सुशांत की आत्महत्या से उपजते अध्यात्मिक सवाल- अतुल विनोद

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सुशांत की आत्महत्या से उपजते अध्यात्मिक सवाल- अतुल विनोद

यूं तो इस दुनिया में रोज लाखों लोग आत्महत्या करते हैं| लेकिन कुछ सुसाइड केसेस सुर्खियां बटोरते हैं| सुशांत सिंह की आत्महत्या रोज होने वाली अनेक लोगों की आत्महत्याओं में से एक है| लेकिन यह केस चर्चा का विषय है क्योंकि सुशांत सिंह बॉलीवुड के जाने-माने एक्टर थे| एक चमकते हुए सितारे का मौत को गले लगा लेना लोगों के गले नहीं उतर रहा है|

मृत्यु अटल सत्य है| और कहते हैं कि जन्म के साथ ही मृत्यु की तारीख तय हो जाती है| एक और बड़ी बात जो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन कहता है| वो की मृत्यु कैसे और किस माध्यम से होगी यह भी प्रकृति से तय होता है|

भले ही ईश्वर के विधान में सब कुछ पहले से तय हो या फिर इंसान को मिली कर्म की स्वतंत्रता उसे अपनी मृत्यु का वरण करने का अधिकार भी देती हो| दोनों ही स्थितियों में हम आत्महत्या के साथ खड़े नहीं हो सकते|

आत्महत्या जायज़ नहीं ठहराई जा सकती| मौत को गले लगाने वाला कोई कायर नहीं बल्कि साहसी व्यक्ति होता है| और अपनी हत्या का साहस सामान्य परिस्थितियों से पैदा नहीं होता| इसके पीछे जरूर कोई ठोस वजह होती है| जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाती है की मृत्यु के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं दिखता| इसका दूसरा पहलू ये है कि व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से मुकाबला करने में खुद को अक्षम पाता है|

एक ही तरह की परिस्थिति में एक व्यक्ति सरवाइव कर जाता है और दूसरा व्यक्ति फांसी के फंदे पर झूल जाता है|

मन का खेल है| मन यदि साथ छोड़ दे तो व्यक्ति के पास मृत्यु के वरण के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रहता| और मन सध जाए तो जीवन में मौजूद कोई भी परेशानी टिक नहीं सकती|

हर परिस्थिति एक न एक दिन बदल जाती है| बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है आज जो है कल नहीं रहेगा| हम खुद भी पल-पल बदलते रहते हैं| हर क्षण हमारे अंदर की सेल(KOSH) अपने आप को परिवर्तित कर देते हैं|

लोग आम लोगों की आत्महत्या को संजीदगी से नहीं लेते| कोई पसंदीदा कलाकार जिससे वो परिचित हो जिसकी कई फिल्में वह देख चुके हो, उसका जाना उनके लिए ऐसा होता है जैसे कि कोई अपना चला गया|

सेलिब्रिटी की आत्महत्या पर टीवी चैनल्स और मीडिया में चर्चा भी बहुत होती है| इसका गहरा असर आम जनजीवन पर पड़ता है| सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) इस दुनिया का हिस्सा नहीं हैं. बिहार के पूर्णिया से मुंबई तक उनका सफर सपने जैसा रहा. उनकी मृत्यु पर सब चकित हैं|

सुशांत सिंह जिंदा थे तब शायद मीडिया की निगाह उन पर नहीं पहुंची होगी| लॉकडाउन में सुशांत क्या करते रहे शायद किसी के इंटरेस्ट का विषय नहीं रहा होगा| लेकिन मरने के बाद चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ सुशांत है|

एक व्यक्ति जब फिल्मी दुनिया में जीवित रहता है तो उसकी कदर नहीं होती| वो अपने कैरियर में कितना ही गोते लगाते रहे, शायद ही उसकी मदद के लिए कोई खड़ा होता|

फिल्मों की चकाचौंध में न जाने कितने चेहरे निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं और गुमनाम हो जाते हैं|

लोग इसलिए परेशान होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सब कुछ तो था, पैसा भी दिख रहा था नेम और फेम भी | हम जिस जिंदगी की कल्पना करते थे इस व्यक्ति के पास थी फिर भी ये क्यों खुदसे मर गया?

