क्या है तीसरी आँख की ऊर्जा का रहस्य ? तीसरी आँख स्‍वप्‍न है या सत्‍य

तीसरी आँख की ऊर्जा का रहस्य-
1-हम बहिर्जगत का दर्शन तो इन उपरी आँखों से कर लेते है पर उस अंतर्जगत में झाकने वाले को ‘मन की आँखे’ कहा जाता है और वही है भगवन शंकर का ‘तीसरा नेत्र’ और यही कुंडलिनी जागृत करने का केंद्र भी है | इसका स्थान दोनों भौहो के बीच में है |नेत्र महत्वपूर्ण होने का कारण यह है कि इसका सीधा सम्बन्ध अन्नमय शरीर, प्राणमय शरीर और मनोमय शरीर से है |
2-जिस व्यक्ति का स्थूल शरीर स्वस्थ और नीरोग है उसके नेत्र चंचल, अस्थिर और धूमिल होते है | जिस व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर अर्थात प्राणमय शरीर स्वस्थ और उन्नत होता है उसके नेत्र स्थिर, तेजोमय और प्रखर होते हैं | इसी तरह जिस व्यक्ति का मनोमय शरीर स्वस्थ, विकसित एवं उन्नत होता है उसके नेत्र स्थिर, तेजोमय, प्रखर होने के अतिरिक्त सम्मोहन से भरे स्वप्नालु भी होते है |
3-बार बार पलकों का गिरना कमजोर इच्छा शक्ति का सूचक है | नेत्रों की अपनी अलग भाषा है | जो लोग नेत्रों की भाषा पढ़ना जानते है वे किसी के भी नेत्र को देखकर उसके भावो को समझ सकते है और उसके विचारो को जान सकते है | नेत्र में 1 करोड़ 20 लाख ‘कोन’ और 70 लाख ‘रोड’ कोशिकाए होती है | इसके अतिरिक्त 10 लाख ऑप्टिक नर्वस होती है | इन कोशिकाओ और तंतुओ का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है |
4-हर रहस्य को और हर भेद को जान लेने के लिए व्याकुल आधुनिक विज्ञान इस रहस्य के तह में भी जा पहुंचा है और मस्तिष्क के बीच तिलक लगाने के स्थान की ठीक नीचे और दोनों मस्तिष्को के बीच की रेखा पर एक ग्रंथि मिली जिसे वैज्ञानिको ने ‘पीनियल ग्लैंड’ का नाम दिया है |
क्या है तीसरी आँख का महत्त्व?-

 

1-हिन्दू संस्कृति में तीसरी आँख का विशेष महत्त्व है , यह अनेक रहस्यों  के बारे में बताती है।तीसरी आँख अक्सर देवी देवताओं के चित्रों में चित्रित की जाती है। वास्तव में जैसा चित्र दिखाते हैं ;यह ठीक वैसी नहीं होती किन्तु सामान्य आँखों से भी करोडो गुना शक्तिशाली होती है ।यह मनुष्यों में भी होती है ,पर जाग्रत किसी किसी में ही होती है। इसे जगाना होता है,उसके बाद यह वह देखती है जो लाखों दूरबीने भी नहीं देख सकती।
2-हमें दो बातें समझने की हैं।पहली बात , तीसरी आंख की ऊर्जा वही है जो ऊर्जा दो सामान्य आंखों को चलाती है। सिर्फ तीसरी आंख में वह ऊर्जा; नई दिशा में,नए केंद्र की ओर गति करने लगती है। तीसरी आंख निष्‍क्रिय है और जब तक सामान्य आंखें देखना बंद नहीं करतीं, तीसरी आंख सक्रिय नहीं हो सकती, देख नहीं सकती। जब ऊर्जा सामान्य आंखों में बहना बंद कर देती है तो वह तीसरी आंख में बहने लगती है।
3- जब ऊर्जा तीसरी आंख में बहती है तो सामान्य आंखें देखना बंद कर देती हैं। तब उनके रहते हुए भी हम उनके द्वारा कुछ नहीं देखते हैं। जो ऊर्जा उनमें बहती थी वह वहां से हटकर एक नए केंद्र पर गतिमान हो जाती है। यह केंद्र दो आंखों के बीच में स्थित है। तीसरी आंख बिलकुल तैयार है; वह किसी भी क्षण सक्रिय हो सकती है। लेकिन इसे सक्रिय होने के लिए ऊर्जा चाहिए। और सामान्य आंखों की ऊर्जा को यहां लाना होगा।
4-दूसरी बात, जब हम सामान्य आंखों से देखते हैं तब हम सचमुच स्थूल शरीर से देखते हैं। तीसरी आंख स्थूल शरीर का हिस्सा नहीं है; यह दूसरे शरीर का हिस्सा है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। स्थूल शरीर के भीतर उसके जैसा ही सूक्ष्म शरीर भी है; लेकिन यह स्थूल शरीर का हिस्सा नहीं है। यही वजह है कि शरीर—शास्त्र यह मानने को राजी नहीं है कि तीसरी आंख या उसकी जैसी कोई चीज है।
5-जब ऊर्जा स्थूल शरीर में गतिमान रहती है तो हम अपनी स्थूल आंखों से देख पाते हैं। यही कारण है कि स्थूल आंखों से हम स्थूल को ही देख सकते हैं, पदार्थ को ही देख सकते हैं; अन्‍य किसी चीज को नहीं देख सकते। सामान्य आंखें भौतिक हैं। इन आंखों से हम उसे नहीं देख सकते जो अशरीरी है। तीसरी आंख के सक्रिय होते ही हम एक नए आयाम में प्रवेश करते हैं। अब हम वे चीजें देख सकते हैं जो स्थूल आंखों के लिए दृश्य नहीं हैं। लेकिन वे सूक्ष्म आंखों के लिए दृश्य हो जाती हैं।
