मध्य प्रदेश के वन इसका सबसे बड़ा धन हैं. सरकारों का मन इस धन को बचाने से ज्यादा लुटाने में लगा रहता है. अवैध रेत खनन तो राजनीति का खुला धंधा बन गया है. रेत माफिया नेटवर्क और राजनीति का रिश्ता बंद आंखों से भी दिखाई पड़ता है..!!
हर दिन राज्य के किसी कोने में जल-जंगल-जमीन पर इल्लीगल माइनिंग आम बात है. इस माफिया का इतना भय है, कि सामान्यतः इनकी रक्षा और सुरक्षा के लिए लगा अमला या तो डरकर पीछे हट जाता है या माफिया के साथ मिल जाता है. जहां वनकर्मी अपने कर्तव्य की ताकत पर तनकर खड़ा हो जाता है, वहां उसे अपनी जान गंवानी पड़ती है. वन विभाग अकेला ऐसा विभाग है, जिसको राज्य की लगभग एकतिहाई भूमि पर आरक्षित जंगल की सुरक्षा करना है लेकिन उसकी सुरक्षा के लिए कोई प्रभावकारी कानून नहीं है. उसे माफिया का मुकाबला डंडे से करना पड़ता है. ना उसके पास हथियार है ना ही कानूनी संरक्षण.
मुरैना जिला तो रेत माफिया का स्वर्ग जैसा है. चंबल में आने वाले इस जिले के माफिया बीहड़ों के खूंखार डाकुओं के इतिहास को दोहरा रहे हैं. रेत माफिया ने वनरक्षक हरिकेश गुर्जर की हत्या कर दी. इसके पहले भी ऐसी घटनाएं होती रही हैं. इस जिले के माफिया ने तो आईपीएस अफसर की भी हत्या कर दी थी. रेत माफिया ही वहां की राजनीति को कंट्रोल और फाइनेंस करता है. जन प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारियों को इस माफिया नेटवर्क की न केवल पूरी जानकारी होती है बल्कि उसकी सहमति और सहयोग से ही यह धंधा फलता फूलता है.
शासन संचालन सूत्रों और माफिया के बीच गठजोड़ जिस तरह से बढ़ता जा रहा है, उससे माफिया का भय भी बढ़ रहा है. कोई भी नदी ऐसी नहीं बची है, जो रेत माफिया के चलते अपने अस्तित्व के संकट से ना गुजर रही हो. जंगल बर्बाद हो रहे हैं. जंगलों की रक्षा की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन सरकार का सबसे नेगलेक्ट कोई विभाग दिखाई पड़ता है तो वह वन विभाग ही है. उस पर कंट्रोल आईएएस जमाए रखना चाहते हैं.
जंगलों का उपयोग अब केवल राजनीतिक लाभ के लिए ज्यादा हो रहा है. लघु वनोपज हों या जलाऊ लकड़ी वन उत्पादों पर मतदाताओं को रिझाया जाता है. ट्राइबल और जंगल एक दूसरे के पूरक हैं. राजनीति के चलते वनभूमि पर कब्जे किए जाते हैं. पेड़ों की कटाई तो जंगलों की सांस रोकने तक पहुंचती जा रही है. ट्राइबल पॉपुलेशन का वोट बैंक के रूप में उपयोग करने के लिए जंगलों को कुर्बान करने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है. वन्य प्राणियों पर संकट भी इसी तरह की गलत नीतियों का नतीजा है.
प्रशासन को भी पता है और सरकारों में उच्च स्तरों तक सबको पता है, कि किस जिले में कौन माफिया है. ज्यादातर केसेस में हिस्सेदारी होना चालू हो जाती है. जिलों में राजनीतिक दलों के बीच विवाद भी रेत माफिया पर कब्जे का होता है. अधिकांश माफिया सरकारी संरक्षण के साथ ही चलने की कोशिश करता है. बिना इसके तो कोई माफिया चल ही नहीं सकता है. लीगल माइनिंग के लिए बाकायदा सरकार में विभाग काम करता है.
