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महाभारत के एक ही श्लोक में “हिन्दू धर्म” और “हिंदुत्व” का अंतर स्पष्ट, अब मणिशंकर अय्यर के बिगड़े बोल.. दिनेश मालवीय

सार

देश के मुस्लिमों को हिन्दुओं का भय दिखाकर अपना वोट बैंक बनाने वाले सियासी दल, हिन्दुओं में आ रही जाग्रति से बोखला गए, अपनी इस बौखलाहट में वे न जाने क्या-क्या आंय बांय सायं बक रहे हैं...

janmat

विस्तार

आज़ादी के बाद से ही देश के मुस्लिमों को हिन्दुओं का भय दिखाकर अपना वोट बैंक बनाने वाले सियासी दल, हिन्दुओं में आ रही जाग्रति से बोखला गए हैं. वे खुद तो हिन्दुओं के हितों पर कुठाराघात करते हुए मुस्लिमपरस्ती में डूबे रहे और आज जब कोई हिन्दू संस्कृति और हिन्दुओं के हितों का संरक्षण के कार्य कर रहा है, तो उन्हें अपना राजनैतिक  भविष्य अंधकारमय नज़र आने लगा है. वे आनन फानन में खुद को सच्चा हिन्दू बताने में लग गये हैं. अपनी इस बौखलाहट में वे न जाने क्या-क्या आंय बांय सायं बक रहे हैं. सलमान ख्रुशीद और राशिद अल्वी के बाद अब मणिशंकर अय्यर ने चार कदम आगे जाकर मुगलों की ऎसी तारीफ़ की है, कि मुग़ल भी कब्र में सोच रहे होंगे, कि हमने ऐसा कब किया ?

अय्यर ने बाबर से लेकर शाहजहाँ तक की ख़ूब तारीफ़ की. लेकिन औरंगज़ेब के बारे में मौन रहे. अकबर की कथित महानता का बखान करते हुए,उन्होंने उसके द्वारा चित्तोड़ में हज़ारों निर्दोष लोगों के क़त्लेआम का ज़िक्र नहीं किया. उन्होंने तो बाबर को भी बहुत महान बताया, जिनकी महान संत गुरु नानकदेवजी तक आलोचना की थी. अय्यर नानकजी से भी बड़े हो गये. नानक जी ने बाबर की करतूतों के बारे में जो लिखा उसे “बाबर्वानी” कहा जाता है. इसमें उन्होंने कहा है-बाबर का साम्राज्य फिल रहा है. ज़ुल्म की हद यह है, कि शहजादियों तक ने भी खाना नहीं खाया है. बाबर गाथा में नानक देव जी ने बाबर के हमलावरों कि ओर से महिलाओं पर अत्याचारो और बहू-बेटियों को जबरन उठाकर ले जाकर उनसे निकाह का भी उल्लेख है. उन्होंने बाबर के आक्रमण को हिंदुस्तान को आग में झोंक देने जैसा बताया है.

ऐसे बाबर के बारे में अय्यर कहते हैं, कि उसने अपने बेटे हुमायु को भारत के मूल निवासियों के साथ मिलकर रहने का पाठ पढ़ाया. हद हो गयी! उनके दल के नेता और अन्य लोगों ने अब एक नया शिगूफा छोड़ा है. वे कह रहे हैं कि “हिन्दू धर्म” और “हिंदुत्व” अलग-अलग हैं. उन्हें इसके विषय में समझने के लिए संसार के सबसे अनूठे महाकाव्य “महाभारत” का अध्ययन करना चाहिए. इसमें एक श्लोक आता है, जिससे “हिन्दू धर्म” और “हिंदुत्व” का अंतर बहुत स्पष्ट हो जाता है. यह श्लोक है-

" अहिंसा परमो धर्मः: धर्म हिंसा तथैव च "

इसका अर्थ है- अहिंसा परम धर्म है,और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करनी पड़े, तो यह हिन्सा उससे भी बड़ा धर्म है. लेकिन इसकी सिर्फ एक अर्धाली को बताकर दूसरी अर्धाली को नहीं बताया गया. सिर्फ इतना बताया गया कि, अहिंसा परम धर्म है.
 
इस बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए कुछ उदाहरण दिए जा सकते हैं. भगवान् श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध को टालने के लिए अथक प्रयास किये. वह स्वयं हस्तिनापुर के दरबार में शांति प्रस्ताव लेकर गये. उन्होंने यहाँ तक कहा, कि यदि पांडवों को पाँच गाँव ही दे दिये जायें, तो युद्ध नहीं होने दूंगा. यह हिन्दू धर्म है. लेकिन अहंकारी दुर्योधन ने जब कहा, कि सुई की नौक के बराबर ज़मीन भी नहीं दूँगा, तब पाण्डवों द्वारा अपने अधिकार की लड़ाई लड़ना हिंदुत्व है.
 
