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अगर चुनाव जरूरी हैं तो ...

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Thu , 23 Jan

सार

सही मायने में यही समय है, जब चुनाव आयोग और राजनीतिक दल मिलकर इस बारे में सोचें कि भीड़ जुटाए बिना चुनाव कैसे कराए जाएं?

janmat

विस्तार

दुष्काल की तीसरी लहर का खतरा अब आमने- सामने है,उससे त्रस्त जनता की आवाज़ सुन सरकार और चुनाव आयोग सोच रहा है किअब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कैसे कराएं जाएं? यूँ तो चुनाव आयोग २०२० के अगस्त महीने में ही विस्तृत गाइडलाइन जारी कर चुका है कि कोविड काल में नामांकन, चुनाव-प्रचार और मतगणना के दौरान किस तरह के कोविड प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए, पर व्यवहार खास कर चुनाव में इसका पालन होता कहां है? पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में न कहीं राजनेताओं ने, न राजनीतिक दलों ने इसकी कोई परवाह की | 

सब को मालूम है,पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों ने कैसे कोविड प्रोटोकॉल की खुलकर धज्जियां उड़ाईं थी और जैसे-जैसे चुनाव-प्रचार वहां नए इलाकों में बढ़ता गया, वैसे-वैसे वहां कोविड संक्रमण तेजी से बढ़ा और कई उम्मीदवारों की मौत हो गई। तब मद्रास हाइकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग जागा और उसने चुनावी रैलियों में पांच सौ से ज्यादा की भीड़ पर रोक लगा दी, लेकिन उसके तुरंत बाद उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का पूरी तरह उल्लंघन हुआ। नतीजा, कोविड के मामले बेहद खतरनाक तौर पर बढ़े।परिणाम स्वरूप उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ ने शिक्षकों व दूसरे कर्मचारियों की सूची जारी कर दावा किया कि इनकी मौत कोविड से संक्रमित हो जाने से हुई।

आज भी सवाल यही है कि चुनाव के समय क्या कोविड प्रोटोकॉल अपनाएं जाएं। चुनाव के दौरान कोविड गाइडलाइन के उल्लंघन के सबसे ज्यादा मामले नामांकन और चुनाव-प्रचार के दौरान आते हैं, जहां राजनीतिक दल बड़ी से बड़ी भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन करते हैं। समय की मांग है कि अब इस तरीके को बदला जाना चाहिए। अगर कोविड ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ की एक बिल्कुल नई कार्य-पद्धति को जन्म दे दिया, तो क्या हम चुनाव-प्रचार और प्रक्रिया के नए व ऐसे सभ्य तरीके नहीं ढूंढ़ सकते, जिसमें भीड़, हो-हल्ला और बेमतलब का गुल-गपाड़ा किए बिना चुनाव हो जाएं।

पहले चुनावों के दौरान गली-गली दिन-रात छोटे-छोटे जुलूस निकलते थे, नारों और लाउडस्पीकरों के शोर से सिर भन्ना जाता था, पोस्टरों और झंडियों से दीवारें पटी रहती थीं। इन सबके बिना पहले हम चुनाव की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, लेकिन आज यह सब कुछ नहीं होता। इसी तरह वोट कभी मतपत्र से पड़ते थे, आज ईवीएम से पड़ते हैं और चटपट मतगणना हो जाती है। अगर ये सारी चीजें बदली जा चुकी हैं, तो आज के तरीके हम क्यों नहीं बदल सकते, जब हमारे पास कहीं बेहतर तकनीक और शानदार इंटरनेट कनेक्टिविटी है।

सही मायने में यही समय है, जब चुनाव आयोग और राजनीतिक दल मिलकर इस बारे में सोचें कि भीड़ जुटाए बिना चुनाव कैसे कराए जाएं? चुनाव आयोग चाहे जितनी ही कड़ी गाइडलाइन बना ले, तमाम कोशिशों के बावजूद उसका पालन करा पाना संभव नहीं होगा। तरह-तरह के विवाद उठेंगे, सो अलग और कुछ मामलों में तो चुनाव आयोग की साख को भी विवादों में घसीटा जा सकता है। गाइडलाइन के उल्लंघन का संकट केवल हमारा ही नहीं है, बल्कि दुनिया का शायद ही कोई देश हो, जहां कोविड प्रोटोकॉल के बड़े उल्लंघन के बिना चुनाव हो गए हों।

पिछले साल५१ देशों में हुए राष्ट्रीय चुनावों पर की गई एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से कई देशों ने तो भीड़ की सीमा २० या अधिक से अधिक १०० लोगों तक सीमित कर दी थी, लेकिन बहुत से मामलों में इसका पालन नहीं हो पाया। सिंगापुर अपवाद था, जिसने चुनावी सभाओं, रैलियों और भीड़ जुटाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।

क्या चुनाव आयोग सिंगापुर से सीखकर ई-रैलियों के विकल्प पर नहीं सोच सकता? चुनाव आयोग चाहे, तो हर शहर में ई-रैलियों का एक दिन तय कर सकता है और वहां के प्रमुख स्थानों पर बड़ी-बड़ी वीडियो स्क्रीन लगा सकता है। हर राजनीतिक दल के स्टार प्रचारक को बोलने के लिए सुबह १० बजे से शाम ७ बजे के बीच एक समय तय किया जा सकता है। सभी दलों के नेता अपने-अपने तय समय में भाषण करें और उसे अपने सोशल मीडिया चैनलों पर भी प्रसारित करें।