6-तीसरी आंख के सक्रिय होने पर अगर हम किसी आदमी पर निगाह डालेंगे तो हम उसकी आत्मा में झांक लेंगे। यह वैसे ही है जैसे स्थूल आंखों से स्थूल शरीर तो दिखाई देगा, लेकिन आत्मा दिखाई नहीं देगी। तीसरी आंख से देखने पर हमे जो दिखाई देगा वह शरीर नहीं होगा; वह वह होगा जो शरीर के भीतर रहता है।तुम्हारी खोपड़ी की खोज—बीन की जा सकती है, एक्सरे के द्वारा उसे देखा—परखा जा सकता है। लेकिन उसमें कहीं भी वह चीज नहीं मिलेगी जिसे तीसरी आंख कहा जा सके। तीसरी आंख सूक्ष्म शरीर का हिस्सा है।
NOTE;- जब तुम मरते हो तो तुम्हारा स्थूल शरीर ही मरता है; तुम्हारा सूक्ष्म शरीर तुम्हारे साथ जाता है और वह दूसरा जन्म लेता है। जब तक सूक्ष्म शरीर नहीं मरेगा तुम जन्म—मरण के, आवागमन के चक्कर से मुक्त नहीं हो सकते; तब तक संसार चलता रहेगा।इन दो बातों को स्मरण रखना होगा ..।
1- पहली, एक ही ऊर्जा दोनों जगह गति करती है। उसे सामान्‍य स्‍थूल आंखों से हटाकर ही तीसरी आँख में गतिमान किया जा सकता है।
2- दूसरी बात कि तीसरी आँख स्‍थूल शरीर का हिस्‍सा नहीं है। वह सूक्ष्‍म शरीर का हिस्सा है, जिसे हम दूसरा शरीर भी कहते है। क्‍योंकि तीसरी आँख सूक्ष्‍म शरीर का हिस्‍सा है, इस लिए जिस क्षण तुम इसके द्वारा देखते हो तुम्‍हें सूक्ष्‍म जगत दिखाई पड़ने लगता है। अगर एक अशरीरी भी यहां पास में बैठा हो तो वह हमे नहीं दिखाई देगा। लेकिन अगर हमारी तीसरी आंख काम करने लगे तो हम उस अशरीरी को देख लेंगे । क्योंकि सूक्ष्म अस्तित्व सूक्ष्म आंखों से ही देखा जा सकता है।
तीसरी आँख ….एक वैज्ञानिक तथ्‍य;-
09 तथ्य;-
1-तीसरी आँख एक वैज्ञानिक तथ्‍य है। हो सकता है अभी इसका पूरा राज विज्ञान की पकड़ में न आया हो, लेकिन इससे उसके यथार्थ में कोई फर्क नहीं पड़ता। सत्‍य वैज्ञानिक खोजों पर निर्भर नहीं है।आज हम इलेक्ट्रानिक उपकरणों द्वारा इन अनुभवों की व्‍याख्‍यायित कर सकते है। पहले कुंडलिनी के लिए सांप का प्रतीक था, अब उसे विद्युत शक्‍ति की उपमा दी जाती है। जो कि अधिक यथार्थ है। शरीर के भीतर विद्युत तो दौड़ सकती है। सांप नहीं।
2-विज्ञान के साथ मनुष्‍य का चित प्रौढ़ हो गया है। अब अंतर जगत के रहस्‍य को समझने के लिए उसे किस्‍से कहानियों की जरूरत नहीं है। अगर हम तीसरी आँख को ‘’पाइनियल ग्रंथि’’ कहें तो उसे समझने का आयाम तत्‍क्षण बदल जाता है। यह ग्रंथि प्रकाश के प्रति अति संवेदनशील है इसलिए प्रकाश को देखती और दिखाती है।
3-विज्ञान ने परमात्‍मा को पूरी तरह से इनकार किया और पदार्थ की खोज में डूब गया। और अब पदार्थ को खोजते-खोजते वैज्ञानिक पुन: परमात्‍मा से टकरा गया है। क्‍योंकि पदार्थ को तोड़ते जाओं तो अंत में वह बचता ही नहीं ऊर्जा बन जाता है। और वैज्ञानिक भौंचक्‍का होकर आस्‍तित्‍व के अज्ञेय सागर के किनारे खड़ा रह जाता है। न्‍यूटन, आइंस्टीन ओपेन-हेमर….जितने भी बड़े वैज्ञानिक थे, सब अंतत: रहस्‍यवादी बन गये।
4-वैज्ञानिक अनुसंधान का अर्थ है: कल्‍पना की उड़ानें न भरकर यथार्थ के धरातल पर उत्‍तर आयें। हमारे भीतर पैठे हुए असत्‍य का साक्षात करें, सत्‍य अपने आप प्रगट हो जायेगा।केंद्र को ‘’तीसरी आँख’’ कहते है। तीसरा कान या तीसरी नाक नहीं कहते। यह बहुत सारगर्भित है। दो भौंहों के बीच विराजमान यह केंद्र देखने की अपूर्व क्षमता रखता है। यह देखना विशुद्ध पारदर्शी, सुने मन का देखना है। यह शक्‍ति का जागरण नहीं है। शांति की स्फुरणा है।
