PM-CM के बाद DM ही गवर्नेंस का फेस होता है. इन पर ही कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी है, आपदा प्रबंधन और विकास पर भी इनको ही जिम्मेदार ठहराया जाता है. इन्ही को परफॉर्मेंस और रिजल्ट का पाठ भी पढ़ाया जाता है..!!
जिलों में कलेक्टर इंडिपेंडेंस परफॉर्मेंस नहीं कर सकते. उनके परफॉर्मेंस के पीछे सरकार होती है. सरकार और कलेक्टर के परफॉर्मेंस में संतुलन और तालमेल ही बेहतर परिणाम की गारंटी देता है. कलेक्टर तो केवल इंप्लीमेंटेशन प्रक्रिया को लीड करता है. पॉलिसी प्लानिंग फॉर गवर्नेंस की गाइडलाइन तो सरकार ही देती है.
CM मोहन यादव अगर यह कहते हैं कि जो कलेक्टर परफॉर्मेंस और रिजल्ट बेहतर देंगे वही फील्ड में रहेंगे तो यह नई बात नहीं है. यह तो हर सरकारी तंत्र के जिम्मेदार का बुनियादी दायित्व है. परफॉर्मेंस और परिणाम उसकी सेवा शर्तों का हिस्सा है. यह केवल कलेक्टरों पर लागू नहीं होता बल्कि जितने भी लोक सेवक हैं उन सब का यही दायित्व है.
मंत्रालय का अमला भी इसी सिद्धांत पर खड़ा है. यहां तक कि मंत्रिमंडल के लोकसेवक भी परफॉर्मेंस और परिणाम से अलग नहीं हैं. पूरा प्रशासन तंत्र डिफरेंट लेयर पर काम करता है. यह सब हवाहवाई नहीं है बल्कि इस सब के कार्य संचालन नियम लिखित में उपलब्ध हैं. हर लोक सेवक परफॉर्मेंस और परिणाम के लिए जिम्मेदार है अब सवाल है कि यह जिम्मेदारी, कौन किस सीमा तक पूरी कर रहा है, इसकी मॉनीटरिंग की जो व्यवस्था है वह क्या अपनी जवाबदारी पूरी कर रहा है?
कलेक्टर ऐसा प्राणी हो गया है जिस पर सबसे ज्यादा दबाव है. गेहूं खरीदी का भी दबाव है, गर्मी में पानी की किल्लत है तो उसका भी समाधान कलेक्टर को ही करना है, प्रोटोकॉल भी कलेक्टर को ही निभाना है. जिम्मेदारी से भागना तंत्र का अघोषित एजेंडा बन गया है. विभागीय तालमेल भी कलेक्टर के कंधे पर ही जिले में रहता है. हर समस्या का समाधान कलेक्टर से अपेक्षित होता है. सरकारी रूप से उससे जिस परफॉर्मेंस की अपेक्षा होती है उससे ज्यादा उसके पद और अधिकार का दुरुपयोग कर राजनीतिक और दूसरे हित साधना भी मोटिव होता है.
फील्ड में परफॉर्मेंस आसान नहीं रह गया है, सरकारी प्रक्रिया की दिक्कतें अपनी जगह हैं लेकिन जिस तरह का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य बनता जा रहा है. वह निष्पक्षता से किसी भी अफसर को काम करने देगा, ऐसा सामान्य रूप से मानना कठिन लगता है. गंगा हमेशा गंगोत्री से ही शुरू होती है. परफॉर्मेंस और परिणाम किसी एक स्तर पर ना सुनिश्चित हो सकते हैं और ना ही वह वांछित परिणाम दे सकते हैं. यह तो सरकार का कैरेक्टर ही है कि सबको परफॉर्म करना है और अपने दायित्व का परिणाम देना है.
राजनीतिक और प्रशासनिक लोक सेवक एक दूसरे की ओर दोषारोपण कर सकते हैं लेकिन इससे कोई समाधान नहीं हो सकता है.
मूल विषय परफॉर्मेंस का है. सरकार की परफॉर्मेंस का है, इसमें मंत्री भी हैं, CS ES सेक्रेटरी और विभाग अध्यक्ष भी शामिल हैं. कर्मचारी तंत्र भी इसका हिस्सा है. जिस तरह की घटनाएं प्रकाश में आती हैं, उनसे तो कई बार यह धारणा मजबूत होती है कि इस सिस्टम से जैसे जवाबदेही गायब हो गई है. समस्याओं के समाधान के लिए जो भी अभियान चलाए जाते हैं वह सब कागजों में तो सफल ही माने जाते हैं जमीनी हकीकत उनसे उलट होती है.
