कट्टरता और आतंकवाद के खिलाफ शुरू हुआ अमेरिकाऔर इजरायल का ईरान से युद्ध अब पूरे पश्चिम एशिया में फैल गया है. ईरान मुस्लिम देशों पर भी अटैक कर रहा है..!!
युद्ध की शुरुआत ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए की गई. हमले के पहले दिन ही ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या हो गई. ईरान शिया मुस्लिम राष्ट्र है, बाकी अधिकांश मुस्लिम देश सुन्नी बाहुल्य हैं. अब तो ईरान सिर्फ अमेरिका और इजराइल से ही नहीं उनके मित्र मुस्लिम देशों से भी युद्ध कर रहा है. जंग में मुस्लिम एकता छिन्न-भिन्न हो गई है.
युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. पीएम नरेंद्र मोदी और भारत सरकार ने यही स्टैंड लिया है. राष्ट्रहित भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और उन्हें वापस लाने के प्रयास शुरू हो गए हैं.
वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्र की सुरक्षा, राष्ट्रीय हितों की रक्षा, लोगों की सुरक्षा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय जगत में राष्ट्र के महत्व को प्रतिपादित करने वाली नीति ही सर्वोपरि है, यही विदेश नीति है और यही कूटनीति है. अमेरिका अपनी ताकत का दुरुपयोग कर रहा होगा लेकिन इजराइल तो इस्लामिक कट्टरता से अपनी आत्मरक्षा के लिए युद्ध लड़ने का आदी है.
भारत सरकार ने जो भी स्टैंड लिया है उस पर आंतरिक राजनीति चरम पर है. ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या को लेकर सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए जा रहे हैं. कांग्रेस नेता सोनिया गांधी भारत सरकार के स्टैंड की खुली आलोचना कर रही हैं. सार्वजनिक लेख में वे कह रही हैं कि सरकार का रुख भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा कर रहा है. वे संसद में इस पर चर्चा की मांग कर रही हैं.
ईरान के सुप्रीम लीडर एक धार्मिक नेता थे. वे किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे. इसलिए उनकी हत्या पर सरकार का शोक व्यक्त करना बाध्यता नहीं है. विदेश नीति में बोलने से ज्यादा चुप रहना कई बार राष्ट्रीय हित साधता है. विदेश नीति का गुटनिरपेक्ष दौर अब नहीं बचा है. विश्व की बदलती परिस्थितियों में देशहित के मुताबिक सरकार को निर्णय लेने का पूरा अधिकार है.
ईरान परंपरागत रूप से भारत का मित्र रहा है लेकिन इस्लामिक कट्टरता से भारत नेआतंकवाद का जो दंश झेला है वह किसी से छिपा नहीं है. पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भारत की सबसे बड़ी समस्या है. इस्लामी देशों से भारत के बेहतर संबंध है, भारत और पीएम मोदी की विदेश नीति और इस्लामी देशों से संबंधों का ही परिणाम है कि अधिकांश मुस्लिम देशों ने मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया है.
ईरान और अमेरिका के बीच जो भी शांति वार्ता अब तक होती रही है उनमें मध्यस्थ खाड़ी के मुस्लिम देश के लीडर रहे हैं. अब क्योंकि ईरान ने अमेरिका के मित्र मुस्लिम देशों के साथ भी युद्ध छेड़ दिया है तो शांति वार्ता के लिए केवल भारत ऐसा अकेला देश है जिस पर अमेरिका-इजरायल और ईरान को भरोसा है.
इस युद्ध में विदेश नीति पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं. जब भारत सीधे पाकिस्तान से ऑपरेशन सिंदूर में युद्ध कर रहा था तब भी राजनीतिक दल और नेता राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सवाल खड़े कर रहे थे. कांग्रेस तो मोदी के खिलाफ राजनीति में ट्रंप के बयानों का जितना उपयोग करती है उतना किसी दूसरे विदेशी नेता का नहीं करती है. ऑपरेशन सिन्दूर को रोकने का दावा भी ट्रंप ने किया. ट्रेड डील पर भी ट्रंप के बयानों को कांग्रेस ने माना. भारत को डेड इकोनोमी बताने का दुस्साहस ट्रंप ने किया और उनके कथन को राहुल गांधी ने धार दी.
अगर कोई नेता या राजनीतिक दल ये मानता है कि भारत का प्रधानमंत्री डरा हुआ है, वे चुप्पी साधे हैं तो यह निजी राय हो सकती है लेकिन युद्ध से दो दिन पहले जिस तरह से पीएम मोदी का इजराइल में सम्मान हुआ उस कूटनीति को भारत के नेता भले नहीं पढ़ पाए लेकिन पूरी दुनिया उसे पढ़ रही है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय मामलों में बड़ी ताकत के रूप में देखा जा रहा है.
युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. बातचीत से ही रास्ता निकलता है. यही भारत सरकार का स्टैंड है. कट्टरता और आतंकवाद के साथ बातचीत का भारत समर्थन भी नहीं करता है. पाकिस्तान के साथ बातचीत इसीलिए पूरी तरह से बंद कर दी गई है. जब युद्ध चल रहा हो तब सरकार की नीति पर सवाल खड़े करना राष्ट्रीय हित नहीं हो सकता.
भारत में यह समस्या बढ़ती ही जा रही है कि राजनीतिक हित के लिए राष्ट्रीय हित पर सवाल खड़े किए जाते हैं, इसका कारण वोट बैंक को संतुष्ट करना है. ईरान युद्ध के मामले में भी ऐसा ही दिखाई पड़ रहा है. फिलिस्तीन का बैग टांगकर जब प्रियंका गांधी लोकसभा जाती हैं तो ये विदेश नीति पर सवाल नहीं बल्कि वोट बैंक को संतुष्ट करने का ही प्रयास होता है.
भारत में मुस्लिम बड़ा वोट बैंक है. इस पर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों का ही कब्जा है. बीजेपी को इस वोट बैंक का समर्थक नहीं माना जाता है. ईरान युद्ध में भारत सरकार के स्टैंड को भी इसी नजरिये से प्रचारित किया जा रहा है.
भारत सफल कूटनीति के कारण ही दुश्मन देशों को अलग-थलग किए है. पाकिस्तान डरा हुआ है. आतंकवाद के खिलाफ जंग की अगुआई जो देश कर रहे हैं उनके साथ खड़े रहना भारत का हित ही कहा जाएगा. ऑपरेशन सिंदूर पर भी राजनीतिक फितूर साधने के लिए सवाल उठाने वालों को तो सरकार की विदेश नीति पर सवाल खड़े करने का कोई हक नहीं हो सकता. देश के राष्ट्रीय हित न केवल सुरक्षित है बल्कि उथल-पुथल के दौर में भारत की बढ़ती मजबूती दुनिया का ध्यान खींच रही है.
विदेश नीति और तटस्थता के नाम पर राजनीति का निशाना पार्टी हित हो सकता है लेकिन देशहित इसका लक्ष्य नहीं हो सकता.