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सरकारी काम, सोचा समझा या अघोषित दबाव का परिणाम?

सार

मध्यप्रदेश को मेट्रो स्टेट बनाने के लिए बहुत ढोल पीटे गए मेट्रो का विचार आने से लेकर सैंक्शन, शिलान्यास, लोकार्पण के मौकों को ऐसा बनाया गया जैसे मेट्रो ने भोपाल और इंदौर को स्वर्ग जैसा सुंदर और सुविधाजनक बना दिया है..!!

janmat

विस्तार

    अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि मेट्रो शहर में थोपी गई है. अफसरों ने बिना जनप्रतिनिधियों से चर्चा किये इसे थोप दिया. विधानसभा में नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मेट्रो की सार्थकता पर सवाल खड़े किए. सदन के रिकॉर्ड पर उन्होंने कहा कि मेट्रो के संबंध में एग्रीमेंट पर सबसे पहले उनके हस्ताक्षर थे. मेट्रो की प्लानिंग भोपाल और इंदौर को आसपास के शहरों से जोड़ने की थी. ओरिजिनल कॉन्सेप्ट पर मेट्रो नहीं चल पाई. इसके लिए वे कांग्रेस की 15 महीने की सरकार और अफसरों को जिम्मेदार बता रहे हैं. 

    कैलाश विजयवर्गीय  कद्दावर नेता हैं उनकी साफगोई और स्पष्टता कई बार विवाद भी पैदा करती है, लेकिन हर नेता सत्य बोलने का साहस नहीं कर सकता है. सत्य तो हमेशा कड़वा ही होता है. मंत्री के विचार और उनकी सरकार के मेट्रो को लेकर काम में अंतरविरोध दिखाई पड़ता है. भोपाल और इंदौर में जनसंख्या के घनत्व को नियंत्रित करने के लिए आसपास के शहरों से मेट्रो को जोड़ने के लिए न केवल जरूरत है बल्कि भविष्य में इस दिशा में सरकारों को आगे भी बढ़ना पड़ेगा.

    नगरी प्रशासन मंत्री के वक्तव्य से कई सवाल खड़े हो रहे हैं. पहला सवाल कि क्या सरकार के काम पर अफसर हावी हैं? सरकार का पोलिटिकल सिस्टम अफसरों के सामने जनहित के कमिटमेंट निभाने में पीछे रह जाता है. सरकारों की राजनीतिक व्यवस्था मंत्रिमंडल के आधार पर काम करती है. संवैधानिक व्यवस्था धीरे-धीरे सीएमओ केंद्रित हो गई है. 

    केवल मध्यप्रदेश ही नहीं सभी राज्यों में 'CM का भाषण ही शासन की अवधारणा' मजबूत होती जा रही है. अफसर इसी का लाभ उठाते हैं. विभागीय मंत्री कोई भी प्रस्ताव प्रस्तुत करें अंतर विभागीय मामलों में अंतिम निर्णय सीएम के लेवल पर होता है. डेमोक्रेसी में यह गलत भी नहीं है. कोई भी विभागीय मंत्री अपने कार्य क्षेत्र और अधिकारों के मुताबिक काम करता है लेकिन मंत्रिमंडल सामूहिक निर्णय पर काम करता है.

    अगर मेट्रो की परियोजना पर पहले प्लानिंग को छोड़ कर बाद में उसको बदला गया है तो ऐसा तो संभव ही नहीं है कि ऐसा केवल अधिकारियों के लेवल पर ही कर दिया होगा. बिना कैबिनेट, बिना CM  के ऐसे निर्णय अगर अफसर ले रहे हैं तो फिर तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा? 

    जो भी सरकार होती है उसे निर्णय लेने की संप्रभुता होती है अगर कांग्रेस की सरकार के किसी निर्णय में बदलाव किया है तो फिर यह उनके अधिकार क्षेत्र का विषय है. यह बात भरोसे योग्य नहीं लगती है कि 15 महीने में मेट्रो की संरचना बदली गई और फिर वह उसी अनुसार बनकर चलने लगी. मेट्रो का काम तो कई सालों से चल रहा है. 

