विधानसभा चुनाव नामांकन फार्म में आपराधिक रिकॉर्ड छुपाने पर हाईकोर्ट ने प्रदेश के कांग्रेस विधायक का निर्वाचन रद्द कर निकटतम प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया. हालंकि विधायक को सुप्रीम कोर्ट में जाने का मौका भी दिया है..!!
इस तरह विजयपुर उपचुनाव का अंतिम निर्णय सर्वोच्च अदालत में होगा. इस चर्चित उपचुनाव में कांग्रेस से ही बागी हो बीजेपी में शामिल तत्कालीन मंत्री रामनिवास रावत के खिलाफ कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा मैदान में थे. परिणाम कांग्रेस के पक्ष में गया. रावत को मंत्री पद छोड़ना पड़ा. इतने कश्मकश भरे चुनाव में राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का प्रत्याशी नामांकन फार्म में आपराधिक रिकॉर्ड छुपाने का दोषी साबित हो जाए यह प्रत्याशी के साथ ही कांग्रेस पर भी बड़ा सवाल है.
अब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष इसे आदिवासी अस्मिता से जोड़ रहे हैं. जिस उच्च न्यायालय ने ये निर्णय दिया वह तो आदिवासी विरोधी नहीं हो सकती. चुनाव में बीजेपी ने जरुर कांग्रेस को हराया लेकिन अदालत में अपनी गलती से हारने पर अदालत पर ही प्रश्न चिन्ह लगा आदिवासी अस्मिता का दांव कांग्रेस की ही कमजोरी लगती है.
राजनीति का अपराधीकरण बड़े खतरे के रूप में लोकतंत्र को निगल रहा है. पहले तो आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी देने की भी व्यवस्था नहीं थी. राजनीतिक सरकारों ने तो इस पर पहल करना भी उचित नहीं समझा था. भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने लोकतांत्रिक सुधार के लिए चुनाव में आपराधिक रिकॉर्ड उजागर करने को अनिवार्य बनाया. समाचार पत्रों में भी सार्वजनिक रूप से इसकी जानकारी देने की प्रक्रिया निर्धारित की ताकि मतदाता जिसे प्रतिनिधि के रूप में चुनने जा रहे हैं उसका आपराधिक रिकॉर्ड जान सकें?
इस सुप्रीम व्यवस्था से ही लोकसभा और विधानसभाओं में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक हो सके हैं. वर्तमान में 45% विधायकों और 46% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. यह आंकड़े साबित करते हैं कि आपराधिक पृष्ठभूमि चुनाव में मदद करती है. ऐसे भी उदाहरण हैं, जब गंभीर अपराधों में जेलों में बंद लोग भी चुनावी प्रक्रिया का सामना कर जीत जाते हैं.
उच्च अदालत के इस फैसले में जो आपराधिक रिकॉर्ड छुपाया गया है वह कोई बहुत गंभीर अपराध का नहीं है. लेकिन अपराध छोटा हो या बड़ा, क्या लोकतंत्र ऐसे जनप्रतिनिधि को बनाए रखने के बारे में सोच सकता है जो चुनावी प्रक्रिया में ही कानून का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है. चुनाव बाद जिसे जनता के लिए कानून निर्माण की प्रक्रिया में शामिल होना है कम से कम उससे तो यही अपेक्षा की जा सकती है कि वह स्वयं को कानून को लेकर गंभीर हो. संसदीय लोकतंत्र में हिस्सेदारी के लिए अगर वह आगे आ रहा है तो ट्रांसपेरेंसी मेंटेन करनी होगी.
इस मामले में अदालत का फैसला क्योंकि विधानसभा के सदस्यता रद्द करने का है इसलिए संबंधित विधायक और कांग्रेस को दर्द स्वाभाविक है. एक विधायक की हार या जीत से कांग्रेस की सेहत पर फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन अदालत का निर्णय उसके लिए बड़ा सबक है. हर पार्टी में लीगल सेल है. इसके बावजूद नामांकन फॉर्म में इतनी बड़ी गलती की उम्मीद तो नहीं की जा सकती.
चुनाव के पहले आपराधिक रिकार्ड को सार्वजनिक करना अनिवार्यता है, लेकिन चुने जाने के बाद लोकतंत्र के साथ जो अपराध किया जाता है उसे सियासत में दबाने की पूरी कोशिश होती है. सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों के आपराधिक मामलों पर त्वरित निर्णय के लिए विशेष कोर्ट भी स्थापित की है. यह भी प्रावधान महत्वपूर्ण है कि किसी भी आपराधिक मामले में दो साल की सजा पाने वाले व्यक्ति की सदस्यता समाप्त हो जायेगी और चुनाव लड़ने की पात्रता भी नहीं होगी. अगर अदालत से इतना चेक एंड बैलेंस नहीं लगाया गया होता तो फिर राजनीति किस सीमा तक लोकतंत्र को अपने पैरों से कुचलती इसकी कल्पना की जा सकती है.
बिना किसी प्रमाण के आरोप लगाना अपराध की ही श्रेणी में आता है. विधानसभा और संसद को इम्यूनिटी प्राप्त है. वहां कही बात पर कोई भी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. इसका कितना दुरुपयोग होता है यह देश जानता है. संविधान के प्रत्येक अंग पर राजनीतिक आक्षेप लगाना आम बात है.
जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक आचरण अब सामान्य आचरण से मेल नहीं खाते हैं. अगर कोई व्यक्ति तथ्यों के खिलाफ बोलता है, जिससे किसी के सम्मान को ठेस पहुंचती है, तो उसे समाज स्वीकार नहीं करता. राजनीति इसके विपरीत आचरण करती है, अब तो ऐसी प्रवत्ति है कि कौन कितना विभाजनकारी और हल्का काम कर सकता है. लक्ष्य केवल चुनावी जीत की संभावना है. सियासत में इसके लिए दुराचरण भी क्षम्य है.
आपराधिक रिकॉर्ड छुपाना करप्ट प्रैक्टिसेस में शामिल है, किसी ने छुपा लिया तो वह अदालत से जीरो घोषित कर दिया जाएगा लेकिन भले ही कोई अपराधी हो लेकिन जिसने प्रक्रिया का पालन कर आपराधिक रिकॉर्ड बताया है, तो वह सियासत का हीरो भी बन सकता है. देश की संसदीय व्यवस्था में अपराध का रिकॉर्ड सार्वजनिक होने मात्र से किसी सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती. अब इससे आगे बढ़ने की जरूरत है.
गंभीर अपराधों में शामिल व्यक्तियों को चुनाव लड़ने रोका जाना चाहिए. अभी तो यह भी व्यवस्था नहीं है कि किसी भी जांच प्रक्रिया में अगर मंत्री और मुख्यमंत्री जेल चला जाता है तो उसे अपने पद से त्यागपत्र देना जरूरी हो. दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने तो जेल में रहते हुए राज्य सरकार चलाई थी. केंद्र सरकार इस दिशा में एक विधेयक लेकर आई है, जिसमें 30 दिन तक जेल में रहने पर PM-CM और मंत्रियों को अपने पद से हटना होगा. इसका भी राजनीतिक विरोध हो रहा है.
किसी भी ऐसे प्रावधान का दुरुपयोग हो सकता है, लोकतंत्र में तो जनादेश पर ही सरकार बनती है. सरकारें बदलती रहती है केवल प्रावधानों के दुरुपयोग के डर से सही प्रावधान न किया जाए तो यह लोकतंत्र पर ही प्रहार है.