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विचार से ज्यादा आचार की अपील

सार

विश्व संकट के प्रकाश में पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, फर्टिलाइजर सोना और विदेशी यात्राओं पर खर्च कम कर विदेशी मुद्रा बचाने की अपील के पक्ष-विपक्ष में वाक् युद्ध चल रहा है..!!

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विस्तार

    इसके विपक्ष में यह दलील दी जा रही है, कि पांच राज्यों के चुनाव तक ऐसी अपील नहीं की गई. अब सरकार इनकी कीमतें बढ़ाना चाहती है. इस संकट का बोझ जनता पर थोपना चाहती है. इसीलिए पीएम ऐसी अपील कर रहे हैं. ऐसा माना जा रहा है, कि किसी भी समय पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं. मोदी कुछ कहें और राहुल उसका विरोध ना करें, ऐसा कभी होता नहीं है. इस अपील पर भी राहुल गांधी का विकल्पहीन विरोध सोशल मीडिया पर गूंज रहा है.

    सबसे पहले पीएम मोदी के देश के लिए बुनियादी जरूरत विदेशों से आयात होने वाले उत्पादों के उपयोग को सीमित करने की अपील की जरूरत पर चर्चा करते हैं. भारत में तेल के कुएं नहीं हैं. देश की जरूरत का 90% पेट्रोलियम आयात करना पड़ता है. अमेरिका, इजरायल, ईरान युद्ध के कारण तेल आपूर्ति गड़बड़ा गई है. क्रूड ऑयल अप्रत्याशित रूप से महंगा हो गया है. भारत जो कुल आयात करता है उसमें सबसे ज्यादा क्रूड ऑयल, फिर सोना, फर्टिलाइजर और खाद्य तेल का हिस्सा है. सरकार जितनी भी विदेशी मुद्रा खर्च करती है, उसका आधे से ज्यादा हिस्सा इन्हीं मदों में खर्च होता है.

    इस युद्ध के कारण खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई है. इन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं, जो अपनी कमाई देश में भेजते हैं. युद्ध के कारण यह भी प्रभावित हुई है. इन आपात परिस्थितियों के कारण भारत का निर्यात भी प्रभावित हुआ है. इस सबसे विदेशी मुद्रा पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है. युद्ध के कारण यह जो संकट खड़ा है वह कब तक चलेगा, यह भी कहना संभव नहीं है.

    पीएम अगर देश से अपील कर रहे हैं, पेट्रोल-डीजल और विदेशी मुद्रा से आयात के उत्पादों का उपयोग कम करने का अनुरोध कर रहे हैं तो वह आसन्न संकट से बचने का ही एक तरीका है. वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन टीचिंग भी एक रास्ता है. कोरोना संकट में देश यह सारे तरीके आजमा चुका है.

    पेट्रोल-डीजल तो अनिवार्य जरूरत है, लेकिन सोना अनिवार्य तो नहीं है. यह हमारी परंपरा और रीति-रिवाज की आवश्यकता है. सोने के आयात पर भी देश की विदेशी मुद्रा खर्च होती है. सोने की खरीदी कम से कम करने के लिए पहले भी सरकारों ने देश से अपील की है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह ने भी ऐसी अपील की थी. पूर्व वित्त मंत्री पी. सी. चिदम्बरम ने भी सोने के आयात को कम कर देश के वित्तीय घाटे को कंट्रोल करने की आवश्यकता बताई थी. पीएम मोदी कोई नई बात नहीं कह रहे हैं.

   अब इसके विपक्ष की चर्चा करते हैं. देश में एक आम आदमी वर्ग है और दूसरा सत्ता और सिस्टम का समूह है. इसमें आईएएस, आईपीएस और ब्यूरोक्रेट्स के साथ ही सारा सरकारी तंत्र और निर्वाचित जन प्रतिनिधयों का समूह शामिल है. इन दोनों वर्गों की जीवन पद्धति अलग है. सत्ता और सिस्टम का तंत्र तो भोग के लिए बना है. आम आदमी तो न्यूनतम खर्च में अपनी अधिकतम जरूरत को पूरा करने के लिए ही काम करता है. संसाधनों का तो बेतहाशा दुरुपयोग सरकारी तंत्र और निर्वाचित जनप्रतियों के समूह में ही देखा जाता है.

    पीएम के विचारों से ज्यादा अपील निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के आचार की हो सकती है. केंद्र और राज्य की सरकारों के जो भी जनप्रतिनिधि हैं, उनकी लाइफ स्टाइल बेतहाशा खर्च की दिखाई पड़ती है. वाहनों के काफिले और चार्टर्ड फ्लाइट नेता ही उपयोग करते हैं. 

    मध्य प्रदेश में निगमों में राजनीतिक नियुक्तियां हो रही हैं. जो भी नेता अपना पदभार ग्रहण करने के लिए आता है वह सैंकड़ों गलियों का काफिला, सैकड़ो किलोमीटर तक लेकर चलता है. पाठ्य पुस्तक निगम के नवनियुक्त चेयरमेन सौभाग्य सिंह ठाकुर द्वारा सात सौ गाड़ियों के साथ ज्वाइन करने उज्जैन से भोपाल आने की चर्चा सरगर्म है. यह सब कुछ पावर के प्रदर्शन का जरिया बन गया है. सरकारों में कौन सा मंत्री और अफसर है, जो एक गाड़ी का उपयोग कर रहा है. सबके अपने-अपने काफिले हैं.

    पीएम की अपील केवल विचार से प्रभावी नहीं हो सकती. इसके लिए सभी नेताओं और सरकारों को आचार भी वैसे ही करना पड़ेगा. पहले खुद अपने काफिले कम करने पड़ेंगे. अपनी विदेश यात्राएं रोकनी पड़ेंगी. चार्टर्ड फ्लाइट से उड़ने की अपनी प्रवृत्ति को छोड़ना पड़ेगा. स्वार्थ की अपनी राजनीति छोड़कर जनधन के दुरुपयोग को रोकना होगा. नेताओं की किसी बात का इसीलिए शायद प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि उनकी कथनी और करनी में अंतर होता है.     

    जहां तक इस अपील के विरोध में राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं के सवाल है, वह शुद्धतम राजनीति का नमूना हैं. अगर राहुल गांधी और दूसरे नेताओं के पास इसका कोई विकल्प उपलब्ध है, तो देश के सामने लाना चाहिए. युद्ध के हालात में भारत की कोई भूमिका नहीं है. भले ही चुनाव के लिए लेकिन सरकार ने अब तक पेट्रोल डीजल के ना तो दाम बढ़ाए हैं और ना ही इसकी आपूर्ति में कोई बाधा आई है. अब जब संकट बढ़ता जा रहा है तो फिर दाम भी बढ़ाने पड़ सकते हैं.  बचत की अपील भी एक रास्ता हो सकती है. अगर विपक्ष कोई अल्टरनेटिव विजन दे सकता है, तो देना चाहिए.

    सेविंग और सादगी भारतीय संस्कृति है. यह युद्ध की नहीं बल्कि बुद्ध की राह है. कम से कम में त्यागपूर्ण जीवन भारत का ही मार्ग है. इस मार्ग पर पहले नेताओं को चलना पड़ेगा. महात्मा गांधी ने यही किया था. अच्छा विचार भी तब तक सफल नहीं होगा जब तक आचार से उसका मेल स्थापित नहीं होता.