एनसीईआरटी के एक पाठ्यक्रम ने ज्यूडिशियरी और एग्जीक्यूटिव में तूफान ला दिया है. आठवीं की पाठ्य पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चैप्टर जोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट आग बबूला है. CJI तो यहां तक कह रहे हैं कि चैप्टर से गोली चलाई गई है और न्यायपालिका आज खून से लथपथ है..!!
सर्वोच्च अदालत ने पुस्तक को बैन कर दिया है. एनसीईआरटी कोर्ट से माफी मांग रहा है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने भी इसके लिए माफी मांगी है. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी इस गंभीर चूक पर कैबिनेट में गहरी नाराजगी व्यक्त की है. सुप्रीम कोर्ट नाराज है तो पूरी कार्यपालिका उसकी नाराजगी दूर करने में जुटी है.
ये बहस हो सकती है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चैप्टर जोड़ना गलत है या सही है? लेकिन व्यवस्था के सभी अंगों में भ्रष्टाचार है, इस पर क्या किसी बहस की आवश्यकता है? न सुप्रीम कोर्ट अनभिज्ञ है न ही कार्यपालिका और इसका नेतृत्व इससे अनजान है. भ्रष्टाचार के मामले अंततः सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर ही तय होते हैं. यहं तक कि जांच एजेंसियों पर सवाल खड़े किए जाते हैं और पिंजरे का तोता तक कहा जाता है.
आईएएस, आईपीएस यहां तक कि मंत्रियों और विधायकों के भी करप्शन के मामले में पकड़े जाते हैं. छापों में करोड़ों रुपए की जब्ती होती है. करप्शन के इन मामलों पर अदालतें न्याय संगत निर्णय देती हैं. कई बार भ्रष्टाचार के आरोपियों को सजा होती है और कई बार उन्हें बरी किया जाता है.
अदालत से बरी होना गवाहों-सबूतों और कानून की बारीकियों पर निर्भर करता है. इसका सत्य से संबंध नहीं जोड़ा जा सकता. हमारी अदालतों का ध्येय वाक्य भी यही है कि भले ही गुनहगार छूट जाएँ लेकिन बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए. अदालतें गवाही और सबूत पर काम करती हैं. करप्शन के मामले में गवाही और सबूत जुटाना चुनौती भरा काम होता है.
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर पाठ्यक्रम से बहस तो पैदा हो गई है. सुप्रीम कोर्ट को करप्शन को पढ़ाने या नहीं पढ़ाने पर आपत्ति हो सकती है,लेकिन अब तक क्या किसी भी पाठ्यक्रम में भ्रष्टाचार की पढ़ाई कराई जाती है? बिना पढ़ाई के भी भ्रष्टाचार का कैंसर हर सिस्टम में व्याप्त है. तंत्र के सारे अंग करप्शनजीवी बन गए हैं.
कार्यपालिका और विधायिका के करप्शन पर तो कार्यवाही के लिए जांच एजेंसियां हैं. न्यायपालिका ऐसा क्षेत्र है जो नियुक्ति से लेकर अनुशासनात्मक और भ्रष्टाचार की जांच के लिए स्वतंत्र है. इसमें दूसरे पक्ष का कोई हस्तक्षेप नहीं है. जब भी एकाधिकार होता है तो उसमें करप्शन के लिए हवा-पानी सुविधाजनक हो जाता है.
जनअवधारणा तो न्यायपालिका में करप्शन पर किसी पाठ्यक्रम से ज्यादा अनुभव पर भरोसा करती है. किताब तो बैन की जा सकती है लेकिन लोगों के अनुभव और मस्तिष्क में जो धारणा है उसको कैसे प्रतिबंधित किया जा सकता है?
अदालतों को भगवान का रूप माना जाता है. भरोसा ही उनकी ताकत है लेकिन जजों के करप्शन अब कोई दबी छुपी बात नहीं है. दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस वर्मा का केस न्यायपालिका को लहुलुहान करने के लिए पर्याप्त है. कार्यपालिका में किसी छोटे अफसर के यहां भी अगर ऐसी घटना हुई होती तो उसको अदालत से सजा मिलना सुनिश्चित हो जाता है.
