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“अमृत काल” संसद और देश की “गरीबी”  -राकेश दुबे 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 19 Jun

सार

राहुल बहुत अच्छे वक्ता नहीं माने जाते, लेकिन ‘दो भारत’ वाला तर्क निश्चित रूप से ध्यान आकर्षित करने वाला था, आंकड़े कहते हैं, देश में शीर्ष के दस प्रतिशत लोगों के पास आज जितनी सम्पत्ति है उतनी देश की आधी आबादी की कुल सम्पत्ति भी नहीं है. यही हैं दो भारत, की तस्वीर....

janmat

विस्तार

वैसे तो राहुल बहुत अच्छे वक्ता नहीं माने जाते, पर कई सालों से देश के बौद्धिक् जगत में व्याप्त ‘दो भारत’ वाला तर्क का दोहराय जाने वाला उनका यह भाषण निश्चित रूप से ध्यान आकर्षित करने वाला था। और हो भी क्यों न हो ,यह तथ्य अपने आप में भयावह है कि स्वतंत्रता के इस कथित ‘अमृत-काल’ में देश की अधिसंख्य आबादी गरीबी का जीवन जी रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के लगभग साढ़े आठ करोड़ नागरिक घोर गरीबी में जीते हैं। 15 करोड़ और भारतीय गरीबी रेखा से नीचे की स्थिति में पहुंचने की कगार पर हैं। इसके विपरीत देश में अरबपतियों की संख्या में वृद्धि आर्थिक विषमता की बढ़ती खाई की भयावहता साफ़ दिख रही है।

आंकड़े कहते हैं, देश में शीर्ष के दस प्रतिशत लोगों के पास आज जितनी सम्पत्ति है उतनी देश की आधी आबादी की कुल सम्पत्ति भी नहीं है। यही हैं दो भारत, की तस्वीर | इनके बीच की खाई को पाटना ज़रूरी है और यह काम नहीं हो रहा। सरकार ओ प्रतिपक्ष लुभावने नारे और भाषण दे रहा है |इस परिस्थिति का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन होना चाहिए। जो होता नहीं दिख रहा है | आर्थिक विषमता देश में नवीन विषय की तरह नहीं उभरा है । आज से आधी सदी पहले 1963 से हमारी संसद में इस विषय को लेकर बहस करती आ रही है, नतीजा नहीं निकल रहा है।

तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा-व्यवस्था पर 25 हज़ार रुपये प्रतिदिन खर्च होने का सवाल उठाते हुए समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने ‘पंद्रह आना बनाम तीन आना’ की आय का सवाल खड़ा किया था। तब सरकार की ओर से कहा गया था कि देश की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय पंद्रह आना है, इसके विपरीत डॉ. लोहिया ने सरकारी आंकड़े देते हुए बताया था कि देश का नागरिक तीन आना प्रतिदिन पर गुज़र-बसर करने के लिए बाध्य है। तब भी सरकार के मुखिया ने इसे मजाक में उड़ाने की कोशिश नहीं की थी। दुर्भाग्य से आज हमारी संसद में शोर-शराबे में समय अधिक व्यय होता है। कभी-कभार ही कोई गम्भीर बहस होती नहीं दिखती है।

प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष की आलोचना का उत्तर देते हुए भले ही जवाहरलाल नेहरू को उद्धृत करें, पर उन्हें उन जैसी ऊंचाई पाने में अभी समय लगेगा । देश के पहले प्रधानमंत्री ने संसदीय जनतंत्र की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए, ‘काम के प्रति निष्ठा, सहयोग-सहकार की आवश्यकता, स्वानुशासन और संयम बरतने की महत्ता’ की बात कही थी। नेहरू से राजनीतिक विरोध हो सकता है पर उनके इस कथन की उपयोगिता और उपयुक्तता के बारे में संदेह नहीं किया जाना चाहिए।यह सब करके हम अपनी योग्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा लेते हैं |

इस सरकार के पास बहुमत है, अत: धन्यवाद प्रस्ताव तो पारित होना प्रक्रिया मात्र है। इसके विपरीत वस्तुत:यह एक ऐसा अवसर होता है जब हमारे सांसद, सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष दोनों, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर गम्भीर चिंतन-मनन कर सकते हैं। दुर्भाग्य से, अक्सर ऐसा होता नहीं। अक्सर अनावश्यक आरोप-प्रत्यारोप बहस पर हावी हो जाते हैं। इस मौके पर जिस गम्भीरता की आवश्यकता होती है, उसका अभाव साफ़ –साफ दिखता एवं खलता है। लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के दौरान कोरम का खतरा उत्पन्न होना , चिंता का विषय है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस को विपक्ष और सत्तारूढ़ पक्ष दोनों को गम्भीरता से लेना होगा।

सत्तारूढ़ पक्ष को यह तो दिख गया कि ‘दो भारत’ की बात उठाने वाला प्रधानमंत्री के उत्तर को सुनने के लिए उपस्थित नहीं था। यह किस बात का संकेत है ? हमारी भी यह धारणा है कि संसद जनतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है। उसकी महत्ता और पवित्रता की रक्षा करना जनतंत्र के हर नागरिक का कर्तव्य है, लेकिन सांसदों का दायित्व और ज़्यादा होता है। बहुमत का आदर होना चाहिए, पर बहुमत के नाम पर तार्किकता को अनावश्यक मानना तो ज्यादा गलत है। इसलिए, सत्ता पक्ष को विपक्ष के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए और विपक्ष को भी मर्यादा में रहना चाहिए।