माइनिंग कॉरपोरेशन काम करता है, लेकिन लीगल से ज्यादा इल्लीगल माइनिंग लाभ का धंधा बनी हुई है. कानून के मुताबिक जिन भी कर्मचारी और अधिकारियों पर इल्लीगल माइनिंग को रोकने का दायित्व है, अगर वह कानून का पालन करते हुए तनकर खड़ा हो जाता है तो फिर उसका वही हश्र होता है जो मुरैना में वनरक्षक के साथ हुआ है. ऐसी घटनाएं कई बार माफिया डर को पैदा करने के लिए भी करता है. सवाल यह है, कि जल-जंगल-जमीन पर माफिया का प्रभुत्व क्या कभी कम हो सकेगा. राजनीति का अपराधीकरण ऐसे ही छोटे-छोटे रेत और माइनिंग माफिया से ही शुरु होता है .
राज्य में अवैध उत्खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता व्यक्त की है. अवैध रेत से भरे ट्रक पुलिस थानों के बगल से गुजरते हैं और प्रशासन चुपचाप माफिया की दहशत में सब कुछ देखता रहता है.
वनकर्मियों को सुरक्षा और उन्हें हथियार देने पर जहां सरकार आंखें मूंदे हुए हैं, वहीं भारतीय वन कानून के प्रावधानों में भी अनेक कमजोरियां हैं. जो भी प्रावधान हैं, वह अपराधियों के पक्ष में झुके हुए लगते हैं. कटाई और परिवहन से अगर लकड़ी एकत्रित की गई है तो उस पर कब्जे का अधिकार वन अमले को वर्तमान कानून में नहीं है. वन भूमि पर पेड़ काटना या खनन करना तो अपराध है लेकिन अगर वहां से प्राप्त सामग्री कहीं एकत्रित रखी गई है तो वह अपराध नहीं मानी जाती है.
जल-जंगल-जमीन खुली संपत्ति है, सरकारी संपत्ति है. इसकी सुरक्षा और रक्षा के लिए सबसे कड़े कानून की आवश्यकता होती है. दुर्भाग्य यह है कि इसी फील्ड में सबसे लचर कानून है. पर्याप्त कानूनी समर्थन के बिना वन संसाधनों का प्रभावी संरक्षण करना लगभग असंभव है. वन क्षेत्र के भीतर वन अधिकारियों को सीमित पुलिस और मजिस्ट्रेटीय शक्तियां देने पर विचार होना चाहिए. राजनीतिक इच्छा शक्ति के बिना जल-जंगल-जमीन को बचाए रखना लंबे समय तक संभव नहीं लगता है. पर्यावरण को हो रहा नुकसान मानव जीवन पर संकट पैदा कर रहा है. शहरी क्षेत्र में प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक है. नदियों का प्रदूषण जानलेवा स्तर तक बढ़ गया है.
हर राजनीतिक दल और हर सरकार इसके लिए कागजी अभियान चलाती है, लेकिन जमीन पर कुछ सुधार होने की बजाय स्थितियां बिगड़ती ही जा रही हैं. अपने कर्तव्य पर बलिदान होने वाले वन संरक्षक को शहीद का दर्जा दिया जाना चाहिए. वनों से हमारा जीवन है. इसे केवल सरकारी नौकरी से संरक्षित करने की सोच अब तक असफल होती रही है और आगे भी होगी.
जल-जंगल-जमीन और माइनिंग का माफिया जब तक राजनीति के फाइनेंशियल प्रबंधन का जरिया बना रहेगा, तब तक दल या सरकार कोई भी हो बातें कुछ भी हों लेकिन जमीन पर कुछ भी बदलाव की उम्मीद बेमानी होगी.
तन-मन-धन से ज्यादा वन को संरक्षण और महत्व देने से ही जीवन सुरक्षित होगा जंगल सुरक्षित होगा.