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को एनसीईआरटी द्वारा पाठ्यक्रम में जोड़ने को सुप्रीम कोर्ट सोची समझी साजिश मान रहा है. बड़ा सवाल कि क्या यह साजिश किसी एक कर्मचारी की है? एक कमेटी की है? या शिक्षा मंत्रालय की? भ्रष्टाचार पर तथ्य बताना साजिश हो सकती है लेकिन चलता हुआ भ्रष्टाचार सिस्टम का अंग और मजबूरी कहा जाएगा.
ब्यूरोक्रेसी या विधायिका का भ्रष्टाचार भी पाठ्यक्रमों में नहीं पढ़ाया जाता तो क्या यहाँ भ्रष्टाचार नहीं है. सवाल भ्रष्टाचार पढ़ाए जाने से ज्यादा भ्रष्टाचार रोकने का है. सुप्रीम कोर्ट इसके लिए टॉप अथॉरिटी है. यही संविधान और कानून का संरक्षक है. उस पर ही जिम्मेदारी है कि संविधान के मुताबिक व्यवस्था चले. भ्रष्टाचार मुक्त शासन प्रशासन केवल कार्यपालिका और विधायिका में नहीं बल्कि न्यायपालिका में भी सुनिश्चित करना सुप्रीम कोर्ट का ही दायित्व है.
भारत ने वह नजारा देखा है जब सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जजेज प्रेस कांफ्रेंस कर तत्कालीन CJI पर अनियमितता का आरोप लगाते हैं. नियुक्ति, प्रमोशन और ट्रांसफर में तो कई बार ज्यूडिशियल इंस्टीट्यूशन से जुड़े लोग ही सवाल खड़े करते हैं. न्यायिक व्यवस्था में सुधार पर तो सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी शीर्षस्थ न्यायमूर्ति एकमत हैं. भोपाल में हुए सम्मेलन में कहा गया था कि न्यायपालिका को जनकेंद्रित बनाना है, इसका मतलब है कि अब तक यह धनकेंद्रित ही है.
अब यह मामला न्यायपालिका और कार्यपालिका के टकराव की ओर है? जब राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा पारित विधेयकों को एक समय सीमा में क्लियर करने का मामला आया था तब भी ऐसे सवाल खड़े हुए थे. टकराव की संभावनाएं पहले भी रही हैं और अब भी इसकी गुंजाइश बनी ही रहती है.
संविधान और कानून के संरक्षक होने के नाते न्यायपालिका की सर्वोच्चता है. इसलिए पारदर्शिता, शुद्धता और आचरण के मामले में भी सर्वोच्चता न केवल होनी चाहिए बल्कि दिखनी भी चाहिए. लोकतंत्र के तीनों अंग समन्वय के साथ ही संवैधानिक दायित्व पूरा कर सकते हैं. तीनों अंगों की जिम्मेदारी है कि करप्शन को पाठ्यक्रम में पढ़ाने या नहीं पढ़ाने के विवाद में पड़ने की बजाय करप्शन को रोकने की तरफ सामूहिक प्रयास किये जाएँ.
किताब पर प्रतिबंध से नागरिकों के परसेप्शन पर प्रतिबंध नहीं लग सकता. परसेप्शन में बदलाव तभी आएगा जब लोगों के अनुभव में बदलाव दिखाई देगा. एक दूसरे को दोषी स्थापित कर दंडित या अपमानित कर तो भ्रष्टाचार नहीं रुक सकता.
जब तक भ्रष्टाचार रुकेगा नहीं तब तक सुशासन सपना ही रहेगा. बिना पाठ्यक्रम में शामिल हुए भी भी बच्चा बूढ़ा जवान अपनी समस्याओं के समाधान और कामकाज के लिए करप्शन के जिस दलदल से गुजरता है उसकी अनुभूतियों को कैसे बदला जा सकता है?