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हिंदुत्व का राष्ट्रवाद के साथ एकीकरण

सार

बंगाल में बीजेपी की प्रचंड विजय हिंदू कंसोलिडेशन से संभव हुई है. यह तो अब प्रमाणित हो चुका है. पहले चुपचाप राजनीतिक स्तर पर हिंदू कंसोलिडेशन के प्रयास अब खुलेआम हो रहे हैं. सीएम के पद पर बैठे और बीजेपी के सीनियर नेता खुलेआम ऐलान कर रहे हैं कि उनकी विजय हिंदुओं के मतों के कारण है..!!

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विस्तार

    बंगाल के नए सीएम शुभेंदु अधिकारी ने तो साफ-साफ ऐलान किया है कि उनकी पार्टी को हिंदुओं ने जिताया है. मुसलमानों ने तो शत प्रतिशत टीएमसी को मतदान किया है. असम में हिमंत बिस्वा सरमा तो हिंदू कंसोलिडेशन का प्रमाणित फेस बन गए हैं. वहां मुसलमानों की पर्याप्त तादात होने के बाद भी हिंदू ध्रुवीकरण के कारण बीजेपी को प्रचंड बहुमत हासिल हुआ है.

    यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ तो हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे हैं. किसी भी स्थान पर उनकी उपस्थिति ही हिंदू कंसोलिडेशन को नई हवा देती है. राजनीति में ऐसा अचानक नहीं हो रहा है. यह सब दीर्घकाल तक एक पक्षीय राजनीति के कारण व्यापक प्रतिक्रिया का परिणाम है. जिस भी राज्य में डेमोग्राफी में बदलाव आया, हिंदुओं में अपनी असुरक्षा का भाव बढ़ता गया. बीजेपी के अलावा दूसरे राजनीतिक दल मुस्लिम वोट बैंक को अपनी जीत का अचूक अस्त्र मानने लगे. हिंदुओं को जातियों में बांटने की लगातार कोशिश होती रही. यह क्रम अभी भी जारी है.

    कभी रिजर्वेशन के नाम पर तो कभी जाति जनगणना के नाम पर हिंदुओं को विभाजित करने की हर संभव कोशिश की जाती है. जैसे-जैसे पॉलिटिक्स में हिंदू कंसोलिडेशन चुनावी जीत की गारंटी बनने लगा वैसे-वैसे इस बारे में नेता खुलकर बोलने लगे. पहले ऐसा कभी नहीं होता था, कि कोई भी मुख्यमंत्री हिंदू समुदाय के पक्ष में कोई बात खुलेआम करे. अब तो कई सीएम हिंदू हृदय सम्राट के रूप में अपनी छवि को बनाने के लिए हर संभव प्रयास में जुटे रहते हैं.

    कांग्रेस हिंदुत्व को एक पॉलीटिकल फिलॉसफी मानती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने भी हिंदुत्व को भारत की जीवन पद्धति स्थापित किया है. अभी भी कांग्रेस यही कहती है कि बीजेपी को भारत के कुल हिंदुओं के आधे लोगों का भी समर्थन नहीं है. तकनीकी रूप से यह सही हो सकता है लेकिन कांग्रेस यह भूल जाती है कि इससे कम समर्थन पर केंद्र और राज्यों में उसकी पार्टी की सरकारें कई दशकों तक चलती रही हैं. 

    संसदीय व्यवस्था बहुमत पर काम करती है. बहुमत हिंदुओं का है. अब तक तो यह होता रहा कि मतदान में विभाजन के कारण प्रो मुस्लिम पार्टियां सत्ता पर राज करती रहीं. जो हिंदुओं से ज्यादा मुस्लिम वोट बैंक को तबज्जो देती रहीं. बीजेपी के उभरने के बाद यह बदलाव आया है कि अब हिंदुओं में भी राजनीतिक जागरुकता बढ़ी है. जातियों में बंटे हिंदू समाज में एकता के लिए बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने मूल दर्शन में भी बुनियादी बदलाव करते देखे गए हैं.

