हमारे ऋषि (देवर्षि नारद) -दिनेश मालवीय

हमारे ऋषि

-दिनेश मालवीय

भारत ऋषियों की भूमि है. हमारे पास जो भी कुछ गर्व करने योग्य था, है और रहेगा, वह ऋषियों की ही देन है. ऋषि कौन हैं इस विषय में समझना आवश्यक है. इस शब्द की व्युत्पत्ति “ऋष” शब्द से हुयी है, जिसका अर्थ देखना होता है. देखते तो सभी हैं, तो क्या सभी ऋषि हैं. जी नहीं. यहाँ पर देखने का तात्पर्य हमारे चर्म चक्षुओं से देखे जाने से नहीं है. इस शब्द से तात्पर्य है, ऐसा व्यक्ति जो हमारी लौकिक दृष्टि से परे और स्वयं के भीतर देख सकता है. प्राचीन भारत में जितनी भी खोजें हुयीं, वे इन ऋषियों द्वारा ध्यान में प्रकट हुयी हैं. इसीलिए उन्हें दृष्टा भी कहा जाता है. उनके भीतर मंत्र प्रकट हुए, जिसके कारण उन्हें मंत्रदृष्टा कहा जाता है. 

भारत में ऋषियों की बहुत बड़ी श्रृंखला है. ‘नयूज पुराण’ में इन ऋषियों के विषय में कुछ बातें संक्षेप में समझने के लिए यह श्रंखला प्रारंभ की जा रही है. इससे हमारे लगभग सभी ऋषियों के बारे में बहुत अल्प ही सही, लेकिन उपयोगी जानकारी मिल सकेगी और हम उनके योगदान से कुछ परिचित हो सकेंगे. इससे हम उनके सम्पुर्ण जीवन और अवदान को समझने के लिए और अधिक अध्ययन करने की ओर प्रेरित हो सकते हैं.

देवर्षि नारद

हमारे ऋषियों में देवर्षि नारद का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. इनके बारे में श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि-“ अहो! ये देवर्षि नारदजी धन्य हैं, जो वीणा बजाते, हरिगुण गाते और मस्त होते हुए इस दुखी संसार को आनंदित करते रहते हैं”.


दुर्भाग्य से हमारी फिल्मों और टेलीविजन सीरियल्स ने इन महापुरुष की जिस तरह की विदूषक के समान छवि प्रस्तुत की गयी है या की जा रही है, वह उनकी वास्तविक छवि से एकदम विपरीत है. नारदजी भगवान के उन परम प्रिय पात्रों में शामिल हैं, जो सिर्फ जगत के कल्याण के कारण उसमें विचरते हैं. उन्हें अप्रतिहति गति प्राप्त है, अर्थात वह जब चाहें, जहाँ चाहें बिना किसी रोकटोक के जा सकते हैं.

नारदजी को भगवान का “मन”कहा गया है. भक्ति के यह प्रधान आचार्य हैं. भक्ति के विषय में “नारद भक्तिसूत्र” एक अप्रतिम ग्रंथ है. इसमें भगवततत्व की जैसी व्याख्या की गयी है, वह अन्यत्र दुर्लभ है.इन्होंने हर एक युग में घूम-घूम कर भक्ति का प्रसार किया है और इस कलियुग में भी वह परोक्ष रूप से भक्तों की सहायता करते हैं.

प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीश आदि महान भक्तों को भक्ति-मार्ग पर नारदजी ने ही प्रवृत्त किया है. संसार को ‘श्रीमद्भागवत’ और ‘रामायण’ जैसे अद्भुत ग्रंथ इन्ही की कृपा से प्राप्त हुए हैं. शुकदेव और वाल्मिकि को क्रमश: ये ग्रंथ लिखने की प्रेरणा इन्हीं ने दी.

श्रीमद्भागवत के अनुसार नारदजी पूर्वजन्म में एक दासीपुत्र थे. भगवान की अनन्य भक्ति से अगले जन्म में इन्हें भगवान के साक्षात दर्शन का परम लाभ और देवर्षि का सर्वोच्च पद प्राप्त हुआ. ‘महाभारत’ के अनुसार नारदजी सभी वेदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, अतीत कल्पों की बातें जानने वाले और धर्मतत्व के ज्ञाता हैं. वह शिक्षा-व्याकरण के असाधारण पण्डित, संगीतविशारद, प्रभावशाली वक्ता. मेधावी नीतिज्ञ, कवि, ज्ञानी, सभी प्रमाणों द्वारा वस्तु का विचार करने में समर्थ, बृहस्पति जैसे विद्वानों की शंकओं का समाधान करने वाले, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के तत्व को जानने वाले हैं.

नारदजी को योगबल से सभी लोकों की बातों का ज्ञान रह्त्ता है. उन्हें संधि और विग्रह के सिद्धांतों का ज्ञान है.

परम रामभक्त और ज्ञानियों में अग्रगण्य हनुमानजी के संगीत गुरु नारदजी ही हैं. उनका हर कार्य लोककल्याण की दृष्टि से होता है. इन्हें भगवान की विशेष कृपापात्र हैं और वह उनकी लीलाओं में अपनी निर्दिष्ट भूमिका निभाते हैं. उनके लिए भूमि तैयार करते हैं, आवश्यक उपकरणों का संग्रह करते हैं और अन्य अनेक प्रकार से लीलाओं में सहायक होते हैं.

देवर्षि नारद का देवों के साथ ही दानव भी समान रूप से सम्मान करते हैं. यह बहुत दुर्लभ बात है, कि देवता और दानव किसीका समान रूप से आदर और सम्मान करें. जो लोग भी देवर्षि नारद की अन्यथा छवि मन में बनाए बैठे हैं, वह उसे तत्काल दूर लें और ‘नारद भक्तिसूत्र’का अवश्य अध्ययन करें, जिससे भक्ति का सही स्वरूप स्पष्ट हो सके और वे परमार्थ के पथ पर आगे बढ़ सकें.

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