भारत अपने स्वाभिमान, विरासत और गौरव के प्रति कमिटमेंट पर अब झुकने को तैयार नहीं है. देश सनातन संस्कृति के लुटेरों की बुरी स्मृतियों को याद रखते हुए पुनर्निर्माण के सृजन और क्षमता को दुनिया को दिखाने से भी पीछे नहीं है..!!
सोमनाथ मंदिर को मुगलों ने कई बार नष्ट किया. तो भारतीयों ने उसका हर बार निर्माण किया. आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने वर्ष 1951 में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किया. उसी की 75वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है. पीएम नरेंद्र मोदी ने जिस दिव्यता और भव्यता के साथ इस उत्सव को मनाया है, भारतीयों ने उसका दिग्दर्शन किया, यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का अवसर तो है ही, लेकिन इसके पीछे देश की उस राजनीतिक चेतना की भी भूमिका है, जिसकी एकजुटता के कारण देश की राजनीतिक धारा बदल सकी है.
सनातन संस्कृति भारत का मूल तत्व है. आक्रांताओं ने इसी पर सबसे ज्यादा हमला किया. हमारे मंदिर तोड़े, हमारी आस्था पर चोट की, फिर भी हम बार-बार खड़े हुए. राष्ट्रीय स्वाभिमान राष्ट्र की पहचान होती है. आजादी के बाद बनी सबसे पहली सरकार का प्राथमिक दायित्व मुगलों द्वारा नष्ट किए गए सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होना था. सरकार ने यह दायित्व नहीं निभाया. पहले प्रधानमंत्री ने इस बात पर ऐतराज किया कि मंदिर का निर्माण सरकार के द्वारा सरकारी खजाने से कराया जाए. सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण का बीड़ा उठाया.
इसके लिए आस्थावान हिंदुओं ने आर्थिक योगदान दिया. मंदिर बना, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तो इसकी प्राण प्रतिष्ठा में भी शामिल होना मंजूर नहीं किया. उनकी राजनीतिक धारा अभी भी देश में चल रही है. तुष्टीकरण की अवधारणा उसी का प्रतीक है. तब से लेकर अब तक देश की राजनीति में निर्णायक बदलाव आ गया है. अब देश के प्रधानमंत्री को सनातन संस्कृति की आस्था के प्रतीक तीर्थ स्थलों पर विकास और निर्माण कार्य करने में कोई संकोच नहीं है. त्रिपुंड धारण कर शिव की आराधना करने और उसे टीवी चैनलों के माध्यम से पूरे देश में पहुंचाने से प्रधानमंत्री को गौरव की अनुभूति होती है.
सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हो गया. पांच सौ सालों के संघर्ष के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन गया है. काशी में विश्वनाथ लोक तीर्थ यात्रियों को आध्यात्मिक अनुभव दे रहा है. केदारनाथ लोक, महाकाल लोक के साथ ही सनातन और हिंदू आस्था के देश के लगभग सभी तीर्थ स्थलों पर विकास की नई धारा प्रवाहित हो रही है. अब देश में ऐसी राजनीतिक धारा चल रही है, जिसमें सनातन संस्कृति और आस्था के प्रति विश्वास प्रकट करना भारतीयता पर विश्वास के साथ संबद्ध हो गया है. सनातन संस्कृति राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गई है.
देश में 2014 के पहले हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा की छह राज्यों में सरकारें थीं. अब वह बढ़कर बीजेपी और गठबंधन के साथ 23 राज्यों में हो गई हैं. हिंदुत्व की राजनीति की विचारधारा बीजेपी की बुनियादी विचारधारा रही है, लेकिन इसको जनमत में स्थापित करने में इतना समय लगा है. अभी तक क्षेत्र और भाषा के नाम पर हिंदुत्व को अलग-थलग किया जाता था. लेकिन अब इसमें भी बदलाव आ रहा है. पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी की प्रचंड जीत ने यह साबित कर दिया है, कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान, राष्ट्रवाद के साथ जोड़कर राजनीति की जो नई धारा बनी है, उसका वेग लगातार बढ़ता जा रहा है.
सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण की 75वीं वर्षगांठ पर उत्सव की भव्यता पर भी अगर नजर डाली जाए तो बीजेपी और गठबंधन शासित राज्यों में इस उत्सव को एक प्रकार से सरकारी आयोजन बनाया गया है. जिस सोमनाथ मंदिर के निर्माण में उस समय के प्रधानमंत्री सरकारी खजाने से धन खर्च करने पर असहमत थे. इस सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की वर्षगांठ पर मध्य प्रदेश जैसे राज्य में चार दिनों तक लगातार सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए खर्च कर विज्ञापन का प्रचार अभियान संचालित किया गया है.
सनातन संस्कृति और हिंदू आस्था के प्रति राज्य सरकारों में प्रतिस्पर्धा सी चल रही है. कोई भी सरकार पीछे नहीं दिखना चाहती है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो हिंदुत्व के आइकॉन बन गए हैं. उनकी पॉपुलैरिटी को देखते हुए भाजपा राज्य सरकारों के सभी मुख्यमंत्री इस दिशा में कोई कमी नहीं रखना चाहते हैं. हर मुख्यमंत्री अपने गवर्नेंस का मूल तत्व हिंदुत्व रखना चाहता है.
सनातन संस्कृति और गौरव के प्रति भारत और राज्य सरकारों की प्रतिबद्धता राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ गई है. जिस तरह का कमिटमेंट हिंदू आस्था के तीर्थ स्थलों के प्रति दिखाई पड़ रहा है, वैसा ही राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति भी दिखता है. ऑपरेशन सिंदूर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण की वर्षगांठ पर जिस तरह से भारतीय वायुसेना ने एयर शो का प्रदर्शन किया है वह भी भारत की शक्ति को प्रदर्शित कर रहा है.
देश में दो ही राजनीतिक दर्शन चल रहे हैं, हिंदुत्व के दर्शन का वेग इतना तेज है कि अब इसके विरोधी दर्शन को कोई नया मॉडल या दर्शन देने पर ही किसी बदलाव की उम्मीद की जा सकती है. नॉर्थ इंडिया तो हिंदुत्व दर्शन में रचा बसा है. अब बंगाल भी इस धारा में चल पड़ा है. असम ने पहले से ही इसी मार्ग को पकड़ लिया है. अब दक्षिण भारत में भी हिंदुत्व दर्शन अपना बीजा रोपण कर चुका है. केरल तमिलनाडु और तेलंगाना में भविष्य में इस हिंदुत्व के राजनीतिक दर्शन का कड़ा संघर्ष दिखाई पड़ेगा.
सबका साथ सबका विकास सरकार का दर्शन है, लेकिन हिंदुत्व का एकीकरण राष्ट्र का दर्शन है. गवर्नेंस में मूल तत्व हिंदुत्व बनता जा रहा है. हिंदुत्व ही भारत की जीवन पद्धति है. इसलिए सरकार के जीवन की भी यही पद्धति बन रही है.