ब्रह्माँड के रहस्य -62….सोम सम्राट का सिंहासन

                                    सोम सम्राट का सिंहासन
ब्रह्माँड के रहस्य -62
                                       यज्ञ विधि,सोम -6

रमेश तिवारी 

सोम जब यजमान के दुर्य (घर) में पधारते हैं, तब उन सोम राजा को किस प्रकार से सिंहासन पर लाया जाता है, हम इस रोचक घटना पर विस्तृत चर्चा करेंगे। किंतु पहले इंद्र, अहल्या और गौतम ऋषि की बहुचर्चित कथा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देख लें।

बात यह है कि हम कई बार बता चुके हैं कि तीन संसार हैं.! पहला ब्रह्माँड, जिसको आधिदैविक कहते हैं। दूसरा पृथ्वी, जो आधिभौतिक है। और तीसरा पिंड (मनुष्य)। इन तीनों का आपस में सामन्जस्य है। आकाशीय पात्रों का पृथ्वीय रूपांतर है।  

मनुष्य तो ब्रह्मांड की इकाई है ही। हू-ब-हू। तो इंद्र और अहल्या की जो कथा पुराणों में प्रचलित है। वह आकाशीय घटना की नकल मात्र है जिसका संदर्भ जार (व्यभिचार) से है। जबकि ब्रह्माँड की असली घटना मात्र वैज्ञानिक है।

                  ब्रह्माँड के रहस्य -62
तो ऋषि और वैज्ञानिक ब्राह्मणों की शोध को पहले देख लेते हैं। क्योंकि सोम प्रकरण में इन्द्र की अभ्यर्थना भी की जाना है। मंत्र में आव्हान किया जाता है - "इन्द्रागच्छ"। इन्द्र यज्ञ के देवता हैं। हरिव आगच्छ। मेघाततिर्थेर्मेष वृषणशस्य मेघे। हरिवाहन इन्द्र के अश्व हैं। कहते हैं हरिवाहन आइये। मेघ, इन्द्र के घोडे़ (गायत्री आदि सातों छंद) गौर पशु को मारने वाले तथा अहल्या के जार इंद्र आइये।

सोम घर में लाना है। चूंकि वह सम्राट है,अतःउसको लाने के लिए 4 लोग सिंहासन लेकर जाते हैं। राजा को तो दो ही लोग उठाते हैं किंतु यह तो सम्राट हैं न! तो सर्व प्रथम तो इस ऋतसदनी (आसंदी) को मंत्र बोलकर स्पर्श किया जाता है। 

फिर उस पर भी मृग चर्म बिछाया जाता है। फिर मंत्रों सहित कहा जाता है- हे सोम तुम गयस्फान (गृह वर्धक) हो। प्रत्तरण (आपत्ति निवारक) हो। सुवीर (अच्छी संतान देने वाले) अवीरहा (पुत्रादि के घातक) न बनकर यजमान की यज्ञशाला में पधारें। 'गुहा वै दुर्या' घर में विराजें।

इन्द्र जार क्या है। यह वैज्ञानिक ब्रह्माँडीय घटना है, जो प्रतिदिन घटित होती है। अहल्या जार प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय के पूर्व होता है! कैसे- घटना मुग्धकारी है। वैसी नहीं है जो प्रचलित है। दिन का नियमन करने वाली रात्रि 'अहर्यमयति' इस व्युत्पत्ति से 'अहर्या'कहलाती है।और अहल्या ही परोछ रूप से अहल्या कहलाती है।

क्योकि देवता परोक्षप्रिय हैं। सूर्य के इन्द्रोधाता भगः पूषा:मित्रोऽथवरुणोऽर्यमा इत्यादि 12 प्राणों में इन्द्र भी अत्युत्तम प्राण है। इन्द्र (सूर्य) के निकलने के पूर्व) अहल्या जीर्ण शीर्ण हो जाती है रात, ही दिन की स्वतंत्रता छीनती है। प्रातः काल, में दो घड़ी रहते ही सूर्य अर्थात् इन्द्र की सत्ता स्थापित हो जाती है। तड़का उगे (पौ फटते) ही आसमान में सफेदी चमकने लगती है। उसी समय गोतम, अहल्या का पति भाग जाता है।

गो, पृथ्वी का नाम है। तम अंधकार का नाम है। जहां इन्द्र आया कि पृथ्वी का तम दूर हुआ। चूंकि इंद्र ही अहल्या को जीर्ण शीर्ण करता है, अतः "अहल्या जीरयति " इस व्युत्पत्ति से उस सौर प्राण को, इन्द्र को अहल्या का जार कहा जाता है। अर्थात उदय होते ही सूर्य की सहस्त्र रश्मियां संसार में फैल जातीं हैं- ये ही इन्द्र के सहत्र भग हैं।

मित्रो, हमारी कथा का उद्देश्य सनातन विज्ञान को समाज के सामने लाना है। वैदिक ज्ञान से विहीन उन भोले भाले मुंहजोरों को यह भी बताना है कि वे अपनी निम्नस्तरीय सोच और गतिविधियों से देश का अनिष्ट न करें। किंतु आप जो मित्र पढ़ रहे हैं, क्या आपकी तंई इतना ही पर्याप्त है। आगे हम और आप क्या कुछ कर सकते हैं यह सोचना भी आवश्यक है।

जीव के अति सूक्ष्म विज्ञान का चित्रण भरा पडा़ है। मैं इतना भर तो कह ही सकता हूँ कि यज्ञ विज्ञान ज्ञान की पराकाष्ठा है। ऋषियों की खोज और ब्राह्मणों के प्रयोगों ने आत्मा और परमात्मा का जो संबंध जोडा़, है वह तो ज्ञान का शिखर है। 

बस इसको इस तरीके से इतना सा ही समझ लें कि आज के मिशन "यान" ऋषियों की हजारों वर्ष पहले की गई शोध की मामूली सी नकल भर है। यान को ग्रह पर भेजने की तुलना में मात्र अनुभूति (आत्मा) को शून्य में परमात्मा (?) से मिलाने के विज्ञान की कल्पना ही कितनी सुखद है।

आज की कथा बस यहीं तक। तो मिलते हैं कल रात्रि। इसी समय। तब तक विदा। 
             धन्यवाद।

Priyam Mishra



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