    मेट्रो के लोकार्पण के समय कांग्रेस और बीजेपी के बीच में श्रेय का राजनीतिक वाकयुद्ध लंबे समय तक चलता रहा कि मेट्रो का क्रेडिट उन्हें मिलना चाहिए. कांग्रेस दावा कर रही थी कि मेट्रो के निर्माण में उनकी भूमिका है. अब तो नगरीय प्रशासन मंत्री ने भी मान लिया है कि कांग्रेस की सरकार में ही मेट्रो के मूल प्लान में बदलाव किया गया और जनप्रतिनिधियों को भरोसे में लिए बिना मेट्रो थोप दी गई

    मध्यप्रदेश मेट्रो स्टेट में शामिल हो गया है. हालांकि भोपाल और इंदौर में मेट्रो का लाभ बहुत सीमित क्षेत्र और लोगों को मिल रहा है. एक सवाल यह भी है कि जनहित के लिए जरूरी और सरकारी निर्णय में तालमेल नहीं होता. क्या विकास के कामों का निर्धारण बिना जनप्रतिनिधियों के किसी अघोषित दबाव में किया जाता है? क्योंकि अफसर को ही इंप्लीमेंट करना है तो उनका नाम तो हर हालत में जुड़ेगा लेकिन हर गलती के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहरा कर बचा नहीं जा सकता.

    अगर भोपाल और इंदौर का मास्टर प्लान अब तक नहीं बन पाया है तो क्या इसके लिए केवल अफसर जिम्मेदार हैं? अगर वे ही जिम्मेदार साबित होते हैं तो यह सोचने पर विवश होना पड़ेगा कि सरकार की राजनीतिक व्यवस्था का क्या और कितना उपयोग बचा है?

    मेट्रोपॉलिटन रीजन की अवधारणा तो वर्तमान में ही आगे बढ़ रही है. इस पर जनप्रतिनिधियों को जरूर विश्वास में लिया गया होगा. सरकारी काम और अफसर की भूमिका तो हमेशा संदेह के दायरे में होती है. जिस तरह के अनुभव सामने आते हैं, मेट्रो प्रोजेक्ट में ही सड़क को खोद  कर इसकी प्लानिंग की गड़बड़ियों को छिपाने की कोशिश की गई है. 

    शहर में जो भी निर्माण हो रहे हैं उससे कई बार सुविधा से ज्यादा ट्रैफिक के लिए असुविधा निर्मित होती है. राजधानी का जो सबसे बड़ा GG  फ्लाईओवर बना है इसकी प्लानिंग भी असुविधा पैदा कर रही है. मंत्रालय से 10 नंबर जाते समय और 10 नंबर से नर्मदापुरम रोड जाते समय यह असुविधा महसूस होती है. 

    राजा विक्रमादित्य के साहस, बुद्धिमत्ता और न्याय की कई प्रसिद्ध लोक कथाएं हैं. विक्रम बेताल भी उनमें एक है. कथा में बेताल विक्रम से सवाल पूछता है. सवालों का सही उत्तर न देने पर विक्रमादित्य की मृत्यु हो सकती है और अगर वे सही उत्तर देते हैं तो बेताल वापस चला जाता है. विक्रम हर बार सही उत्तर देते थे और बेताल चला जाता था. राजा विक्रमादित्य भी शासन चलाते थे. सही उत्तर उनकी न्याय प्रियता थी. अब की शासन व्यवस्था ना सही उत्तर देना जानती है ना उत्तरदायित्व लेना. 

    यह समझना मुश्किल है कि जो मेट्रो चल चुकी है अब उसकी प्लानिंग और थोपने के लिए अफसर को जिम्मेदार बताने से क्या लाभ होगा? अगर यह सही नहीं था तो फिर सेकंड फेज की बातें क्यों चल रही हैं?