5-मन इतना शांत हो जाता है। तृप्‍त हो जाता है कि देखने की इच्‍छा भी शेष रहती।परन्तु दर्पण में सब कुछ दिख जाता है । यह ग्रंथि गिरगिट के माथे पर गोल उभार के रूप में देखी जा सकती है |यह पीनियल ग्रंथि सात रंगों के साथ साथ बैगनी के परे पराबैगनी किरणों को तथा लाल के परे आरक्त या इन्फ्रारेड को भी ग्रहण कर सकती है | इस ग्रंथि को फ्रेंच दार्शनिक रेने ने आत्मा का केंद्र ही कह दिया है | अमेरिकी वैज्ञानिक लर्नन ने सन 1958 में इस ग्रंथि से निकलने वाला हार्मोन को ‘मेलाटोनिन’ नाम दिया जो मेलानिन नामक रंग द्रव्य का नियंत्रण करता है | मेलाटोनिन की मात्रा ही त्वचा और बालो के रंगभेद की जिम्मेदार है |लेकिन मेलाटोनिन का निर्माण एक और रसायन करता है जिसका नाम है – सेरोटोनिन | पीनियल ग्रंथि एक प्रकार से सेरोटोनिन का भंडार ही है और इसी से मस्तिष्क में बुद्धि का निर्माण होता है और विकास भी |
6-बाद में वैज्ञानिको को पता चला कि केला, अंजीर और गूलर में भी सेरोटोनिन पाया जाता है | बैज्ञानिको का कहना है कि संभव है भगवन बुद्ध को ‘बोध’ प्राप्त करने में बोधिवृक्ष के फलो से प्राप्त सेरोटोनिन का विशेष योग रहा हो |खैर, अभी सेरोटोनिन का इंजेक्सन लगा कर लोगो में बुद्धत्व उत्पन्न करने का काम तो शुरू नहीं हुआ है लेकिन यह देखा गया है कि ‘एल. एस. डी. जिसकी एक ग्राम के दस लाखवे हिस्से जितनी मामूली खुराक दिन में तारे दिखने के लिए काफी है, सीधे दिमाग में जाकर सेरोटोनिन मस्तिष्क की क्रियायो में बाधा डालती है और यही कारण है की L.S.D के नशे में डूबा आदमी अपने आसपास की वस्तुओ को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देख पाता |
7-इसका कारण यह है की L.S.D के अणुओ की बनावट सेरोटोनिन के अणुओ से बहुत मिलती है और जैसे ही सेरोटोनिन की जगह दिमाग में एल. एस. डी. के अणु ले लेते है, मस्तिष्क उन तमाम रंगों, ध्वनियो को ग्रहण करने लगता है जो शायद कोई तीन अरब वर्ष पहले उन आदि समुन्दरो में बिखरे हुए थे, जब जीवन की इकाई प्रथम कोशिका की सृष्टि हुई थी |
8-वर्तमान में पीनियल ग्लैंड पर शोध और खोज जारी है |लेकिन यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि पीनियल ग्लैंड का सम्बन्ध तीसरा नेत्र से है और तीसरा नेत्र चेतन सत्ता का विषय है और विज्ञान केवल खंड सत्य को ही पकड़ पाता है, पूर्ण सत्य उसकी पहुँच के बाहर है क्योंकि कल के विज्ञान का अभाज्य अणु आज के विज्ञान में विभाजित है |आज का विज्ञान
इस बात को स्वीकार करता है कि हम लोग मस्तिष्क का बहुत थोडा हिस्सा ही काम में लाते है | मस्तिष्क का बड़ा हिस्सा निष्क्रिय है |
9-वैज्ञानिको का कहना है कि उस बड़े हिस्से में क्या क्या छिपा है, यह बतलाना कठिन है | लेकिन पराविज्ञान कहता है कि ब्रह्माण्ड के तमाम गूढ़ रहस्य इसी बड़े हिस्से में छिपे हुए हैं और तीसरा नेत्र का सम्बन्ध उसी अज्ञात और रहस्यमय बड़े भाग से है | मस्तिष्क के उस बड़े भाग का केंद्र है तीसरा नेत्र, जिसे सुपर सेन्स, अतीन्द्रिय -इन्द्रिय और छठी इन्द्रिय कहते है |यदि यह केंद्र पूरी तरह से खुल जाये तो पदार्थ लीन हो जायेगा और अखंड विराट सत्ता प्रकट हो जाएगी |
क्या है भगवान शिव की तीसरी आंख का वैज्ञानिक रहस्य?-
04 तथ्य;-
`1-भगवान शंकर का एक नाम त्रिलोचन भी है। त्रिलोचन का अर्थ होता है तीन आंखों वाला क्योंकि एक मात्र भगवान शंकर ही ऐसे हैं जिनकी तीन आंखें हैं। पुराणों में भगवान शंकर के माथे पर एक तीसरी आंख के होने का उल्लेख है। उस आंख से वे वह सब कुछ देख सकते हैं जो आम आंखों से नहीं देखा जा सकता।
2-जब वे तीसरी आंख खोलते हैं तो उससे बहुत ही ज्यादा उर्जा निकलती है। एक बार खुलते ही सब कुछ साफ नजर आता है, फिर वे ब्रह्मांड में झांक रहे होते हैं। ऐसी स्थिति में वे कॉस्‍मिक फ्रिक्‍वेंसी या ब्रह्मांडीय आवृत्‍ति से जुड़े होते हैं। तब वे कहीं भी देख सकते हैं और किसी से भी प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित कर सकते हैं।
3-शिव जी के तीनों नेत्र अलग-अलग गुण रखते हैं जिसमें दांए नेत्र सत्वगुण और बांए नेत्र रजोगुण और तीसरे नेत्र में तमोगुण का वास है।जिनमें एक आंख में चंद्रमा और दूसरी में सूर्य का वास है, और तीसरी आंख को विवेक माना गया है।शिवजी के मस्तक पर दोनों भौंहों के मध्य विराजमान उनका तीसरा नेत्र आज्ञाचक्र पर स्थित है।आज्ञाचक्र ही विवेकबुद्धि का स्रोत है।