     हिंदुत्व का कट्टर चेहरा अब बीजेपी और संघ नहीं रह गया है. उसकी विचारधारा में सामाजिक न्याय और जनकल्याण के प्रति बदलाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है. महिला सशक्तिकरण के प्रति कमिटमेंट ने भी बीजेपी को मजबूती प्रदान की है. बीजेपी ने अपने सौम्य हिंदुत्व को राष्ट्रवाद से जोड़ने में सफलता हासिल की है. बीजेपी के विरोधी दल जहां अल्पसंख्यकवाद को अपना सबसे बड़ा एजेंडा मानते हैं वहीं बीजेपी राष्ट्रवाद को अपनी बुनियाद स्थापित करती है.

    बीजेपी के केंद्र और राज्य सरकारों के सारे प्रयास हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एकीकृत एप्रोच पर आगे बढ़ते दिखाई पड़ते हैं. इसमें गुड गवर्नेंस और डेवलपमेंट तथा विभिन्न जातियों के बीच संतुलन और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता उसकी जड़ों को मजबूती प्रदान करती है. 

    जातियों में विभाजित हिंदू समाज में राजनीतिक ध्रुवीकरण चुनौतीपूर्ण काम होता है. इसके लिए केवल धार्मिक मुद्दों के उपयोग कर सफलता नहीं हासिल की जा सकती. धार्मिक मुद्दों का एक बुनियाद के रूप में ही उपयोग हो सकता है. राम जन्मभूमि आंदोलन को भाजपा ने इसी तरह से हिंदुओं को जोड़ने के लिए उपयोग किया. फिर जब भी उसे सत्ता में मौका मिला तो उसने सामाजिक न्याय और विभिन्न जातियों को जोड़ने का काम बखूबी अंजाम दिया. 

    इसी दृष्टि से उसने महिला सशक्तिकरण को अपना एजेंडा बना लिया. महिला रिजर्वेशन लागू करने की प्रक्रिया का विरोध कर विपक्षी दल बीजेपी के ही ट्रैप में फस गए हैं. अब इसमें जितना भी विलंब होगा, उसका नुकसान विपक्षी दलों को ही उठाना पड़ेगा. अगर बीजेपी अगले लोकसभा चुनाव के पहले इसे लागू करने में सफलता हासिल कर लेती है तो फिर तो उसके राजनीतिक दर्शन को चुनौती देना किसी भी राजनीतिक दल के लिए असंभव सा हो जाएगा.

    सनातन धर्म के हिंदुओं के सभी तीर्थ स्थलों पर व्यापक स्तर पर विकास और जीर्णोद्धार कराए जा रहे हैं. मध्य प्रदेश में महाकाल लोक और यूपी में अयोध्या में भव्य राम मंदिर के साथ ही काशी में विश्वनाथ लोक का निर्माण किया गया है. कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां. हिंदू धर्म के तीर्थ स्थलों पर विकास की नई धारा नहीं बहाई जा रही हो. तकनीकी रूप से धर्म सनातन है लेकिन व्यावहारिक रूप से सनातन और हिंदू में कोई भी अंतर नहीं माना जा सकता है .

    भारत में राजनीति हिंदुत्व के बिना नहीं की जा सकती है. हिंदू कंसोलिडेशन जिस भी राजनीतिक दल की ओर झुकेगा, सत्ता उसी के करीब पहुंचेगी. अगर यह कहा जाए कि हिंदू ध्रुवीकरण राजनीति का फौलादी फाउंडेशन बन गया है, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है. इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि हिंदू राजनीति को स्थापित करने और उसके लिए काम करने के लिए बीजेपी को कम्युनल होने तक का भी आरोप सहना पड़ता है.

    बंगाल और असम के चुनाव परिणाम ने हिंदू कंसोलिडेशन को नई मजबूती प्रदान की है. अगला डेस्टिनेशन केरल बनने जा रहा है. तमिलनाडु में भी द्रविण राजनीति पर संकट खड़ा होने के बाद हिंदुत्व के एकीकरण की राजनीति का मार्ग खुलने की पूरी संभावना है.

     उत्तर प्रदेश हिंदू कंसोलिडेशन का अगला टेस्ट बनेगा अगले साल चुनाव में इसके नजारे दिखाई पड़ेंगे. सौम्य हिंदुत्व राष्ट्रवाद और विकासवाद भविष्य में देश की राजनीतिक दिशा तय करेंगे.