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सत्ता परिवर्तन, फैमिली-बीजेपी का सामूहिक चिंतन 

सार

बिहार में होली से ज्यादा राजनीति के रंग हर चेहरे पर दिख रहे हैं. सीएम नीतीश कुमार ने राज्यसभा का नॉमिनेशन भर दिया. उन्होंने खुद सोशल मीडिया पोस्ट पर नई सरकार को मार्गदर्शन देने की इच्छा व्यक्त की..!!

janmat

विस्तार

    नीतीश का अचानक यह पैंतरा आम लोगों को समझ नहीं आया. JDU कार्यकर्ता भी विरोध कर रहे हैं. नीतीश खुश हैं उनका परिवार खुश है. बीजेपी भी पहली बार राज्य में अपना मुख्यमंत्री बनाने की खुशी में झूम रही है. वहीं बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाने की तर्ज पर तेजस्वी यादव और दूसरे विपक्षी दल इस राजनीतिक ऑपरेशन को जनादेश के साथ धोखा, नीतीश और उनकी पार्टी को हाईजैक करना बता रहे हैं.

    राजनीतिक पंडितों को भी नीतीश का खुशी-खुशी राज्यसभा जाकर सेफ रिटायरमेंट के लिए तैयार होना हैरान कर रहा है. विरोधी तो इसे गठबंधन की पार्टियों को खत्म करने की BJP की रणनीति का ही हिस्सा बता रहे  हैं. अकाली दल, शिवसेना और ना मालूम कितनी बीजेपी की सहयोगी पार्टियों का नाम और इतिहास बताया जा रहा है. 20 साल CM रहने वाले नीतीश इतने चतुर हैं कि वे हर दल के साथ जा चुके हैं. राजद के साथ सरकार बनाई, कांग्रेस के साथ भी मोदी और बीजेपी विरोधी गठबंधन खड़ा किया. लोकसभा चुनाव के पहले गठबंधन की यह पहल खुद नीतीश ने ही असफल कर दी तो यह उनकी राजनीतिक सूझबूझ और कांग्रेस के राजनीतिक अहंकार के कारण हो पाया. 

    नीतीश को गठबंधन का संयोजक बनाने को कांग्रेस तैयार नहीं थी और नीतीश बीजेपी के साथ चले गए. राजनीतिक घटनाक्रम बता रहा है कि कांग्रेस अगर नीतीश को नाराज न करती तो वर्तमान राजनीतिक परिवेश दूसरा हो सकता था. एनडीए को भले ही लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला लेकिन इससे उनके गठबंधन की राजनीति कमजोर होने के बदले मजबूत ही हुई है.

    बिहार में सत्ता परिवर्तन का ऑपरेशन भी यही बताता है कि एनडीए गठबंधन के पॉलिटिकल मैनेजमेंट स्किल का फिलहाल कोई तोड़ नहीं है. नीतीश को बिना कन्विंस किये सत्ता परिवर्तन संभव नहीं था. उनको कन्वेंस करने में जिन बातों का सहारा लिया गया उनमें पार्टी के साथ ही नीतीश की फैमिली की भी भूमिका दिख रही है. 

    नीतीश की हेल्थ को लेकर विपक्षी दल ही सवाल खड़े कर रहे थे. इस दबाव में ही नीतीश सेफ रिटायरमेंट के लिए तैयार हुए हैं. नीतीश परिवारवादी पॉलिटिक्स के खिलाफ रहे हैं. अब तक तो उन्होंने अपने पुत्र निशांत कुमार को पार्टी की मांग के बाद भी आगे नहीं आने दिया लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि इस सत्ता परिवर्तन में नीतीश के हेल्थ रिटायरमेंट के साथ ही निशांत के राजनीतिक भविष्य की भी महत्वपूर्ण भूमिका है.

    राजनीतिक क्षेत्र में आम चर्चा है कि बिहार की अगली सरकार में बीजेपी का CM होगा, और एक डिप्टी सीएम निशांत कुमार हो सकते हैं. नीतीश के लिए उम्र के इस पड़ाव पर खुशी का सबसे बड़ा कारण पुत्र का डिप्टी CM तक पहुंचना होगा. सीएम की शपथ लेते हुए नीतीश शायद जितने खुश नहीं हुए होंगे उससे ज्यादा खुशी उन्हें उस समय होगी जब उनका पुत्र बिहार में डिप्टी सीएम की शपथ लेगा.

    यह बात सही है कि JDU अब बिहार में बीजेपी की छाया में आ जाएगी. इसके लिए बीजेपी ने लंबी साधना और त्याग किया है. बीजेपी से लगभग आधी सीट होने के बाद भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए रखना बीजेपी का त्याग है जो आज नीतीश को सेफ रिटायरमेंट को प्रेरित कर रहा है. हाल के विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद JDU को छोड़कर बीजेपी स्पष्ट बहुमत के साथ अपनी सरकार बना सकती थी लेकिन फिर भी नीतीश को ही CM बनाया गया. बताया जा रहा कि उसी समय यह समझौता हो गया था कि राज्यसभा चुनाव पर नीतीश सेफ रिटायरमेंट लेंगे, उनका सम्मान और महत्व कम नहीं होगा. 

    बीजेपी पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह अपने गठबंधन के सहयोगियों  को खत्म करने की रणनीति पर काम करती है. नीतीश ऐसा नहीं मान रहे हैं और ना ही JDU की तरफ से ऐसी बात आ रही है. गठबंधन की राजनीति को सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस ने ही पहुंचाया है. जब भी केंद्र में गठबंधन की सरकार बनी उनको गिराने का काम कांग्रेस की ओर से ही किया गया था. जहां तक बीजेपी का सवाल है उसकी तो सारी पॉलिटिकल सक्सेस गठबंधन की राजनीति में ही टिकी हुई है. जब पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला तब भी गठबंधन के साथियों को साथ में जोड़े रखा गया. 

    कोई भी गठबंधन लेनदेन के समझौते पर ही टिका होता है. दो दलों के गठबंधन की बात अपनी जगह है कांग्रेस में तो सीएम के पद के लिए दो नेताओं के ढाई-ढाई साल का समझौता किया जाता है. ऐसे समझौते को भी कांग्रेस में तोड़ने की परंपरा राजस्थान और कर्नाटक में देखी जा सकती है.

    राज्यसभा के निर्वाचन में भी बिहार में वोटिंग की उम्मीद है. इसलिए नए सीएम की शपथ में समय लग सकता है. बिहार में बीजेपी के नेतृत्व में सरकार की संभावनाओं पर विपक्षी दलों के साथ ही कथित सेकुलर लोगों में हलचल है. बीजेपी बिहार में अपनी राजनीति और सरकार राष्ट्रीय नजरिए पर ही चलाएगी. हिंदुत्व की एकता का प्रयास होगा लेकिन किसी भी वर्ग के साथ इंजस्टिस स्वीकार नहीं होगा.

     बिहार में बीजेपी की नयी सरकार को चुनाव से पहले लगभग 4 साल का वक्त मिलेगा. सबसे बड़े दल के रूप में बीजेपी बिहार में कई चुनावों से उभरती आई है. नीतीश बीजेपी की छाया से बाहर निकलने की स्थिति में अब नहीं हैं. निशांत कुमार के बीजेपी सरकार में डिप्टी सीएम बनने पर उन पर बीजेपी की छाया और मजबूत हो जाएगी. 

    कभी राज्य का नारा था ‘बिहार में बहार है नीतीशे कुमार है’. अब यह नारा बदलकर हो जाएगा ‘बिहार से बाहर है नीतीशे कुमार है’.