क्या था वो कल गवाही उसके टूटे घर मे है – दिनेश मालवीय “अश्क”

 

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क्या था वो कल गवाही उसके टूटे घर मे है
सिक्के उछाल फिर रहा जो अब शहर मे है।

पहचान जिससे थी कभी कुल ख़ानदान की
अजनबी वो शख्स अब अपने ही घर मे है।

उसको नहीं समझाओ समझदारों कुछ अभी
अंगूर की बेटी के अभी वो असर मे है।

झुक गये थे कल ज़रा तहजीब के आगे
अब तलक तकलीफ कुछ उनकी कमर मे है।

जो ठगों ऐय्यारों की है जुबां मे यार
मिठाई वैसी कहाँ मिसरी शकर मे है।

कर रहा गलबहियाँ खुलकर राहजन के साथ
अब भी क्या तुमको भरोसा राहबर मे है।

लंबी तक़रीरों मे ओ’ मजमून मे कहाँ
मग़्ज़ तो होता बयाने-मुक्तसर मे है।

आप उनसे ज़्यादा कुछ उम्मीद न रखिये
आपकी न हैसियत उनकी नज़र मे है।

“अश्क” पढ़ने वाला भी तो हो यहाँ कोई
राज़े-उल्फ़त लिख्खा मेरे चश्मे-तर मे है

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