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मुस्लिम समर्थन की खुशी, हिंदुओं के नकारने का गम

सार

असम के चुनाव नतीजे कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए चौंकाने वाले हैं. भाजपा को तीसरी बार प्रचंड बहुमत चौंका रहा है, तो कांग्रेस का प्रचंड मुस्लिम चेहरा..!!

janmat

विस्तार

    कांग्रेस राज्य में 21 सीटों पर जीती है, जिसमें से 19 विधायक मुसलमान जीते हैं. कांग्रेस को हिंदुओं ने नकार दिया. लेकिन मुस्लिम बहुल सीटों पर उन्हें भरपूर समर्थन मिला है. कांग्रेस का सीएम फेस जो कि सांसद हैं खुद ही अपना विधानसभा चुनाव हार गए.

    असम में मुस्लिम राजनीति करने वाले ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने कहा, कि कांग्रेस मुस्लिम लीग जैसी पार्टी बन गई है. उनका कहना है कांग्रेस अब अपनी राजनीतिक पहचान खो चुकी है. उसका स्वरूप बदल चुका है. उनके अनुसार कांग्रेस अब ऐसी स्थिति में पहुंच गई है, जहां वह मुस्लिम लीग जैसी राजनीति करने वाली पार्टी की तरह व्यवहार कर रही है.

    कांग्रेस ने असम में हिंदू समुदाय से 80 प्रत्याशी उतारे थे. जिनमें से केवल दो ही जीतने में सफल हुए. दूसरी ओर 35 प्रत्याशी मुस्लिम उतारे थे जिनमें 19 चुनाव जीत गए. यह नतीजा यही बता रहा है, कि हिंदू बहुल इलाकों में कांग्रेस को वह समर्थन नहीं मिला जबकि मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस को भरपूर समर्थन मिला. असम ऐसा राज्य बन गया है जहां हिंदू मुस्लिम विभाजन साफ-साफ दिखता है. वहां असमिया मुसलमान और बांग्लादेश से आए मुसलमानों के बीच में भी विभाजन है. 

    असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा हिंदू हृदय सम्राट के रूप में काम करते दिखाई पड़ते हैं. उनकी नीतियों को इस चुनाव में जबरदस्त समर्थन मिला है. पिछले चुनाव से ज्यादा इस बार बीजेपी को सीटें प्राप्त हुई हैं. असम की डेमोग्राफी ऐसी हो गई है कि वहां मुसलमान की तादाद पर्याप्त है. वह कुछ इलाकों में है. उन इलाकों में बीजेपी के जीतने की कोई संभावना नहीं होती, वहां कांग्रेस मजबूत है. तो दूसरी तरफ हिंदू बाहुल्य क्षेत्र बीजेपी के गढ़ बन गए है.     

    राजनीतिक विभाजन की ऐसी स्थिति कांग्रेस की सेहत के लिए उपयुक्त नहीं मानी जा सकती है.

    केरल अकेला राज्य है, जहां कांग्रेस को सरकार बनाने का जनादेश मिला. केरल में भी मुस्लिम आबादी निर्णयाक स्थिति में है. मुसलमानों की राजनीति करने वाली ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस का गठबंधन है. मुस्लिम लीग के 22 विधायक इस बार जीते हैं, जो सभी मुस्लिम समाज से आते हैं.

    कभी कांग्रेस देश में सत्ता की सबसे बड़ी पार्टी मानी जाती थी. जब उसका जनाधार घटने लगा कांग्रेस से नेता टूटने लगे और क्षेत्रीय दल बनाने लगे. खासकर राम जन्म भूमि आंदोलन में बाबरी मस्जिद विध्वंश के लिए मुसलमानों ने कांग्रेस को जिम्मेदार माना और धीरे-धीरे यह समुदाय कांग्रेस से छिटक गया. केवल उन राज्यों में मुसलमान कांग्रेस के साथ मजबूरी में रहे जहां बीजेपी के मुकाबले केवल कांग्रेस थी. कोई तीसरा दल उपलब्ध नहीं था. जैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान. 

    जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल प्रभावी थे. वहां मुसलमान कांग्रेस से छिटक गए. बिहार में राजद, यूपी में समाजवादी पार्टी, बंगाल में ममता बनर्जी, महाराष्ट्र में शरद पवार के साथ मुसलमानों ने अपनी प्रतिबद्धता जोड़ी. कांग्रेस जब बिखरने लगी और गठबंधन की राजनीति का सहारा लिया तब इन्हीं क्षेत्रीय दलों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बनाया गया.

   नेशनल लेबल पर गठबंधन और राज्य स्तर पर क्षेत्रीय दलों के साथ जमीनी लड़ाई का विरोधाभास गठबंधन को हमेशा कमजोर बनाए रखता है. कांग्रेस मुसलमान का अपना जनाधार वापस पाने के लिए हर संभव प्रो एक्टिव एक्शन लेने में जुटी हुई है. शायद इसीलिए क्षेत्रीय दल उसको साथ रखने में भयभीत रहते हैं, कि कहीं उनका मुस्लिम वोट बैंक खिसक ना जाए. 

    बीजेपी तो यह स्थापित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती है, कि कांग्रेस मुस्लिम लीग जैसा काम करती है. हर क्रिया का रिएक्शन होता है. राजनीति में कुछ थोड़ा ज्यादा ही होता है. मुस्लिम पोलराइजेशन का रिएक्शन हिंदू पॉपुलेशन के रूप में होता है. यह सभी जानते हैं. राहुल गांधी भी जानते हैं. बंगाल के प्रचार अभियान में उन्होंने राज्य में बीजेपी की संभावनाओं के लिए ममता बनर्जी की पोलराइजेशन की नीतियों को कारण बताया था.

    कांग्रेस की मुस्लिम लीग की एकतरफा पहचान निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से उसे नुकसान ही पहुंचाएगी. क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच में मुस्लिम वोट बैंक की लड़ाई चलती रहेगी. अभी क्षेत्रीय दलों पर संकट की स्थिति दिखाई पड़ रही है. इस संकट में भले ही कांग्रेस ऊपर से खुशी नहीं दिखा रही हो, लेकिन भीतर से तो इन हालातों को कांग्रेस के जनाधार की वापसी का अवसर मान रही है.

    मुस्लिम वोट बैंक को लेकर जो भी टकराहट है वह कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच में है. बीजेपी ने तो अपनी राजनीति में इस समुदाय को शामिल ही नहीं रखा है. वह काम जरूर इस समुदाय के लिए करते हैं लेकिन राजनीतिक रूप से उनसे समर्थन की उम्मीद नहीं करते हैं. यह भी एक दीर्घकालिक रणनीति हो सकती है. वक्त के साथ सच्चाई समझ आती है. धीरे-धीरे प्रगतिशील मुसलमान इस सच्चाई के प्रति झुकते भी दिखाई पड़ रहे हैं. 

    अभी फिलहाल तो बीजेपी की पॉलिटिक्स मुस्लिम लीग राजनीति की प्रतिक्रिया में हिंदू ध्रुवीकरण पर ज्यादा निर्भर दिखाई पड़ रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस की राजनीति मुस्लिम पोलराइजेशन और हिंदू विभाजन पर टिकी हुई है. कांग्रेस इस बात से खुश हो सकती है, कि धीरे-धीरे उसका मुस्लिम जनाधार फिर से जुड़ रहा है.

    कांग्रेस की मुस्लिम पहचान हिंदुओं में उसके जनाधार को प्रभावित करती दिखाई पड़ रही है. अब तो मुस्लिम लीडर भी कांग्रेस पर मुस्लिम लीग जैसा व्यवहार करने का आरोप लगा रहे हैं. कांग्रेस की मजबूरी है, वह मुसलमानों के समर्थन के बिना खड़ी नहीं हो सकती. लेकिन उसके कारण हिंदुओं का जो समर्थन घट रहा है वह भी उसकी चिंता का सबब है. 

    किसी भी दल को किसी एक समुदाय की राजनीति करने से बचना चाहिए. लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों इस मामले में एक जैसा ही आचरण कर रहे हैं. कांग्रेस मुसलमान के साथ है, तो बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति कर रही है. राजनीतिक फायदा नुकसान अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्र का नुकसान बर्दाश्त नहीं हो सकता.