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पावर के लिए डीएमके से धोखा

सार

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों से केरलम में जीत के बाद भी राहुल गांधी की राजनीतिक ताकत ढलान पर दिखाई पड़ रही है. तमिलनाडु में जिस तरह से कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़कर सत्ता की राजनीति की है, उससे उनके गठबंधन की विश्वसनीयता को धक्का लगा है..!!

janmat

विस्तार

    राष्ट्रीय स्तर पर उनका गठबंधन टूट गया है. डीएमके अब लोकसभा में कांग्रेस से अलग बैठने का स्पीकर से अनुरोध कर चुकी है. 

    कांग्रेस हमेशा सत्ता के लिए राजनीति करती है. राहुल गांधी का डीएनए भी उसी को आगे बढ़ाने में लगा है. जब से वह राजनीति में आए हैं, तब से कांग्रेस को अकेले और गठबंधन के रूप में नुकसान ही उठाना पड़ रहा है. केंद्र में बीजेपी की सरकार आने के बाद तो कांग्रेस तमाम कोशिशों के बाद भी गठबंधन के सहयोगियों का भरोसा नहीं जीत पाई है. डीएमके उसका सबसे बड़ा और पुराना सहयोगी था. तमिलनाडु चुनाव में जब उसे पराजय मिली तब बिना चर्चा किए अचानक कांग्रेस ने टीवीके के विजय को अपना समर्थन दे दिया. 

    डीएमके ने इसकी निंदा की और कांग्रेस से अपना गठबंधन तोड़ दिया. अभी फिलहाल कांग्रेस को इससे सत्ता में हिस्सेदारी का लाभ दिखाई पड़ रहा है, लेकिन भविष्य की राजनीति में टीवीके भी उनके साथ कितनी दूर तक चलेगी यह कहना अभी मुश्किल लगता है.

    केरलम में कांग्रेस को गठबंधन के साथ स्पष्ट बहुमत मिला है. कांग्रेस वहां भी सीएम तय नहीं कर पाई है. मुख्यमंत्री पद के लिए कशमकश चल रही है. कांग्रेस जो भी निर्णय लेगी, वह उसके लिए दूरगामी रूप से अब नुकसानदेह ही साबित होगा. अगर के. सी. वेणुगोपाल के पक्ष में निर्णय आता है तो वहां का स्थानीय नेतृत्व और गठबंधन सहयोगी मजबूरी में भले स्वीकार कर लें. लेकिन कांग्रेस शासित दूसरे राज्यों की तरह वहां भी खींच-तान चलती ही रहेगी. जो कर्नाटक में दिखाई पड़ रहा है, सीएम और डिप्टी सीएम के बीच कुर्सी रेस हो रही है. इससे पहले राजस्थान में कुर्सी की रेस में ही पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा. कांग्रेस की नीतियों के कारण कुर्सी रेस केरलम में भी चालू हो जाएगी.

    कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अपने दम पर बीजेपी का मुकाबला करने में सक्षम दिखाई नहीं पड़ रही है. गठबंधन की राजनीति उसकी मजबूरी है. कांग्रेस ने जब भीगठबंधन की राजनीति की है, तो हमेशा गठबंधन सहयोगियों को धोखा ही दिया है. केंद्र में जितनी भी सरकारें कांग्रेस के सहयोग से बनी थीं, उन सब को कांग्रेस ने ही गिराने का काम किया था. 

     डीएमके के साथ कांग्रेस का गठबंधन टूटने के बाद गठबंधन सहयोगियों के बीच राहुल गांधी की राजनीतिक विश्वसनीयता को धक्का लगा है.

