क्या होता है साबूदाना? साबूदाने के मोती बनते कैसे हैं ?

क्या होता है साबूदाना? साबूदाने के मोती बनते कैसे हैं ?
क्या होता है साबूदाना:-


माना जाता है की टैपिओका को 1943-44 के बीच में दक्षिण अमेरिका से सबसे पहले तमिलनाडु के सेलम में लाया गया। शायद इसीलिए आज भी टैपिओका का सबसे बड़ा उत्पादक तमिलनाडु ही है। तमिलनाडु और केरल में इसे उबालकर मछली के साथ खाया जाता है। इसे पतला काटकर इसके चिप्स भी बनाए जाते हैं। 

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पूर्वोत्तर भारत के कई इलाकों में भी टैपिओका को खाने में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इससे बनने वाला साबूदाना सबसे ज़्यादा मध्य और उत्तर भारत में लोकप्रिय है। खिचड़ी, कटलेट, खीर या फिर पापड़। किसी न किसी रूप में साबूदाने को भारत में पसन्द किया जाता है।  

दिलचस्प बात यह है कि इतना पसन्द की जाने वाली इस चीज़ के बारे में हम बहुत कम जानते हैं। यहाँ तक कि हममें से कई लोगों को यह भी नहीं पता कि साबूदाना किससे और कैसे बनता है। तो चलो, क्यों न इन दानों के सफर के बारे में कुछ जानें ?

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पहले एक बात जान लो कि दुनिया भर में ये दाने दो किस्म के होते हैं। एक का सफर पाम के पेड़ से शुरू होता है। पाम पौधों का वो परिवार है जिसके सदस्य नारियल, खजूर, छींदा, ताड़ हैं। और साबूदाने की दूजी किस्म का सफर शुरू होता है टैपिओका से। हमारे देश में जो साबूदाना हम खाते हैं, वो बनता है टैपिओका से।


टैपिओका:- आलू की तरह ही ज़मीन के नीचे उगता है। यह उस पौधे की जड़ है यानी कि यह एक कंद है। दिखने में यह लगभग शकरकंद जैसा ही होता है। बाहर से भूरा और अन्दर से यह सफेद दिखता है। केरल में कप्पा, तमिलनाडु में मार्विलकेयंग और आन्ध्रप्रदेश जाओ तो इसे कारापेंडलम नाम से जाना जाता है। 

ये ज्यादातर इन्हीं प्रदेशों में उगाया जाता है। साबूदाने की जितनी भी खिचड़ी और बड़े मध्य और उत्तर भारत में खाए जाते हैं, उसके लिए हम तमिलनाडु के सेलम शहर पर निर्भर हैं। यहाँ पर देश का 90 प्रतिशत साबूदाना बनता है।


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साबूदाने के मोती बनते कैसे हैं:-


चूँकि साबूदाने टैपिओका कंद है, इसलिए पूरे पौधे को उखाड़कर ही इन्हें इकट्ठा किया जाता है। हालाँकि पौधों के तनों के टुकड़ों को लगाकर भी इनकी अगली फसल तैयार हो सकती है। पौधे से अलग होने के बाद सारे कंद एक ट्रक में भरकर फैक्ट्री में ले जाए जाते हैं। 

टॅपिओका से कुछ भी बनाने से पहले उसका भूरे रंग का छिलका छीला जाता है। साबूदाना बनाने के लिए भी सबसे पहले यह छिलका निकाला जाता है। फिर इन्हें पानी से दो-तीन बार अच्छे से साफ किया जाता है। उसके बाद इन्हें मशीन से अच्छी तरह से पीसा जाता है, ताकि इनका पल्प बन जाए। 



इस पल्प की फिर छँटाई की जाती है, ताकि उससे स्टार्च व फाइबर अलग हो जाएँ। इस प्रक्रिया से निकले दूध को बड़ी-बड़ी टंकियों में भरकर सुखाया जाता है, जब तक कि वह पाउडर न बन जाए। ये टंकियाँ काफी अन्दर, प्रदूषण से सुरक्षित ऐसी जगहों में होती हैं जहाँ धूप भी पड़ती हो।

हल्की-सी नमी वाले ये पाउडर के ढल्ले फिर मशीन में जाते हैं। ऐसी मशीन में, जिसमें इन्हें लगातार उचकाया जाता है और ये आगे-पीछे डाँस करते हुए छोटे-बड़े गोलों का रूप ले लेते हैं। और फिर ये पहुँचते हैं एक दूसरी मशीन में जो एक छन्नी की तरह काम करती है। यहाँ इनको बचे-खुचे पाउडर से अलग किया जाता है। 

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आखिर में कुछ लोग मिलकर इनकी थोड़ी और छँटाई करते हैं ताकि लगभग समान आकार के गोलों के ढेर इकट्ठे हो जाएँ। थोड़ा और सुखाने व सफाई के साथ खतम होता है। टेपिओका से साबूदाना बनने का सफर। साबूदाने के मोतियों में बदलने के बाद इनका दूसरा सफर शुरू होता है। और यह सफर ख़त्म होता है देश के अलग-अलग कोनों में आपके-मेरे घरों की कढ़ाहियों में।

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