विधानसभा में सवाल जवाब वैसे तो सेंसर्ड होते हैं लेकिन कई बार घुमा फिरा कर किए गए सवालों के उत्तर बड़ी बेचैनी पैदा कर देते हैं. विधानसभा में 25 फरवरी को ऐसा ही नज़ारा सामने आया..!!
विधायक प्रताप ग्रेवाल ने एक प्रश्न पूछा जिसमें लोकायुक्त में एक शिकायत पर कार्यवाही की जानकारी चाही गई. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने लिखित उत्तर में यह जानकारी दी कि जांच प्रकरण दर्ज है लेकिन आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं किया गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि शिकायत के संबंध में लोकायुक्त द्वारा चाही गई जानकारी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई है.
इस प्रश्न में ना तो कंप्लेंट के घोटाले का जिक्र है और ना ही अफसर के नाम थे, जिनके खिलाफ शिकायत की गई है.
मीडिया ने इस प्रश्न के उत्तर पर जो खबरें प्रकाशित की उसमें घोटाले और अफसरों का नाम भी उजागर किये. यह केस पोषण आहार और टेक होम राशन घोटाले से जुड़ा हुआ है. जिनके खिलाफ शिकायत है उनमें तत्कालीन CS इकबाल सिंह बैंस और आजीविका मिशन के तत्कालीन डायरेक्टर ललित मोहन बेलवाल हैं. अगर यह सवाल अफसर के नाम से या घोटाले के नाम से सीधा पूछा गया होता शायद ही इसका जवाब सदन में आता.
यह पूरा मामला मिस फायर जैसा दिखता है. अगर घोटाला और अफसर के नाम होते तो वैसे भी विधानसभा सचिवालय उनको संशोधित कर देता. सीएम की ओर से सदन में कोई लिखित जवाब आए और उसमें यह कहा जाए कि प्रकरण इसलिए पंजीबद्ध नहीं हो पाया क्योंकि पंचायत ग्रामीण विकास विभाग लोकायुक्त में जानकारी नहीं उपलब्ध करा पाया. CM तो स्वयं सरकार हैं और जानकारी भेजने की जिम्मेदारी भी सरकार की है और सदन में उत्तर देने की जिम्मेदारी भी सरकार की है.
किसी एक विभाग पर लोकायुक्त को तथ्य नहीं देने का ब्योरा देकर सरकार ने अपनी ही कमजोरी उजागर की है. इसको देखने के कई नजरिये हैं. क्या जानकारी नहीं देकर घोटाले की जांच को जानबूझकर लंबित किया जा रहा है? क्या ऐसा संभव है कि जिस प्रश्न का सीएम को विधानसभा में उत्तर देना है उसमें कोई यह कहने का साहस करे कि सरकार का ही कोई विभाग वह जानकारी नहीं दे रहा है..
भगोरिया आदिवासी संस्कृति में खुशी और उल्लास का पर्व है. होली पर मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है. भगोरिया का शाब्दिक अर्थ भाग जाने से जुड़ा है. यद्यपि भगोरिया उत्सव का इस शाब्दिक अर्थ से कोई संबंध नहीं है. शासन के ‘भ-गोरिया’ का आशय सरकार में उत्तरदायित्व से भागने का है.
यह मामला काफी समय से चल रहा है. इसकी गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती है कि कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले स्वयं लोकायुक्त जाकर इसकी जांच की शिकायत कराई थी. उनके साथ पूर्व सांसद और सीनियर एडवोकेट विवेक तनखा और तत्कालीन नेता विपक्ष भी उपस्थित थे. दोपहर में शिकायत दर्ज करने के बाद इन नेताओं ने पूरे घोटाले का विवरण दिया था.
इसमें बताया गया था कि मप्र के महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका मिशन में 500 करोड़ से अधिक के घोटाले का आरोप है। रिपोर्ट में ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों में वितरित किए जाने वाले पोषण आहर में भारी भ्रष्टाचार का उल्लेख है। पोषण आहार बनाने वाली सातों फैक्ट्रियों में पोषण आहार के उत्पादन, वितरण में भारी अनियमिताएं पाई गई।
राजनीति घोटाले के परसेप्शन पर चुनाव जीतती और हारती है. ऐसा लगता है घोटाले का विषय केवल चुनाव का ही एजेंडा बच गया है. जो भी सरकार पावर में आती है वह ऐसा ही व्यवहार करती है जैसा सदन में इस प्रश्न के उत्तर में किया गया है. जनमत अपनी सरकार से सुशासन और करप्शन मुक्त गवर्नेंस की अपेक्षा करता है.
जब ऐसे तथ्य मीडिया के माध्यम से उजागर होते हैं, कि इससे सरकार के ही किसी विभाग द्वारा किसी घोटाले की जांच प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा है, तो फिर इससे न केवल सरकार की छवि प्रभावित होती है बल्कि जनविश्वास पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है.
जहां तक घोटाले का सवाल है जिन अफसरों के नाम है उनका करियर बेदाग़ रहा है, फिर भी शिकायत की जांच और उसके निष्कर्ष लोकायुक्त से प्रमाणित होने के बाद उन अफसरों और सरकार के प्रति विश्वास मजबूत होगा.