    कांग्रेस के तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और पीएम नरेंद्र मोदी हैदराबाद की एक सभा में एक साथ मंच पर थे. जिस तरह से कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने पीएम की तारीफ की. उन्होंने कहा कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब पीएम मनमोहन सिंह ने गुजरात कोपर्याप्त राशि दी. जिससे मोदी गुजरात का विकास मॉडल विकसित कर सके. रेवंत रेड्डी ने पीएम मोदी से तेलंगाना के लिए वैसे ही सहयोग की अपेक्षा की. इस पर प्रधानमंत्री ने उन्हें ज्यादा धन  देने को आश्वस्त करते हुए कहा कि वह उनके साथ आ जाएं तो बेहतर होगा. रेवंत रेड्डी और पीएम नरेंद्र मोदी की बातचीत पर गंभीर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं.

    असम में भी राहुल गांधी की राजनीतिक विश्वसनीयता सबसे नीचे में पायदान पर पहुंच गई है. अपनी सभाओं में वह जिस नेता को सरकार बनने पर जेल की सीखचों में बंद करने की धमकी दे रहे थे, उसको राज्य के लोगों ने प्रचंड बहुमत से फिर से मुख्यमंत्री बना दिया है. 

    राहुल गांधी जब पहली बार राजनीति में आए थे, तब ना केवल कांग्रेस को बल्कि देश की जनता को भी उनसे बहुत उम्मीदें थीं. ऐसा माना जा रहा था कि वह कांग्रेस में बुनियादी बदलाव लाने में सफल होंगे और ऐसे मुद्दे गढ़ेगे जिससे जनता कांग्रेस के प्रति जुड़ेगी. जहां भी कांग्रेस की सरकार बनेगी. वहां गवर्नेंस का ऐसा मॉडल पेश किया जाएगा, जो बीजेपी की सरकारों के परफॉर्मेंस से बेहतर होगा. जहां भी कांग्रेस की सरकारें बनीं वहां कुछ भी नया देखने को नहीं मिला.

    मोदी विरोध में राहुल गांधी जिस तरह से राष्ट्र विरोध से भी नहीं हिचकते हैं, उससे भी उनकी विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है. भारत को डेड इकोनॉमी  कहना पाकिस्तान से युद्ध में ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाना और हर चुनाव में जनादेश को वोट चोरी के रूप में बिना प्रमाणित किए उनकी बातें उन्हें ही नुकसान पहुंचा रही हैं. पब्लिक उनके किसी भी मुद्दे को भरोसा नहीं करती है. हर चुनाव के परिणाम तो यही साबित कर रहे हैं. राहुल गांधी उन्हीं मुद्दों को दोहराते रहते हैं .

    राहुल गांधी के साथ कांग्रेस की विरासत है. सत्ता की राजनीति से दूर होने के बाद भी कांग्रेस की विरासत के साथ अभी भी मतदाताओं की बड़ी संख्या पूरे देश में मौजूद है. बीजेपी से लड़ाई को राहुल गांधी निर्णायक मोड़ नहीं दे पा रहे हैं. ना वह क्षेत्रीय दलों का पूरी तरह से सहयोग ले पा रहे हैं और ना अकेले कांग्रेस इस दिशा में सफल हो रही है.

    राहुल गांधी को सांसद बने बीस साल से ज्यादा समय हो गया है. उनकी सारी संभावनाएं अपना करतब अब तक तो नहीं दिखा सकी हैं. अब तो उम्र भी ढल रही है. अब उनसे राजनीति में नएपन की संभावना भी ढलान पर दिख रही है. उनकी बातें और मुद्दे उनकी कोटरी को ही समझ आती होगी. देश को तो समझ नहीं आ रहा है. कांग्रेस को जो समर्थन अभी मिल ही रहा है, वह विरासत के कारण है. इसका क्रेडिट केवल राहुल गांधी को नहीं जा सकता. 

    राजनीतिक विश्वसनीयता की पूंजी के बिना कोई भी नेता या पार्टी अब तक तो सफल नहीं हुई है. राहुल गांधी राजनीतिक ताकत जरूर हैं, लेकिन विश्वसनीयता की ताकत खोते जा रहे हैं.