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टिकट कटने की खबरों से क्यों बेचैन हो जाते हैं विधायक, सांसद, शिवराज जी का सच का सामना…….अतुल विनोद 

अतुल विनोद अतुल विनोद
Updated Mon , 14 Apr

सार

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने टिकट की महिमा का बखूबी वर्णन किया, बीजेपी के वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा के अभिनंदन समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई एक बार विधायक बन जाए और उसे पता चल जाए कि टिकट कटने वाला है तो मन बेचैन हो जाता है|

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विस्तार

टिकट एक ऐसी बला है जो एक बार मिल जाए तो फिर पीछा नहीं छोड़ती| भूत की तरह सिर पर सवार हो जाती है। फिर इसके कटने की आहट मिलते ही बेचैनी होने लगती है। 

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने टिकट की महिमा का बखूबी वर्णन किया, बीजेपी के वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा के अभिनंदन समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई एक बार विधायक बन जाए और उसे पता चल जाए कि टिकट कटने वाला है तो मन बेचैन हो जाता है| यह बात सिर्फ विधायकों पर ही लागू नहीं होती| यह पार्टी, प्रशासन और सरकार के स्तर पर, हर पद पर बैठे हुए व्यक्ति पर लागू होती है|

मिला हुआ पद कोई नहीं छोड़ना चाहता| चाहे वह मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री हो या फिर अफसर | जिसको मलाईदार पद का टिकट मिल गया| वह कभी भी इसे छोड़ना नहीं चाहेगा| एक बार किसी व्यक्ति को किसी पार्टी में पार्षद, विधायक या सांसद का टिकट मिल गया तो वह टिकट को बरकरार रखने के लिए सारे जतन करता है| 

जीतने के बाद उसका एकमात्र फोकस अगली बार फिर टिकट पाना होता है| पद पर बने रहने और फिर वही पाने के लिए उसका शोषण शुरू हो जाता है| उससे निकली मलाई से हर स्तर पर पोषण होता है ताकि कुर्सी बनी रहे| यही वजह है कि एक बार कोई व्यक्ति पद पर बैठ जाए तो फिर लगातार उस पर बैठा रहता है| भले ही उसकी परफॉर्मेंस अच्छी हो या नहीं| 

देश के मुख्यमंत्रियों को देख लीजिए| तीन, चार, पांच कितने ही टर्म हो गए, वे लगातार मुख्यमंत्री के पद पर बने हुए हैं, वह अपनी कुर्सी से चिपके हुए हैं| बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार चेयर पर बैठे तो फिर उठे नहीं| नवीन पटनायक बैठे तो उठे नहीं| ममता बनर्जी बैठी तो उठी नही | 

इनके पीछे कोई ऐसा नहीं जो इनका विकल्प बन सके, या पैदा ही नहीं होने दिया गया| एक नहीं अनेक विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री हैं जो अपने पद पर बैठ गए तो फिर पार्टी में किसी दूसरे को उस पद तक पहुंचने का टिकट नहीं मिला| 

बीजेपी को छोड़ ज़्यादातर राजनितिक दल ऐसे हैं जहां पर एक बार अध्यक्ष पद का टिकट मिल गया तो वो स्थाई जैसा हो जाता है| पिता के पैर कब्र में पहुचते हैं तब बेटे का नम्बर लग जाता है| ऐसा ही टिकेट गाँधी परिवार को कांग्रेस में मिला| अब वो टिकट किसी और को मिले ऐसा मुमकिन नहीं लगता| 

राष्ट्रों के स्तर पर भी ऐसा ही होता है| व्लादिमीर पुतिन को राष्ट्रपति बनने का टिकट मिला और राष्ट्रपति बने तो फिर कुर्सी नहीं छोड़ी भले ही देश का संविधान बदल दिया| शी जिनपिंग अंतिम सांस तक चीन के मुखिया बने रहेंगे, उन्होंने अपनी कुर्सी को अपने साथ फेविक्विक से जो जोड़ लिया है|

