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दुष्काल की तीसरी लहर और महंगाई का कहर -राकेश दुबे 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 22 Apr

सार

तीसरी लहर के साथ महंगाई के आंकड़े डराने और परेशान करने वाले हैं. करोड़ों लोग दुष्काल की दूसरी लहर की विदाई के बाद उम्मीद कर रहे थे कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने से स्थितियां सामान्य होंगी, लेकिन ओमीक्रोन वेरिएंट ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया...

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विस्तार

देश में दुष्काल की तीसरी लहर के साथ महंगाई के आंकड़े डराने और परेशान करने वाले हैं । निम्न आय वर्ग और मध्यम आय वर्ग के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि दो साल से जारी दुष्काल ने इन वर्गों की आय के स्रोतों को जबर्दस्त संकुचित किया है। करोड़ों लोगों की नौकरियां गई हैं और लाखों के वेतन में कटौती हुई है। पर्यटन व सेवा क्षेत्र से जुड़े करोड़ों लोग दुष्काल की दूसरी लहर की विदाई के बाद उम्मीद कर रहे थे कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने से स्थितियां सामान्य होंगी। लेकिन ज्यादा संक्रामक नये ओमीक्रोन वेरिएंट ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 

हर बृहस्पतिवार की तरह इस बृहस्पतिवार को सांख्यिकी विभाग द्वारा जो महंगाई के आंकड़े जारी किये हैं बताते हैं कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति दर दिसंबर में पांच माह के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इस अवधि में फैक्टरी उत्पादन में वृद्धि गिरकर नौ माह में सबसे कम दर्ज हुई है। निस्संदेह, यह ट्रेंड किसी भी देश की आर्थिकी के लिये दोहरी मार की तरह है। एक ओर लोगों की आय का संकुचन और दूसरी ओर महंगाई की मार।

सरकार और बाज़ार में अभी दुष्काल की तीसरी लहर के आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन बाकी है, लेकिन आये आंकड़े केंद्र सरकार के लिये सचेतक हैं कि बजट पेश करने से पहले और बजट में अर्थव्यवस्था को गति देने हेतु कौन से कदम उठाये जाने हैं। साथ ही यह भी कि महंगाई से राहत देने के लिये कौन से उपाय किये जाने चाहिए, क्योंकि यह एक राजनीतिक मुद्दा भी है। हालांकि, कोरोना दुष्काल के बीच महंगाई एक वैश्विक समस्या है और कई पडौसी देशों[श्री लंका ] में महंगाई से गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गये हैं, लेकिन फिर जनता को महसूस होना चाहिए कि महंगाई के दौर में सरकार की नीतियां संवेदनशील हैं। यह भी कि सरकार की ओर से जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश हुई। लेकिन यह सवाल खड़ा होता है कि सत्ता व विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दलों की महंगाई पर भाषा-परिभाषा बदल क्यों जाती है? यह सवाल सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों से है |

आंकड़े कहते हैं, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई दिसंबर में बढ़कर ५.५९ प्रतिशत पहुंच गई। यह दर नवंबर में ४.९१ प्रतिशत थी। मुख्य महंगाई क्रमवार तीसरे माह भी छह प्रतिशत से अधिक रही। उल्लेखनीय है कि इसमें खाद्य व ईंधन के परिवर्तनशील मूल्यों को शामिल नहीं किया जाता। दरअसल परिधान व फुटवियर और ईंधन के साधनों की मूल्यवृद्धि से खुदरा महंगाई ऊंचे स्तर पर पहुंची है। वहीं खाद्य महंगाई भी चार फीसदी से अधिक रही। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि दुष्काल की तीसरी लहर के प्रभावों के बीच मौद्रिक समिति नियंत्रण के उपायों पर गंभीरता से विचार करेगी। निस्संदेह, नये कोरोना संकट के बीच पटरी पर लौटती देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। ऐसे में देश की विकास दर के जो पूर्वानुमान केंद्रीय बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष द्वारा लगाये जा रहे थे, उसमें कटौती हो सकती है। 

सब जानते है कि देश की आर्थिकी कोरोना दुष्काल की दूसरी लहर के प्रभावों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पायी है। उत्पादन व कुछ अन्य क्षेत्रों में प्रदर्शन दुष्काल से पहली वाली स्थिति में पहुंचने को था कि तीसरी लहर ने मुश्किलें खड़ी कर दीं। देश का सेवा सेक्टर तो अभी पूरी तरह से सामान्य नहीं हो पाया था। अब संक्रमण रोकने के लिये कई राज्यों में लगे प्रतिबंधों से फिर इस क्षेत्र को झटका लगेगा। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां लोगों का सीधा जुड़ाव होता है। जैसे होटल उद्योग व अन्य व्यापारिक समूह, जो यातायात बाधित होने तथा सीधे संपर्क वाली सेवाओं में व्यवधान से काफी हद तक प्रभावित होंगे। सह बात है इसका असर देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धिदर पर पड़ेगा। कोरोना दुष्काल के चलते सप्लाई चेन में भी अवरोध उत्पन्न हुआ है और लोगों की क्रय शक्ति बाधित होने का असर महंगाई पर पड़ा है। कहने को सरकारों की ओर से जख्मों पर मरहम लगाने की कवायद होना थी जो नहीं हुई।