4-वेदों के अनुसार, इसी आज्ञा चक्र के स्थान पर आत्मा का प्रबोधन (ज्ञान) प्रस्तुत और केंद्रित होता है।तृतीय नेत्र खुल जाने पर सामान्य बीज रूपी मनुष्य की सम्भावनाएं वट वृक्ष का आकार ले लेती हैं। जो व्यक्ति इस ऊर्जा को जागृत कर लेता है, उसे सभी प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं।
क्या हमारी पीनियल ग्रंथि रहस्यमय हैं?-
16 तथ्य;-
1-मस्तिष्क के दो भागों के बीच एक पीनियल ग्लेंड होती है। तीसरी आंख इसी को दर्शाती है। इसका काम है एक हार्मोन्स को छोड़ना जिसे मेलाटोनिन हार्मोन कहते हैं, जो सोने और जागने के घटना चक्र का संचालन करता है।वैसे तो अपने-अपने स्थान पर सभी ग्रंथियों का महत्व है, पर इन सभी की नियामक सत्ता जहाँ विराजमान् है, उन्हें मास्टर ग्लैण्ड्स कहा गया है। इनमें मुख्य हैं, पीनियल एवं पिट्यूटरी। इनकी संरचना भी अपने आप में अनोखी हैं एवं दोनों का ही परस्पर गहन संबंध है।
2-अनेकानेक मनोविकारों एवं मानसिक गुणों का सम्बन्ध यहां स्रवित हार्मोन्स स्रावों से है।यह ग्रंथि लाइट सेंसटिव है इसलिए इसे तीसरी आंख भी कहा जाता है। आप भले ही अंधे हो जाएं लेकिन आपको लाइट का चमकना जरूर दिखाई देगा जो इसी पीनियल ग्लेंड के कारण है। यदि आप लाइट का चमकना देख सकते हैं तो फिर आप सब कुछ देखने की क्षमता रखते हैं।जर्मन वैज्ञानिकों का ऐसा मत है कि इस तीसरे नेत्र के द्वारा दिशा ज्ञान भी होता है। इसमें पाया जाने वाला हार्मोन्स मेलाटोनिन मनुष्य की मानसिक उदासी से सम्बन्धित है।
3-जिस ग्रंथि को शरीर विज्ञान पीनियल कहते हैं, उसे पौराणिक वर्णन के अनुसार तृतीय नेत्र कहा गया है, जबकि तंत्र और योगशास्त्र उसे आज्ञाचक्र की संगति देते आए हैं। कुछ समय पहले तक वस्तुतः वैज्ञानिकों की यह मान्यता थी कि यह ग्रंथि मनुष्य के लिए अनावश्यक हैं परंतु अध्यात्म ने इसको प्रारंभ से ही अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना हैं।
4-शारीरिक दृष्टि से पीनियल मानव-शरीर का सबसे छोटा घटक है। यह एक-चौथाई इंच लंबा एवं सौ मिलीग्राम भारी होता है। इतना छोटा अंग शायद ही कभी इतनी उत्तेजना का कारण बना हो। गरदन और सिर के मिलन बिंदु पर मेरुदंड के ठीक ऊपर स्थित यह ग्रंथ भूमध्य भाग में मस्तिष्क की दीवार से जुड़ी है।जैसे आंखों में रॉड्स और कोन्स होते हैं, उसीतरह पिनियल ग्लैंड में भी होते हैं। थोड़ा बहुत रोशनी को ये भी पार करा सकता है। इससे निकला मेलाटोनिन हॉर्मोन ही बाकी शरीर को रोशनी के प्रति एक्टिव बनाता है।
5-मेलाटोनिन और सेरोटोनिन नामक दो हार्मोन दोनों मस्तिष्क में पीनियल ग्रंथि द्वारा संचालित होते हैं।मस्तिष्क में मेलाटोनिन हार्मोन का कम उत्पादन नींद की कमी का परिणाम है। दूसरी ओर, सेरोटोनिन हार्मोन का निम्न स्तर अवसाद और चिंता का कारण बनता है। ध्यान इस ग्रंथि को जागृत करने की सबसे सटीक विद्धि है। इन दोनों रसस्रावों के गुणों एवं कार्यों के संबंध में किया गया अनुसंधान स्थूल शरीर की रहस्यमय परतों के संबंध में कई नए तथ्य उजागर करता है।
6-मेलाटोनिन नामक हार्मोन मेढ़क तथा मछलियों में वातावरणीय प्रकाश परिवर्तन की प्रतिक्रिया स्वरूप त्वचा में रंग-परिवर्तन हेतु जिम्मेदार है और मनुष्य में यही भावनात्मक बदलाव का तथा क्रोध एवं भय के आवेगों का नियंत्रणकर्त्ता समझा जाता है। वयः संधि के प्रारंभ में तथा मनुष्य के यौन विकास में इसकी विशिष्ट भूमिका हैं। जैसे-जैसे बच्चे वयः संधि काल में प्रवेश करते हैं, उनकी पीनियल ग्रंथि का आकार और कार्य-क्षमता घटती जाती है।
7-ऐसा माना जाता है कि उक्त ग्रंथि यौन विकास के प्रारंभ को अपने नियंत्रण में रखती है और जब उसका नियमन हट जाता है, तो यही कार्य पिट्यूटरी अपने जिम्मे ले लेती हैं। कामेंद्रिय को पिट्यूटरी ग्लैंड के माध्यम से नियंत्रित करने में इस तरह का सक्रिय योगदान पीनियल की महत्वपूर्ण भूमिका प्रतिपादित करता है।