किन लोग भूल जाते हैं कि जिंदगी में सिर्फ भौतिक स्तर पर कुछ हासिल कर लेना ही सब कुछ नहीं है| अध्यात्म में भौतिक यानी शरीर के स्तर के अलावा तीन और स्तर का महत्व समझा गया है|

मन, मस्तिष्क और आत्मा| शरीर को तवज्जो देने वाले अक्सर मन, मस्तिष्क और आत्मा को भूल जाते हैं| इसलिए जीवन में असंतुलन हो जाता है| मन की कमजोरी और मस्तिष्क का रासायनिक गड़बड़झाला, भौतिक स्तर पर सब कुछ होने के बावजूद भी अस्तित्व को चुनौती देने लगता है|

चकाचौंध की रोशनी से नहाए हुए बॉलीवुड में मन,मस्तिष्क और आत्मा के स्तर पर हमेशा अंधेरा देखा गया| इसीलिए सिर्फ नेम फेम और पैसे की दूधिया रोशनी में नहाने वाले कलाकार सब कुछ होते हुए भी अंदर से खोखले होते चले जाते हैं| भूल जाते हैं कि उन्हें अपने मन मस्तिष्क और आत्मा की समृद्धि पर भी ध्यान देना चाहिए था|

आत्महत्या मनुष्यता की अवहेलना है| बड़े भाग्य से यह मनुष्य का तन मिलता है और व्यक्ति उस के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक करने की वजह सिर्फ भौतिक चकाचौंध में अपने आप को खपा देता है| यहीं शायद उससे बहुत बड़ी चूक हो जाती है|

आसमान की तरफ देखने वाला व्यक्ति यह नहीं देखता कि नीचे लोग कैसे जीवन जीते हैं| अपने ईगो को संतुष्ट करते-करते वह भूल जाता है कि जीवन वाकई सुख के साथ दुख को साथ ले चलने का नाम है| समृद्धि के साथ खालीपन और कमियों को भी झेलना पड़ता है|

हमने देखा कि कैसे लॉक डाउन के दौर में मजदूरों ने साहस और संघर्ष के दम पर विपरीत परिस्थितियों में भी जिजीविषा के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा करके जीवन की सार्थकता संबल दिया| अपना सब कुछ लुटाने के बाद भी वह जीवन के साथ खड़े रहे चलते रहें आगे बढ़ते रहे|

हम उन लोगों के साथ हैं| जो आज विपरीत परिस्थितियों के बीच भी मनुष्यता का झंडा लहराए हुए हैं| जो लोग अपनी रोजी-रोटी छिन जाने के बावजूद भी संघर्ष की पगडंडियों पर लगातार चल रहे हैं|

पेट की आग, भविष्य की अनिश्चितता लिए प्रवासी मजदूरों ने किसी का घर नहीं जलाया है! सहा है! जीवन सहने से बनता है. धैर्य खोने से नहीं. अगर किसी को जीवन सीखना है तो उसे इन अप्रवासी मजदूरों की ओर देखना चाहिए. सुशांत की ओर नहीं.

आत्महत्या फैशन ना बन जाए| इसलिए संघर्ष के उस पहलू में जीवित लोगों की कहानियों को सबके सामने लाना| युवा पीढ़ी को बताना होगा कि संघर्ष दुख कष्ट और पीड़ा जीवन के सिक्के के वो पहलू है जो हमेशा साथ चलते हैं|

जैसे सफलता मिलती है उसे 1 दिन असफलता झेलना ही पड़ता है| सफलता के पीछे असफलता बाहें फैलाकर खड़ी हुई है| प्रकाश के पीछे अंधेरे का गहरा साम्राज्य है| जीवन अस्तित्व के दोनों पहलुओं को साथ लेकर चलने का नाम है| जितना सुख है उतना ही दुख, जितना प्रेम है उतना ही तिरस्कार, जितनी सफलता है उतनी ही असफलता|

जिसको भी जीवन में सफलता चाहिए उसे असफलता के लिए तैयार रहना होगा| जिसको भी नाम मिलेगा उसे उतनी ही गुमनामी भी मिलेगी | हमारे देश के शीर्ष राजनेताओं को ले लीजिए चाहे वह नरेंद्र मोदी हो या राहुल गांधी| इन्हें जितना यश मिलता है उतना ही अपयश भी मिलता है| यह जितने हिट होते हैं उतने ट्रोल भी|

इनको जनता का जितना समर्थन मिलता है उतना ही विरोध भी झेलना पड़ता है|

इसी तरह से हमारे देश के महान पुरुषों को ले लीजिए महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता का सम्मान मिलता है तो कई जगह उनका मखौल भी उड़ाया जाता है| उन्हें देश को आजाद कराने का श्रेय मिलता है तो देश की वर्तमान कमजोरियों के लिए उन्हें जिम्मेदार भी ठहराया जाता है| गांधी को देश में सर आंखों पर बिठाया तो उन्हें अपने सीने में गोली भी खाली पड़ी|

अमिताभ बच्चन ने सफलता के दिन देखें तो असफलता का वो दौर भी देखा जब वो कर्ज में डूब गए थे| उन्होंने अच्छी सेहत और चमक-दमक भरी दुनिया देखी एक एक्सीडेंट से मौत का सामना भी किया|

एक नहीं अनेक उदाहरण है और जिस भी व्यक्ति को आप ऊपर देखेंगे उस व्यक्ति के जीवन में आपको हमेशा द्वंद और विपरीत का अस्तित्व भी दिखाई देगा|

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