यह चिंता की बात है कि सारे निशाने कलेक्टर पर ही लगाए जाते हैं. ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. पहले भी लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेताओं ने भी कलेक्टरों को उल्टा टांग देने की बात तक कही है. कलेक्टरों के अनुभव कभी सुनी जाएं तो फिर हकीकत सामने आती है. कानून और प्रक्रिया के मुताबिक काम होने पर जनता को लाभ हो सकता है लेकिन राजनीति तो तभी खुश होती है जब उसके समर्थकों या हितसाधकों के पक्ष में प्रक्रिया खड़ी दिखाई पड़े.
कलेक्टर भी राजनीति को इंजॉय करने लगते हैं. पक्ष और विपक्ष के बीच अधिकारों का दुरूपयोग होने लगता है. किसी को चढ़ाने और किसी को गिराने का खेल चालू हो जाता है. जब कलेक्टरों को इस दृष्टि से उपयोग किया जाता है तो फिर उनके परफॉर्मेंस का आकलंन भी सरकारी प्रक्रिया में अलग और हित लाभ की प्रक्रिया में अलग होने लगता है. जब धीरे-धीरे यह प्रक्रिया बढ़ने लगती है तो फिर पूरा प्रशासन तंत्र परफॉर्मेंस एवं परिणाम की दिशा से भटक जाता है.
सरकार का चेहरा CM और मंत्री होते हैं. ब्यूरोक्रेसी तो इंप्लीमेंटेशन का पार्ट होती है. परफॉर्मेंस और परिणाम के नजरिए से जब लोकसेवकों की राजनीतिक संरचना का नियमित आकलन किया जाए, आकलन के आधार पर लोगों का पद पर रहना या ना रहना सुनिश्चित होगा तब ब्यूरोक्रेसी को कुछ भी मैसेज देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. ब्यूरोक्रेसी तो बिना कुछ कहे ही सरकार के कैरेक्टर को पकड़ लेती है अगर यह कैरेक्टर परफार्मिंग और परिणाम पर ईमानदारी से फोकस होगा तो फिर तंत्र का कोई भी हिस्सा उसके विपरीत जाने की हिम्मत नहीं कर सकेगा.
पॉलिटिकल गवर्नेंस और नौकरशाही के बीच में तालमेल और नियंत्रण को लेकर हमेशा चर्चाएं होती हैं. हर मुख्यमंत्री के कार्यकाल में यह एक आम चर्चा होती है कि ब्यूरोक्रेसी पर लगाम है या वह बेलगाम है. संवाद और तालमेल के बिना कोई भी तंत्र काम नहीं कर सकता. काम क्रोध मद लोभ, यह व्यक्तिगत होता है. इसका किसी व्यवस्था या पद से संबंध नहीं है. किसी भी स्तर का कोई भी पदधारी इनमें से किसी भी अस्तित्वगत स्वभाव को कम या ज्यादा अपने आचरण में उपयोग कर सकता है.
व्यवस्था का काम यही है कि इस सब के बीच तालमेल रहे. बिना सरकार के सहयोग और समर्थन के ना कोई कलेक्टर परफोर्म कर सकता है और ना ही बिना कलेक्टर के बेहतर परफॉर्मेंस के किसी सरकार का बेहतर गवर्नेंस प्रमाणित हो सकता है. पूरा प्रशासनिक तंत्र राजनीति की छाया और माया में ही चक्कर लगाता रहता है. सब कुर्सी बचाने की शैली अपनाते हैं, जिस कुर्सी में जितना पावर है उस पर उतना ही दबाव है.
जन समस्याओं का समाधान लोक सेवकों का दैन्दिन दायित्व है. अब देखा जाता है कि सामान्य समस्याओं के निराकरण के लिए भी अभियान चलाने पड़ते हैं. इसका मतलब है कि अगर तंत्र अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से पूरी कर रहा होता तो किसी अभियान की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. सरकारी तंत्र में अमले की कमी भी बड़ी समस्या है. भर्तियाँ हो नहीं रही हैं. सभी विभागों में बड़ी संख्या में पद खाली हैं. जब तंत्र ही अधूरा है तो फिर उस पर निर्धारित दायित्व का पूरा परफॉर्मेंस कैसे हो सकता है?
फील्ड में काम की चुनौती लगातार बढ़ रही है. फील्ड में काम की गुणवत्ता को बनाए रखना फील्ड के अधिकारियों के साथ ही सरकार की भी जवाबदारी है. इसके लिए कानून प्रक्रिया और निर्देशों की स्पष्टता के साथ रिक्त पदों की पूर्ति एक अनिवार्यता है. तंत्र में प्रमोशन रुक जाने का भी दुष्प्रभाव पड़ता है.
कलेक्टर सहित पूरे तंत्र का मनोबल ऊंचा रहे, यह जब तक सुनिश्चित नहीं होगा तब तक कुछ भी कह दिया जाए परिणाम में सुधार नहीं आ सकेगा.