8-यदि सरल शब्दों में आज्ञाचक्र का जागरण समझा जाए, तो यह विवेक का अनावरण कहलाएगा। इस विवेक का सहारा लेकर जब मनुष्य अपनी समस्त क्षमताओं को रचनात्मकता की ओर मोड़ लेता है, तो अचेतन की सुप्त संपदा के हीरे-मोती उसे प्राप्त हो जाते हैं। यही प्रसुप्त का जागरण है। शिवजी और दमयंती द्वारा क्रमशः कामदेव और बहेलिये को तीसरे नेत्र द्वारा जलाकर भस्म करने का जो पौराणिक आख्यान मिलता है, वह कोई आलंकारिक उल्लेख मात्र नहीं है, वरन् उसमें इसी ग्रंथि की शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाया गया है।
9-सर्वसामान्य में इस ग्रंथि की सक्रियता उतनी ही होती है, जितने से शरीरगत क्रिया प्रणाली सुचारु रूप से चलती रह सके। किन्तु जब इसे उत्तेजित कर जाग्रत् किया जाता है, तब यह अपनी सूक्ष्म शक्ति के साथ प्रकट होता और साधक के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण में ऐसा परिवर्तन लाता है, जिसे किसी भी प्रकार कायाकल्प स्तर से कम नहीं कहा जा सकता।दूरदर्शी विवेकशीलता इसका प्रथम लक्षण है।
10-जब यह शक्ति संपूर्ण रूप से उद्बुद्ध होती है, तो आदमी में अनेक प्रकार की आध्यात्मिक विभूतियों का प्रादुर्भाव होता और वह साधारण से असाधारण बन जाता है।यही वो पीनियल ग्लेंड है जो ब्रह्मांड में झांकने का माध्यम है। इसके जाग्रत हो जाने पर ही कहते हैं कि व्यक्ति के ज्ञान चक्षु खुल गए। उसे निर्वाण प्राप्त हो गया या वह अब प्रकृति के बंधन से मुक्ति होकर सबकुछ करने के लिए स्वतंत्र है। इसके जाग्रत होने को ही कहते हैं कि अब व्यक्ति के पास दिव्य नेत्र है।
11-ऐसा माना जाता है कि हर इंसान इस ग्रंथि का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाता।सोडियम फ्लुओराइड पिनियल ग्रंथि को कड़ा कर देता है।हमारे बहुत सी खाने-पीने की चीजों में सोडियम फ्लुओराइड होता है। इससे ये कम एक्टिव हो जाती है। इंसान के दैनिक जीवन और स्पिरिचुअल जीवन के बीच यही ग्रंथि जोड़ने का काम करती है।योग, मेडिटेशन करने से इस ग्रंथि को एक्टिव किया जा सकता है। भौतिक स्तर पर इसे प्रभावित करने का कोई उपाय नहीं है, पर आध्यात्मिक स्तर पर इसको उद्दीप्त करने के कितने ही उपाय-उपचार बताए गए है, जिनमें अगोचरी मुद्रा, शाम्भवी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, त्राटक, ध्यान-धारणा आदि प्रमुख है।
12-आयुर्विज्ञानियों के अनुसार आयु की रक्षा के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दर्पण में अपना मुख देखना चाहिए। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस समय पिटय़ूटरी और पीनियल ग्रंथि से विशेष रसायन निकलते हैं, जो हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति तथा स्मरणशक्ति बढ़ाते हैं। यही नहीं ब्रह्म मुहूर्त के शांत, शुद्ध और एकांत वातावरण में यदि पढ़ाई की जाए तो समझने और ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है।सूर्य देव पृथ्वी, जल व जीवन के जन्मदाता हैं, साथ ही वनस्पति जगत के माध्यम से हमें भोजन, वर्षा, जल और अनेक तरह की भौतिक सुविधाएं निरंतर प्रदान कर रहे हैं।लिहाजा हमें ब्रह्माण्ड के अधिपति चक्रवर्ती सम्राट सूर्य के सम्मान में ,उनके आगमन से पहले पूरी सजगता से करबद्ध होकर अभिवादन की तैयारी करनी चाहिए।
13-प्रभात में अपने ही हाथों का धन्यवाद भाव से दर्शन करना पूर्णत: वैज्ञानिक और व्यावहारिक कृत्य है। क्योंकि हम अपने सारे काम हाथों के माध्यम से करते हैं, जिसका प्रमाण यह भी है कि सदियों पुराने वेदों तथा पौराणिक ग्रंथों में सूर्य, नदी, जल, वायु पर्वत आदि जीवनदाताओं के प्रति आभार स्वरूप स्तुति और प्रार्थनाएं हैं।अच्छी शिक्षण पद्धति से मात्र जानकारी बढ़ती है | जिज्ञासाओ का समाधान होता है और नए नए प्रश्नों का जन्म होता है |परन्तु मानसिक शक्ति का विकास चित्त की समुचित एकाग्रता पर निर्भर है और यह ‘ध्यान योग’ द्वारा ही संभव है |
