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भगवान राम वनवास और आदिवासी समाज|

सार

मर्यादा पुरुषोत्तम राम से जुड़े हैं आदिवासी रीति रिवाज|

janmat

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजाति गौरव दिवस के कार्यक्रम में भोपाल में कहा कि आदिवासियों ने प्रभु राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया| आदिवासी ही हमारे डायमंड हैं|  उन्होंने कहा कि वनवासियों के कारण ही भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम बने|  जनजातीय समाज के बिना प्रभु राम के जीवन की सफलताओं की कल्पना नहीं की जा सकती| प्रधानमंत्री का भाषण सुनने और समाचार पत्रों में पढ़ने के बाद एक मित्र ने यह सवाल किया कि क्या प्रधानमंत्री ने यह सही कहा है कि आदिवासियों ने ही भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया|

संयोग से हमारे हमारे वह मित्र उस समाज से आते हैं जो भगवान राम को अपना पूर्वज और आदर्श मानते हैं|

अब प्रधानमंत्री द्वारा भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम बनने और अपने मित्र के मन में उपजे सवाल पर  रामायण के संदर्भ के अनुसार वास्तविक स्थिति पर प्रकाश डालने की कोशिश करते हैं|  अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राजकुमार राम के धरती पर प्रकट होने और उनकी बाल लीलाओं का वर्णन रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने किया है. ऋषि विश्वामित्र ने  ऋषियों के यज्ञ की रक्षा के लिए राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को माँगा|  ऋषियों के आश्रमों को राक्षसों से मुक्त करने के बाद श्रीराम के राजा जनक के यहां पहुंचे|  सीता के स्वयंवर में शिव धनुष को तोड़ने के बाद  राम सीता का विवाह सम्पन्न हुआ| इसके बाद भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न का विवाह हुआ|  बहुओं के साथ राजा दशरथ के अयोध्या आगमन, माता कैकेई द्वारा राजा दशरथ से राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को राज देने के सभी प्रसंग,  रामायण में राजकुमार के रूप में रचित किए गए हैं|



श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ जब वनवास के लिए अयोध्या से प्रस्थान करते हैं, इसके बाद 14 वर्षों तक वनवास,  और राक्षसों के विनाश के साथ ही, वनवासी के रूप में उनके जीवन यापन, व्यवहार और आचरण से ही, “राजकुमार” राम मर्यादा “पुरुषोत्तम” भगवान राम के रूप में स्थापित हुए|

प्रभु श्रीराम  जब वनवास  के लिए निकले,  तब तमसा नदी पार करने के उपरांत, श्रृंगवेरपुर पहुंचे, वहां उनकी मुलाकात केवट निषाद राज से हुई| रामायण का केवट प्रसंग मर्यादित जीवन और समाज का अद्भुत उदाहरण है|

भक्ति और प्रेम जात पात से ऊपर है| उस समय तो ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं था| निषादराज केवट कीर समाज से आते थे| आज निषाद के नाम पर राजनीतिक पार्टियां बनी हुई हैं| श्रृंगवेरपुर के बाद भगवान राम चित्रकूट पहुंचे, रामायण में चित्रकूट भगवान राम के पहुंचने और उनकी कुटिया निर्माण तथा उनके निवास के संबंध में जो भी लिखा है, उसमें आदिवासी समाज के योगदान को महत्वपूर्ण स्थान मिला है|

वनवास के दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भी भगवान राम रहे, महर्षि वाल्मीकि भील समाज के बीच में पले बढ़े थे| कहा तो यहां तक जाता है कि वह  भी भील ही थे| भगवान राम ने वनवास के दौरान देश के वनवासी क्षेत्रों में रहकर, आदिवासी समाज को संगठित करने के साथ, उन्हें जीवन जीने की शिक्षा दी| भगवान राम ने भी वनवासी जनजीवन के समान ही सादगी भरा जीवन जिया|



वनवास के दौरान भगवान राम ने संतो और ऋषियों के आश्रमों को राक्षसों के आतंक से बचाया| 14 वर्ष के वनवास में 12 वर्ष से अधिक समय भगवान राम ने आदिवासियों और दलितों को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए काम किया|
रामायण में उल्लेखित निषाद, वानर, मतंग और रीछ समाज उस काल के आदिवासी समाज के ही लोग हुआ करते थे|

श्रीराम 10 वर्षों तक दंडकारण्य क्षेत्र में आदिवासियों के बीच रहे| वहीं पर उनकी जटायु से भेंट हुई, जो उनका मित्र था, जब रावण सीता को हरण करके ले गया, तब सीता की खोज में राम की भेंट, शबरी से हुई| शबरी एक भील जाति की महिला थी| शबरी द्वारा प्रभु राम को जूठे बेर खिलाने का प्रसंग, रामायण का सर्वाधिक चर्चित प्रसंग है|

उसी क्षेत्र में हनुमान और सुग्रीव से प्रभु राम की मुलाकात हुई| दंडकारण्य क्षेत्र में रहकर श्री राम ने अखंड भारत के लिए सभी जनजातियों को संगठित किया| आदिवासियों और वनवासियों के बीच जो धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा अभी चल रही है, उनके जो रीति रिवाज हैं, वह सभी प्रभु राम की शिक्षा और संदेश की देन हैं|

भगवान राम ने जनजातियों को सभ्य एवं धार्मिक तरीके से रहना सिखाया| जनजातियों से प्रभु राम को जो प्यार मिला वह रामायण में जगह-जगह उल्लेखित है| प्रभु श्रीराम में आदिवासी समाज की आस्था और भक्ति रामायण में कई प्रसंगों में परिलक्षित होती है|

भारत सहित पड़ोसी देशों की लोक संस्कृति और ग्रंथों में भगवान राम इसलिए आज भी जीवित हैं क्योंकि उन्होंने अखंड भारत की कल्पना के साथ, सभी आदिवासियों और जनजातियों को संगठित करने का कार्य किया|  आदिवासियों के बीच राम और हनुमान को सबसे ज्यादा पूजा जाता है|