भगवान श्रीराम ने लंका युद्ध को टालने के लिए अंगद को शांतिदूत बनाकर रावण के दरबार में भेजा था. यह हिन्दू धर्म था. लेकिन जब अहंकारी रावण ने शांति प्रस्ताव को नहीं माना, तो श्रीराम ने लंका पर आक्रमण कर दिया. यह हिंदुत्व है. महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले युधिष्ठिर शत्रुपक्ष में शामिल अपने गुरुजन और बुजुर्गों के पास जाकर उन्हें प्रणाम करते हैं. यह हिन्दू धर्म है. लेकिन युध्द शुरू हो जाने पर पूरी ताकत से उनसे लड़ते हैं, यह हिंदुत्व है.
 
भगवान श्रीराम समुद्र से मार्ग देने के लिए तीन दिन तक प्रार्थना करते रहे. यह हिन्दू धर्म है. जब नहीं मानकर समुद्र ने काठ ठान ली, तो श्रीराम ने अग्निवाण का संधान किया, यह है हिन्दुत्व. चीन के राष्ट्रपति के भारत आगमन पर उनसे दोस्ताना सम्बन्ध बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा उनके साथ जूले पर झूलना हिन्दू धर्म है. लेकिन डोकलाम में गुस्ताखी करने पर उसे सबक सिखाना है हिंदुत्व. हिन्दू समाज को बहुत समय तक बुरा-भला कहने वालों के प्रति सहिष्णुता दिखाना हिन्दू धर्म था, लेकिन अब एकता के साथ खड़े हो जान पर उन्हें मंदिर-मंदिर भटकने को मजबूर करना है हिंदुत्व. हिन्दू धर्म की सहिष्णुता को गलत समझा गया. हिन्दू अपनी संस्कृति के कारण सहिष्णु रहा, किसी दबाव में नहीं. अपने राजनैतिक हित साधने वालों ने महाभारत के उक्त शोल्क की बहुत गलत व्याख्या की. शरारती लोगों ने उक्त श्लोक की बहुत गलत और आधी अधूरी व्याख्या कर लोगों को बहुत भरमाया.
 
हिन्दू जीवन-दर्शन में अत्याचार करना और अत्याचार सहने, दोनों को समान रूप से निंदनीय माना है. हिन्दू जैसा सर्वसमावेशी और उदार धार्मिक स्वरूप किसी अन्य धर्म का नहीं है. संसार में जो भी चीज श्रेष्ठ है, दुष्ट लोग उसे नष्ट करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं. कोई भी समाज सिर्फ ज्ञान, शान्ति, अहिंसा आदि के आदर्श लेकर दुष्टों से सुरक्षित नहीं रह सकता. कोई कितना भी ज्ञानी या सदाचारी हो, दुष्ट लोगों के मन में उसके प्रति कोई कोमल भाव नहीं होता. वे इन सब चीजों को उसकी कमज़ोरी मानते हैं. यह सब अनादिकाल से होता चला आ रहा है. आसुरी शक्तियाँ हमेशा देवीय शक्तियों को दबाने और ख़त्म करने की कोशिश में लगी रहती हैं. इसके उदाहरण हमारे शास्त्रों में भरे पड़े हैं.
 
दुर्भाग्य से देश में एक ऐसा समय आया, कि हम एकांगी हुयी हो गये. हम पर नष्ट होने का ख़तरा मंडरा गया.  हमें अहिंसा का ओवरडोज देकर इस तरह पंगु बना दिया गया कि, हम लड़ना ही भूल गए. हम अपने देवी-देवताओं और अवतारों के उस आदर्श को भी भूल गये कि, सत्य और ज्ञान की रक्षा के लिएशास्त्र के साथ शस्त्र का पूरा ज्ञान होना ज़रूरी है. परिणाम वही हुआ, जो होना ही चाहिए था. छोटी-छोटी सेनाएं लेकर बाहरी लोग आकर हमें लूटते-खसोटते रहे और हमें अपनी ही धरती पर गुलाम बनाते गए. हम अपने ही धर्म में “जिम्मी” और गुलाम हो गये.
 
देश की आज़ादी के बाद (ना) पाक ने जब कश्मीर पर हमला किया, तो गांधीजी को भी यह बात समझ में आ गयी, कि देश की रक्षा शक्ति से ही हो सकती है. अहिंसा का अर्थ सिर्फ इतना है, कि हम अपनी ओर से किसी का कोई नुकसान नहीं करेंगे, किसी के अधिकारों का हनन नहीं करेंगे और किसी को भी अपनी ओर से कोई तकलीफ नहीं  देंगे. लेकिन हमारी अस्मिता पर यदि कोई हमला करेगा, तो हम उसका पूरी शक्ति से मुकाबला करेंगे. इसमें कोई हिंसा नहीं है. अहिंसा की गलत व्याख्या करने वालों के अनुसार तो श्रीकृष्ण को युद्ध नहीं होने देना था. क्या हुआ अगर किसी भाई ने आपकी संपत्ति गलत ढंग से छीन ली. वे साधु बनकर तपस्या करने चले जाते. संपत्ति के लिए लड़ने की क्या आवश्यकता थी? यह तो सब नश्वर है. लेकिन यह धर्म के विरुद्ध होता. अपने अधिकारों और सत्य की रक्षा के लिए लड़ना हिंसा की श्रेणी में नहीं आता.