14-मस्तिष्क तीन भागो में बिभक्त है | मुख्य मस्तिष्क (सेरीब्रम) में मस्तिष्क की खोपड़ी कपाल के आगे, मध्य और पीछे का हिस्सा रहता है | मस्तिष्क का यह प्रदेश इडा नाड़ी से जुड़ा हुआ है और जागृत अवस्था में यह सक्रिय रहता है | गौण मस्तिष्क (सेरिवेलम) पिंगला नाड़ी से जुडा हुआ है और यह स्वप्नावस्था में सक्रिय होता है | तीसरा भाग है अधोस्थित मस्तिष्क (मेडुला आव्लंगाटा) जो मेरुदंड की शिखर है |मस्तिष्क का यह अत्यंत रहस्यमय प्रदेश है | सुषुम्ना नाड़ी से जुडा हुआ है यह | मस्तिष्क के इन तीनो भागो को एक सूत्र में बांधने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाड़ी है – गुह्यनी नाड़ी | यही नाड़ी चेतना शक्ति की वाहिका है|
15-गहरी सुसुप्ति में हम वही पहुँच जाते है जहाँ समाधि में पहुचते है | अंतर मात्र इतना ही होता है कि सुसुप्ति में हमें ज्ञान नहीं रहता जबकि समाधि में ज्ञान रहता है|तीसरी आँख पर तिलक लगा दिया जाये, तो पूरे शरीर को छोड़कर आपको उसी का स्मरण 24 घंटे रहने लगेगा | यह स्मरण पहला काम तो यह करेगा कि आपका शरीर बोध कम होता जायेगा और तिलक का बोध बढ़ता जायेगा और एक क्षण ऐसा आएगा कि आपको पूरे शरीर में केवल तिलक (अर्थात तीसरे नेत्र की जगह) का ही स्मरण रह जायेगा…और जिस दिन ऐसा हो जाये, उसी दिन आप तीसरी आँख खोलने में समर्थ हो सकते है |
16-तिलक से जुडी जितनी भी साधनाएं है उन सबका एकमात्र लक्ष्य है कि पूरे शरीर को भूल जाओ |यदि आप आँख बंद करके बैठ जाये और कोई व्यक्ति आपके भ्रूमध्य की तरफ अंगुली ले जाये तो बंद आँख से भी आपको भीतर अनुभव होना शुरू हो जायेगा कि कोई आँख की तरफ अंगुली किये हुए है |यही तीसरी आँख की प्रतीति है |चेतना पत्थर में सोती है,वनस्पति में जागती है, पशु में चलती है और मनुष्य में चिंतन करती है |अतः चिंतन करना मनुष्य की पहचान है|
तीसरी आँख का ऊर्जा से क्या सम्बन्ध है ?-
19 तथ्य;-
1-ऊर्जा प्रवाहित है, इससे ही आंखों में गति है।अगर तुम्हारी दो आंखें बिलकुल ठहर जाएं, स्थिर हो जाएं, पत्थर की तरह स्थिर हो जाएं, तो उनके भीतर ऊर्जा का प्रवाह भी ठहर जाता है। कंपन या गति ऊर्जा के कारण है। अगर ऊर्जा गति न करे तो तुम्हारी आंखें मुर्दों की आंखों जैसी हो जाएंगी—पथराई और मृत। किसी स्थान पर दृष्टि स्थिर करने से, इधर—उधर देखे बिना उस पर टकटकी बांधने से एक गतिहीनता पैदा होती है। जो ऊर्जा दोनों आंखों में गतिमान थी वह अचानक गति बंद कर देगी।
2-लेकिन गति करना ऊर्जा का स्वभाव है; ऊर्जा गतिहीन नहीं हो सकती। आंखें गतिहीन हो सकती हैं, लेकिन ऊर्जा नहीं। इसलिए जब ऊर्जा इन दो आंखों से वंचित कर दी जाती है, जब उसके लिए आंखों के द्वार अचानक बंद कर दिए जाते हैं, जब उनके द्वारा ऊर्जा की गति असंभव हो जाती है, तो वह ऊर्जा अपने स्वभाव के अनुसार नए मार्ग ढूंढने में लग जाती है। और तीसरा नेत्र निकट ही है, दो भृकुटियों के बीच, आधा इंच अंदर है। उस ऊर्जा के लिए वह निकटतम बिंदु है।
3-इसलिए जब ऊर्जा दोनों आंखों से मुक्त हो जाती है तो पहली बात यह होती है कि वह तीसरी आंख से बहने लगती है। यह ऐसा ही है जैसे कि पानी बहता हो और तुम उसके एक छेद को बंद कर दो, वह तुरंत निकटतम दूसरे छेद को ढूंढ लेगा। जो निकटतम छेद होगा और जो न्यूनतम प्रतिरोध पैदा करेगा, उसे पानी ढूंढ लेगा। वह छेद अपने आप ही मिल जाता है, उसके लिए कुछ करना नहीं पड़ता है। ज्यों ही इन दो आंखों से ऊर्जा का बहना बंद करोगे, त्यों ही ऊर्जा अपना मार्ग ढूंढ लेगी और वह तीसरी आंख से बहने लगेगी।
4-तब तुम ऐसी चीजें देखने लगते हो जिन्हें कभी न देखा था; ऐसी चीजें महसूस करने लगते हो जिन्हें कभी नहीं महसूस किया था। और तब तुम्हें ऐसी सुगंधों का अनुभव होगा जिन्हें जीवन में कभी नहीं जाना था। तब एक नया लोक, एक सूक्ष्म लोक सक्रिय हो जाता है। यह नया लोक अभी भी है। तीसरी आंख भी है, सूक्ष्म लोक भी है, दोनों हैं; लेकिन अप्रकट हैं। एक बार तुम उस आयाम में सक्रिय होते हो तो तुम्हें बहुत सी चीजें दिखाई देने लगेंगी।
5-उदाहरण के लिए, अगर कोई आदमी मरणासन्न है और तुम्हारी तीसरी आंख सक्रिय है तो तुम तुरंत जान लोगे कि यह आदमी अब जाने वाला है। कोई भी शारीरिक विश्लेषण, कोई भी चिकित्सा—निदान निश्चयपूर्वक नहीं बता सकता है कि यह आदमी मरेगा। वे ज्यादा से ज्यादा संभावना की बात कह सकते हैं; कह सकते हैं कि शायद यह आदमी मरेगा। यह वक्तव्य भी सशर्त होगा कि यदि ऐसी—ऐसी हालतें रहीं तो यह आदमी मरेगा, या यदि कुछ किया जाए तो यह नहीं मरेगा।
