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राजनीति से दूरी, संगठन पर छुरी 

सार

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट पर शेयर किया है. इसमें एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर के वीडियो को शेयर करते हुए उन्होंने लिखा ‘My Retirement Plans? May be. Why not?’..!!

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विस्तार

    दिग्विजय सिंह ने जो वीडियो शेयर किया है उसमें एक बैंककर्मी रिटायरमेंट के बाद मकान बनाने की बजाय नई गाड़ी खरीद धर्मपत्नी के साथ भारत भ्रमण पर निकले हैं. दिग्विजय सिंह ने इस पोस्ट के जरिए अपने नेक्स्ट प्लान पर अनुमान का शिगूफा छोड़ा है. यह खुद के या पार्टी को संदेश देने के लिए है, इसका अनुमान लगाने के लिए सब स्वतंत्र हैं. 

    दिग्विजय सिंह के राजनीतिक चातुर्य का कांग्रेसी ही नहीं उनके विरोधी भी लोहा मानते हैं. उन्होंने सीएम पद से मुक्त होने के बाद दस साल तक पद नहीं लेने का संकल्प निभाया. बाद में राष्ट्रीय राजनीति में वे प्रमुख पदों पर भी रहे. उन्हें गांधी परिवार का करीबी और राहुल गांधी का मेंटर कहा जाता था. भारत जोड़ो यात्रा की कमान भी उन्हीं के हाथ में थी. दूसरी बार उन्हें राज्यसभा भी भेजा गया, जिसका कार्यकाल अब समाप्त होने को है.

    राजनीति जनसेवा का क्षेत्र है. इस दृष्टि से तो इसमें कभी रिटायरमेंट नहीं हो सकता. लगभग 60 सालों से दिग्विजय सिंह नगरपालिका से लगाकर पीसीसी प्रेसिडेंट, मंत्री, CM, लोकसभा सदस्य, राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं. उनकी राजनीति का कार्यकाल इतना लंबा है कि अब तो शरीर और मन ने भी राजनीति के प्रोफेशन को पकड़ लिया होगा. एक ही काम में इतना रमा व्यक्ति उसे छोड़ना भी चाहे तो शरीर और मन नहीं छोड़ने देते. 

    दिग्विजय ने जिस रिटायरमेंट प्लान को मैसेज के लिए चुना उसका मतलब कि वे भविष्य में देश भ्रमण करना चाहते हैं. राजनेता अगर भ्रमण करता है तो इससे उसकी राजनीतिक ताकत बढ़ती है. भारत जोड़ो यात्रा ने भी यही साबित किया है. दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा यात्रा ने भी कांग्रेस की सरकार बनाने में श्रेय लेने की भूमिका निभाई है.

    दिग्विजय सिंह का व्यक्तित्व और उनकी छवि में तालमेल नहीं है. उनका व्यक्तित्व कट्टर सनातनी है लेकिन उनकी राजनीतिक छवि मुस्लिम परस्त मानी जाती है. राहुल गांधी के बारे में कहा जाता है कि वे किसी इंटेलीजेंट राजनेता को आसपास नहीं रहने देते हैं. राहुल गांधी के कई करीबी नेताओं ने ऐसा ही आरोप लगाते हुए कांग्रेस छोड़ी है. 

    मध्य प्रदेश में अभी तक तो ऐसा ही होता रहा है कि चाहे दिग्विजय करें या ना करें लेकिन कांग्रेस के लाभ या हानि का क्रेडिट-डिसक्रेडिट उनके ही खाते में जाता रहा है. कमलनाथ सरकार के पतन के लिए भी उन पर आक्षेप लगाए जाते हैं. 

    कुछ समय पहले दिग्विजय सिंह ने AICC मीटिंग के पूर्व पीएम मोदी का एक फोटो शेयर किया था जिसमें मोदी एक सार्वजनिक समारोह में लालकृष्ण आडवाणी के कदमों में बैठे थे. दिग्विजय ने इस पोस्ट में कहा था कि बीजेपी में जमीन पर बैठा नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकता है. इस पोस्ट को कांग्रेस नेतृत्व और संगठन के खिलाफ अटैक माना गया था. राहुल गांधी ने भी इस पोस्ट को सही नहीं माना था.

    नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने को उनका सेफ रिटायरमेंट माना जा रहा है. दिग्विजय तो नीतीश से भी सीनियर हैं. जब नीतीश पहली बार बिहार के सीएम बने थे तब दिग्विजय सिंह दो बार मध्यप्रदेश के सीएम रहने के बाद सत्ता से बाहर आ गए थे. कांग्रेस में दिग्विजय सिंह सबसे वरिष्ठतम नेता हैं. उनकी राजनीतिक समझ और शिष्टाचार के तो विरोधी भी कायल हैं. 

    दिग्विजय सिंह ने CM रहते हुए मुख्यमंत्री निवास में बीजेपी की भोपाल में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों को नाश्ते पर आमंत्रित कर अपनी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को साबित किया था. बीजेपी तो उनके शासन को बंटाढार के रूप में बताती है. कोई भी चुनाव दिग्विजय के शासनकाल की नीतियों को जनविरोधी बताए बिना पूरा नहीं होता है.

    दिग्विजय सिंह भले ही 80 वर्ष के हो रहे हैं लेकिन कांग्रेस के युवा नेता जितना प्रवास नहीं कर पाते उससे ज्यादा वे इस उम्र में प्रवास करते हैं. वर्तमान राजनेता तो आमजन से मिलने में कतराते हैं लेकिन दिग्विजय जहां भी रहते हैं अपने निवास पर आम लोगों से मुलाकात को डेली कार्यक्रम का हिस्सा जरूर बनाते हैं. सीएम के रूप में भी उन्होंने ऐसा ही किया था. इस मामले में उनमें कोई बदलाव नहीं आया.  

    दिग्विजय सिंह की राजनीतिक बुद्धिमता का पार्टी को जितना उपयोग करना चाहिए उतना नहीं कर सकी है. उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए तैयारी की थी, नामांकन फ़ार्म भी खरीद लिया था, उन्हें चुनाव लड़ने से गांधी परिवार द्वारा ही रोका गया. ऐसा लगता है कि उनका राजनीतिक चातुर्य उनकी छवि को नुकसान पहुंचाता है. उनसे कोई भिड़ना नहीं चाहता लेकिन साथ में भी ‘हैंडल विद केयर’ ही रखना चाहता है.

     राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह के राजनीतिक अनुभव में जमीन आसमान का अंतर है. कांग्रेस में अनुभव और क्षमता का उतना महत्व नहीं है, जितना परिवार का है. पार्टी को जब भी कोई बौद्धिक लड़ाई लड़नी होती है तब वह दिग्विजय सिंह का उपयोग कर लेती है लेकिन जब कोई राजनीतिक महत्व प्रतिपादित करने का अवसर आता है तब दूरी बना ली जाती है. 

     दिग्विजय सिंह का रिटायरमेंट प्लान कांग्रेस के लिए इम्तिहान जैसा है. दिग्विजय और राजनीति एक दूसरे के जीवनसाथी जैसे हैं. जीवनसाथी से कोई अलग नहीं हो सकता. सक्रिय राजनीति से दूर जरूर हो सकता है. जनसेवा का अपना काम तो वह जारी ही रखेंगे. कांग्रेस में उनका कंट्रीब्यूशन रिटायरमेंट नहीं बल्कि रिवार्ड की मांग करता है. 

    दिग्विजय सिंह का पॉलिटिकल टैलेंट ही उनको पीछे धकेल देता है, कांग्रेस जब तक पार्टी में टैलेंट को पीछे करती रहेगी तब तक वह आगे कैसे जा सकती है? दिग्विजय सिंह से कोई सहमत हो असहमत हो लेकिन उनको इग्नोर करना नामुमकिन है. 

    अगर कोई इग्नोर करता है तो फिर नुकसान उसी को उठाना होगा. अब यह सवाल है कि  दिग्विजय सिंह की पोस्ट का संदेश ‘राजनीति से दूरी है या संगठन पर छुरी’.