्मान के जरिए सरकार जिस प्रकार की साधना की अपेक्षा व्यक्तियों और संस्थानों से कर रही है वही अपेक्षा प्रदेश के नागरिक राज्य सरकार से करते हैं. एक शासक के रूप में सम्राट विक्रमादित्य के गुणों की अपेक्षा सभी शासन प्रणालियों से की जाती है. सरकार जिन मापदंडों पर व्यक्तियों और संस्थाओं को इतनी बड़ी रकम का सम्मान देना चाहती हैं वह इतना सम्मानजनक नहीं है जितना की उन मापदंडों पर शासन प्रणाली का काम करना सम्मान और स्वाभिमान का विषय है.

    अगर कोई व्यक्ति और संस्था सम्राट विक्रमादित्य के बहुमूल्य गुणों पर काम कर सकती है तो फिर राज्य सरकार तो निश्चित रूप से उस दिशा में बेहतर काम कर सकती है. राज्य सरकार के लिए यह सम्मान देने से ज्यादा महत्वपूर्ण सम्मान हासिल करना है. सुशासन और न्याय का इतिहास जानकर भी कोई संतुष्ट नहीं हो सकता, वर्तमान व्यवस्था का अनुभव ही उसकी चेतना बनेगी. उस पर विरासत का उतना असर नहीं हो सकता, अगर विरासत के उदाहरण वर्तमान प्रणाली में क्रियान्वित होंगे तो निश्चित रूप से बिना किसी महानाट्य के सुशासन का डंका बजता दिखाई पड़ेगा.

    सुशासन और न्याय का बुनियादी सिद्धांत है कि जो भी जन धन खर्च हो रहा है वह कितना जनहित में उपयोगी है? विरासत और संस्कृति जीवन में सब कुछ नहीं हो सकती. राज्य सरकार का मूल दायित्व जनकल्याण और विकास ही है. विरासत और संस्कृति उसका महत्वपूर्ण पक्ष है लेकिन केवल इसी पक्ष पर ही सर्वाधिक फोकस शासन प्रणाली की भूमिका नहीं हो सकती है.

    इस सम्मान के पक्ष में जिस तरह धीर-गंभीर शब्द दिए गए हैं वह किसी की सोच में तो हो सकते हैं लेकिन व्यावहारिक रूप में उनका रोल दिखता नहीं है. फिल्म, नाट्य, विरासत और संस्कृति के उजले पक्ष युवाओं में जानकारी बढ़ा सकते हैं लेकिन उससे शासन प्रणालियों को नहीं बदला जा सकता है.

    जन समस्याओं का अंबार है. आये दिन कुशासन और करप्शन की खबरें सार्वजनिक होती हैं. शासन प्रणाली दायित्व के निर्वहन से भागने में लगी रहती है. जवाबदेही को कोई तैयार नहीं होता. भोपाल का ही उदाहरण लिया जाय तो बड़े तालाब में अतिक्रमण के मामले स्थापित होने के बाद भी सरकारी तंत्र उन्हें हटाने में सफल नहीं हो पाता है. गवर्नेंस के विषय के समाधान में सरकारें सफल नहीं हो पाती है. सरकारों के वित्तीय प्रबंधन कर्जों पर सीमित हो गए हैं. केवल खातों में नगद देकर चुनावी जीत से सुशासन की कल्पना तो नहीं की जा सकती है.

    सम्राट विक्रमादित्य की विरासत पर महानाट्य, अंतर्राष्ट्रीय सम्मान जरूरी हो सकते हैं लेकिन अगर वर्तमान शासन प्रणाली के कथानक निर्धारित करने में विरासत से सबक अगर सुशासन लाने में एक सीमा तक भी सफल हो जाए तो फिर पूरा प्रदेश खुलकर नृत्य करेगा. लोग सम्राट विक्रमादित्य के महानाट्य और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान से खुश हो सकते हैं लेकिन अगर सुशासन से ऐसा सम्मान वर्तमान शासन प्रणाली को मिले तो फिर खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहेगा.

    अगर राज्य में सम्राट विक्रमादित्य जिसा शासन दिखने लगेगा तो फिर महानाट्य और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान अपने उद्देश्यों में सफल हो जायेंगे. हर नागरिक यही सोचता और चाहता है कि राज्य में विक्रमादित्य जैसा शासन न केवल कहा जाए बल्कि पूरा करके दिखाया जाए.