6-चिकित्सा—विज्ञान,इतने विकास के बावजूद अभी भी मृत्यु के संबंध में अनिश्चित है।असल में चिकित्सा—विज्ञान शारीरिक लक्षणों के द्वारा मृत्यु के संबंध में अपनी निष्पत्ति निकालता है। लेकिन मृत्यु शारीरिक नहीं, सूक्ष्म घटना है। यह किसी भिन्न आयाम की एक अदृश्य घटना है। मृत्यु का अपना प्रभाव होता है। अगर कोई मरने वाला होता है तो समझो कि मृत्यु ने पहले ही उस पर अपनी छाया डाल दी होती है। और तीसरी आंख से इस छाया को महसूस किया जा सकता है, देखा जा सकता है।
7-जब एक बच्चा जन्म लेता है तो जिन्हें तीसरी आंख के प्रयोग का गहरा अभ्यास है वे उसी क्षण उसकी मृत्यु का समय भी जान ले सकते हैं। लेकिन उस समय मृत्यु की छाया अत्यंत सूक्ष्म होती है। लेकिन .किसी की मृत्यु के छह महीने पहले वह व्यक्ति भी कह सकता है कि यह आदमी मरने वाला है जिसकी तीसरी आंख थोड़ी भी सक्रिय हो गई है। असल में उस समय तुम्हारे चारों तरफ एक काली छाया सघन हो जाती है और उसे देखा जा सकता है। लेकिन सामान्य आंखों से उसे नहीं देखा जा सकता है।
8-तीसरी आंख के खुलते ही तुम्हें लोगों का प्रभामंडल दिखाई देने लगता है। अब कोई आदमी आकर तुम्हें धोखा नहीं दे सकता है; क्योंकि अगर उसकी कथनी उसके प्रभामंडल से मेल नहीं खाती है तो वह कथनी दो कौड़ी की है। वह कह सकता है कि मुझे कभी क्रोध नहीं आता है, लेकिन उसका लाल प्रभामंडल बता देगा कि वह क्रोध से भरा है। वह तुम्हें धोखा नहीं दे सकता है। जहां तक उसके प्रभामंडल का सवाल है, उसे इसका कुछ पता नहीं है। लेकिन तुम उसका प्रभामंडल देखकर कह सकते हो कि उसका वक्तव्य सही है या गलत। तीसरी आंख के खुलते ही सूक्ष्म प्रभामंडल दिखाई देने लगते हैं।
9-पुराने जमाने में शिष्य की दीक्षा में प्रभामंडल का उपयोग किया जाता था। जब तक तुम्हारा प्रभामंड़ल सम्यक न तब तक गुरु प्रतीक्षा करेगा। यह तुम्‍हारे चाहने की बात है कि ‘मैं दीक्षा लेना चाहता हूं’ लेकिन उतना काफी नहीं है। तुम्हारा प्रभामंडल देखकर जाना जा सकता है कि तुम तैयार हो या नहीं। इसलिए शिष्य को वर्षों इंतजार करना पड़ता था। शिष्यत्व तुम्हारे चाहने पर नहीं तुम्हारे प्रभामंडल पर निर्भर है। चाह यहां व्यर्थ है।
10-उदाहरण के लिए, बुद्ध ने वर्षों तक स्‍त्रियों को दीक्षित करने से अपने को रोके रखा। यद्यपि उन पर बहुत दबाव डाला गया; और अंत में जब वे राज़ी भी हुए तो उन्‍होंने कहा कि अब मेरा धर्म पाँच सौ वर्षों के बाद जीवंत नहीं रहेगा; क्‍योंकि मैंने समझौता किया है।  क्‍या कारण था कि बुद्ध स्‍त्रियों को दीक्षित नहीं करना चाहते थे?एक बुनियादी कारण था जिसका संबंध प्रभामंडल से है। स्‍त्री मासिक धर्म नियमित घटता है—अचेतन, अनियंत्रित और अनैच्‍छिक। वीर्यपात को तो नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन मासिक स्‍त्राव को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। और यदि उसे नियंत्रित करने की कोशिश जाए तो उसके शरीर पर बहुत बुरे असर होंगे।
11-और स्‍त्री जब अपने मासिक काल में होती है, उसका प्रभामंडल बिलकुल बदल जाता है।जो भी नकारात्‍मक भाव है वह हर महीने स्‍त्री को एक बार घेरते है। इसी कारण बुद्ध ने कहा कि स्‍त्री की दीक्षा कठिन है; क्‍योंकि मासिक धर्म हर महीने वर्तुल में आता रहता है। और उसके साथ ऐच्‍छिक रूप से कुछ भी नहीं किया जा सकता।महावीर ने तो स्‍त्री पर्याय के लिए मोक्ष की संभावना को बिलकुल ही अस्‍वीकार कर दिया।उन्‍होंने कहा कि स्‍त्री को पहले पुरूष पर्याय में जन्‍म लेना होगा और तब उसे मोक्ष मिल सकता है।यह भी प्रभामंडल की समस्‍या थी।
12-लेकिन पिछले दो हजार वर्षों में इस दिशा में बहुत काम हुए है; विशेषकर तंत्र ने बहुत काम किया है। तंत्र ने भिन्‍न-भिन्‍न द्वार खोज निकाले है। तंत्र संसार में अकेला व्‍यवस्‍था है जो पुरूष और स्‍त्री में भेद नहीं करती है। बल्‍कि इसके विपरीत तंत्र का मानना है कि स्‍त्री अधिक आसानी से मुक्‍त हो सकती है। और कारण वही है; सिर्फ भिन्‍न दृष्‍टिकोण से देखा गया है।