कुर्सी चीज ही ऐसी है| इस पर बैठने वाला चमड़ी खींचने तक इससे हटना नहीं चाहता| हर स्तर पर टिकट पाने की चाह रखने वाले दूसरी पंक्ति के नेताओं की कतार कम नहीं होती, उनकी प्रतीक्षा बनी रहती है| विधायक महोदय बुजुर्ग हो गए 5-10 बार विधायक बन गए|

लेकिन पार्टी के अन्य योग्य और क्षमतावान कार्यकर्ताओं को विधानसभा, संसद, निगम आदि का टिकट नहीं मिला| कई कार्यकर्ता वर्तमान विधायक से ज्यादा योग्य साबित हो सकते हैं, अपनी क्षमता का लोहा मनवा सकते हैं| नीचे पीढियां बदल जाती हैं उपर बदलाव नहीं होता| टिकट की जुगाड़ इतनी आसान नहीं होती। टिकेट पाना यनीं आसमान से तारे तोड़कर लाना।

शिवराज जी ने कहा कि रघुनंदन शर्मा ने तय कर लिया कि अब चुनाव नहीं लडूंगा तो हमेशा निभाया| लेकिन रघुनंदन शर्मा के आदर्श का पालन करने वाले मध्यप्रदेश में कितने नेता हैं?

बीजेपी को देख लीजिए या कांग्रेस को, ऐसे कितने विधायक हैं जो बुजुर्ग होने के बाद भी स्वेच्छा से चुनाव न लड़ने का ऐलान करें| ऐसे कितने लोग हैं जो नई पीढ़ी को खुद ही टिकट देने की वकालत करें| दुसरे कि टिकट काटने में सब आगे हैं लेकिन खुदकी टिकट कोई नहीं कटवाना चाहता| बुढ़ापे में भी टिकट काट दिया जाए तो दल बदल कर टिकट ले लेते हैं| चमड़ी चली जाए लेकिन टिकट ना जाए| 

विधायक से लेकर प्रधानमंत्री तक हर पद पर पुनर्गठन की आवश्यकता होती है| दल जीत रहा है तब भी बदलाव समय की मांग है| सरकार हमेशा प्रशासनिक फेरबदल करती है| साल दो साल में बड़े स्तर पर सब कुछ बदल दिया जाता है| मुख्य सचिव, जिलों और मंत्रालयों में बैठे हुए अधिकारी बमुश्किल साल 1,2 साल एक पद पर काम कर पाते हैं| लेकिन राजनीति में बीसियों साल बने रहने का चलन है|

खुद की बात आये तो राजनेताओं को परिवर्तन की जरूरत महसूस नहीं होती| राजनेताओं को लगता है कि वह स्वयं जिंदगी भर उस पद पर बने रहें, लेकिन नवाचार, कसावट, और बेहतर प्रदर्शन के नाम पर निचले स्तर पर सब कुछ बदलते रहें| प्रशासनिक अफसर कठपुतली बन जाते हैं| एक जगह पोस्टिंग नहीं होती कि दूसरी जगह भेज दिया जाता है| 

लेकिन राजनीति में ऐसा करना मुश्किल नहीं होता| एक विधायक को क्षेत्र से टिकट न देना पार्टी के लिए बहुत बड़ा निर्णय होता है| किसी भी स्थानीय क्षत्रप को हिलाना पार्टी के नेतृत्व के बूते की बात नहीं होती| 

राजनीति में जड़ता बनी रहती है, लोगों के पास विकल्प नहीं होते| एक ही व्यक्ति बार-बार जनता के सामने पेश होता रहता है| कोई नयापन और बदलाव नहीं होता| जो सीधा सादा है उसे बदल दिया जाता है, वहां बार-बार बदलाव होते हैं, नए प्रयोग होते हैं| लेकिन जो साम, दाम, दंड, भेद में माहिर है वह कैसे ना कैसे अपनी कुर्सी बचा ही लेता है|