13-तंत्र कहता है की क्‍योंकि स्‍त्री का शरीर समय-समय पर संयमित होता रहता है। इसलिए पुरूष की अपेक्षा स्‍त्री अपने को शरीर से ज्‍यादा सरलता से अलग कर सकती है। क्‍योंकि मनुष्‍य का चित शरीर से ज्‍यादा आसक्‍त है, इसलिए वह शरीर को संयमित कर सकता है। और इसीलिए वह अपनी कामवासना को भी संयमित कर सकता है। लेकिन स्‍त्री अपने शरीर से उतनी नहीं बंधी है। उसका शरीर स्‍वचालित यंत्र की तरह चलता है—एक अलग तल पर; और इसीलिए स्‍त्री अपने को अपने शरीर से अधिक आसानी से पृथक कर सकती है। और अगर यह अनासक्‍ति, यह अंतराल.. संभव हो ;तो कोई समस्‍या नहीं रह जाती है।
14-तो ये बात बहुत विरोधा भाषी है, लेकिन ऐसा है। यदि कोई स्‍त्री ब्रह्मचर्य धारण करना चाहे और अपने शरीर से पृथक रहना चाहे तो वह यह पुरूष की उपेक्षा अधिक आसानी से कर सकती है। एक बार शरीर से अनासक्ति सध जाए तो वह अपने शरीर को पूरी तरह भूल सकती है।पुरूष बहुत सरलता से नियंत्रण कर सकता है; लेकिन उसका चित उसके शरीर से ज्‍यादा बंधा है। इसी कारण से नियंत्रण उसके लिए संभव है; लेकिन यह नियंत्रण उसे रोज-रोज करना होगा… सतत करना होगा।
15-तो तंत्र ने अनेक-अनेक उपाय खोजें है।और तंत्र अकेली व्‍यवस्‍था है जो स्‍त्री-पुरूष में भेद नहीं करता और कहता है कि स्‍त्री पर्याय का उपयोग भी किया जा सकता है। तंत्र अकेला मार्ग है जो स्‍त्री को समान हैसियत प्रदान करता है।शेष सभी धर्म कहते कुछ भी हों, अपने अंतस में यही समझते है कि स्‍त्री हीन पर्याय है। चाहे ईसाइयत हो, इस्‍लाम हो, जैन हो या बौद्ध हो, सब गहरे में यही मानते हे कि स्‍त्री हीन पर्याय है। और इस मान्‍यता का कारण वही है—तीसरी आँख द्वारा किया गया निदान। हर महीने मासिक धर्म के समय स्‍त्रियों का प्रभामंडल बदल जाता है।
16-तीसरी आँख के जरिए तुम उन चीजों को देखने में समर्थ हो जाते हो,जिन्‍हें सामान्‍य आंखों से नहीं देखा जा सकता। देखने की जितनी विधियां है वे सभी तीसरी आँख को प्रभावित करती है। कारण यह है कि देखने में जो ऊर्जा बाहर की और, संसार की और प्रवाहित होती है, वह अचानक रोक दिए जाने के कारण बहने के नए मार्ग ढूँढ़ती है और निकट पड़ने के कारण तीसरी आँख पर पहुंच जाती है।
17-तिब्‍बत में तो तीसरी आँख के लिए शल्‍य-चिकित्‍सा तक का उपाय किया गया था। कभी-कभी ऐसा होता है कि हजारों वर्षों से निष्‍क्रिय पड़े रहने के कारण तीसरी आँख बिलकुल बंद हो जाती है, मूंद जाती है। इस हालत में अगर तुम सामान्‍य आंखों की गति रोक दो तो तुम बेचैनी महसूस करोगे। कारण यह है कि आँख की ऊर्जा को गति करने का मार्ग नहीं मिला। इस ऊर्जा को मार्ग देने के लिए तिब्‍बत में तीसरी आँख की आपरेशन किया जाने लगा।
18-उदाहरण के लिए,एक संन्‍यासिनी भयभीत थी कि उसकी तीसरी आँख पर बहुत जलन महसूस हो रही है। पता नहीं क्‍या हो रहा है।ऐसा लगता था कि किसी ने बाहर से उसकी चमड़ी जला दी थी। जलन तो भीतर थी लेकिन उससे ऊपर की चमड़ी तक प्रभावित हो गई थी। साथ ही उसे वह जलन प्रीतिकर भी लगती थी ..मानों कोई चीज गल रही हो। कुछ घटित हो रहा था और उससे स्‍थूल शरीर भी प्रभावित था ..मानों असली आग ने उसे छू दिया हो।
19-कारण यह था कि तीसरी आँख सक्रिय हो गई थी। उसकी और ऊर्जा प्रवाहित होने लगी थी। जन्‍मों-जन्‍मों से यह आँख ठंडी पड़ी थी कभी उससे ऊर्जा प्रवाहित नहीं हुई थी। इस लिए जब पहली बार ऊर्जा का प्रवाह आया तो वह गर्म हो उठी, जलन होने लगी। और क्‍योंकि मार्ग अवरूद्ध था, इसलिए ऊर्जा आग जैसी उत्‍तप्‍त हो गई। इस तरह वह तीसरी आँख पर इकट्ठी ऊर्जा चोट करने लगी थी।भारत में हम इसके लिए चंदन, या घी तथा अन्‍य चीजों का उपयोग करते है। उन्‍हें तीसरी आँख पर लगाते है और उसे तिलक कहते है। उसे तीसरी आँख की जगह पर लगाकर बाहर से थोड़ी ठंडक दी जाती है। ताकि भीतर की गर्मी से, जलन से बाहर की चमड़ी न जले।

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