मध्यप्रदेश में जनजातीय समाज प्रथम पूज्य भगवान गणेश की तरह राजनीतिक वंदना और आरती में सबसे पहला स्थान पाता है. कहीं भी मध्य प्रदेश की संस्कृति की झलक दिखानी हो, तो जनजातीय समाज की कला-नृत्य और संस्कृति के बिना यह संभव नहीं हो पाता. संयुक्त मध्य प्रदेश में जनजातीय समाज की राजनीतिक ताकत और हिस्सेदारी आज से अधिक थी. छत्तीसगढ़ बन जाने से उनकी इस ताकत में कमी जरूर आई है, लेकिन अभी भी हर पांचवां विधायक किसी जनजातीय समाज से आता है. जनजातीय समाज का जितना विकास हुआ है, उससे ज्यादा विकास उनके लिए लागू विकास योजनाओं को अमलीजामा पहनाने वाले राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र का हुआ है. कितने अफसोस की बात है कि मध्य प्रदेश के गठन के 65 साल बाद भी इस समाज के कल्याण के लिए काम करने वाले सरकारी विभाग के नाम पर भी राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है.

पहले आदिवासी कल्याण, फिर अनुसूचित जनजाति कल्याण, आदिम जाति कल्याण फिर जनजाति कार्य विभाग जैसे बदलाव राजनीतिक सरकार के बदलाव के साथ होते रहे. जनवरी 2021 में इस विभाग का नाम आदिम जाति कल्याण से बदलकर जनजाति कार्य विभाग किया गया है जो अभी तक कायम है. मध्य प्रदेश के दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा के बीच आदिवासी समाज का विकास और गौरव विभाजित हुआ है. कांग्रेस “आदिवासी दिवस” मनाती है, तो भाजपा “जनजातीय गौरव दिवस”. क्या हमारी अस्मिता और गौरव को भी राजनीतिक विचारधारा में बैठकर देखना उचित है ? क्या ऐसी राजनीतिक संकीर्णता से विकास को सही दिशा मिल सकेगी ? जब हम प्रदेश का स्थापना दिवस दलों से ऊपर उठकर मनाते हैं, तो मध्य प्रदेश का गौरव जनजाति. गौरव दिवस को दलों से ऊपर क्यों नहीं रख सकते ?
भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को मध्य प्रदेश सरकार जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मना रही है, जो अच्छी बात है. यह गौरव सरकार का ही नहीं है बाकी सब लोगों का भी है. आदिवासी युवा संगठन “जयस” द्वारा कुक्षी में बिरसा मुंडा की मूर्ति स्थापित करने के साथ ही स्थानीय स्तर पर कई जगह समारोह मनाने की घोषणा की गई है. सरकार जनजातियों को राजधानी लाने का प्रयास कर रही है, तो जयस उन्हें भोपाल आने से रोकने के लिए स्थानीय कार्यक्रम मनाने पर काम कर रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के गौरव और विकास के मामले में हमेशा दलगत भावना से ऊपर उठकर सोचते और काम करते रहे हैं. जनजातीय जननायक के मामले में इस समाज के भावनात्मक एकीकरण की दिशा में काम होना चाहिए. वैसे तो जनजाति समाज उत्सव धर्मी समाज है जनजाति संस्कृति तीज त्योहार और उत्सव से भरी हुई है.

आदिवासी विकास के लिए दशकों पहले आदिवासी विकास उप योजना शुरू की गई थी इसके अंतर्गत आदिवासी कल्याण के लिए एकमुश्त बजट आदिवासी कल्याण विभाग के अंतर्गत आता है. शासन के सभी विभाग जनजाति कल्याण के कार्य योजना बनाते हैं और जनजातीय कार्य विभाग कार्य योजना को अनुमोदित कर खर्च की अनुमति देता है. आदिवासी उपयोजना में हो रहे खर्चों की व्यापक समीक्षा की जरूरत है. क्या उपयोजना में वास्तव में जनजाति कल्याण के लिए काम हो रहा है? सरकारी विभागों के लिए आदिवासी उपयोजना दुधारू गाय जैसी बन गई है.
जनजाति कल्याण और विकास की दिशा में लंबी यात्रा देश ने पूरी की है. एक बार फिर वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए नई दृष्टि की जरूरत है. जंगल और जनजातीय जीवन सह-अस्तित्व के सबसे बड़े उदाहरण हैं. जलवायु परिवर्तन के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा भाव व्यक्त किया कि भारत में जनजाति समाज जंगलों को बिना नुकसान पहुंचाए जीवन गुजारता है. इस सम्मेलन में 2030 तक वृक्ष नहीं काटने के संकल्प की घोषणा की गई. जनजातीय समाज तो स्वभाव से ही जंगल बचाने में लगा रहता है. जंगल और जनजातीय समाज के बीच मतभेद सरकारी तंत्र की वजह से होता है. इस पर जनजातीय दृष्टि से काम करने की जरूरत है.
जनजातीय समाज का एक बड़ा मुद्दा पंचायत उपबंध का इन क्षेत्रों में विस्तार कर स्थानीय शासन में इस समाज को पूरी स्वायत्ता देना है. छठवीं अनुसूची के उपबंध इन अंचलों में लागू होना है, जो अभी तक नहीं हुए हैं. संग्रहालय में नहीं जनजातियों के खुले जंगलों में जनजातीय संस्कृति को बचाने और विकसित करने की जरूरत है. शिवराज सिंह ने आदिवासी संस्कृति के लिए देसी शराब बनाने की छूट देने की घोषणा की है. हेरिटेज शराब की नीति बन रही है और इसमें निश्चित ही जनजाति समाज को छूट मिलेगी.
राजनीतिक रूप से जनजातीय समाज अपनी भागीदारी दमदार करने के लिए जुटा हुआ है. पहले तो आदिवासी परंपरागत रूप से कांग्रेस से जुड़े हुए थे, लेकिन 2003 के बाद आदिवासियों में बदलाव हुआ और भाजपा ने आदिवासियों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदिवासी अंचलों में सेवा के कार्य बखूबी करता है, जिसका भाजपा को लाभ मिलता है. सभी दलों को जन जनजातीय समाज में नए युवा नेतृत्व विकसित करने की जरूरत है.
कांग्रेस ने आदिवासियों की हिस्सेदारी से लंबे समय तक सत्ता चलाई और उन्हें राजनीतिक भागीदारी में दोयम दर्जे पर ही स्थान दिया. वर्ष 1980 में जब अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने थे, तब आदिवासी नेता भानु सिंह सोलंकी का दावा मजबूत था, लेकिन उनका हक़ उन्हें नहीं दिया गया. उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया. आदिवासी समाज की नेता जमुना देवी और प्यारेलाल कंवर भी उप मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने में सफल हुए थे. जमुना देवी एक ऐसी नेता थीं, जो आजादी के बाद हुए पहले चुनाव से लेकर अपनी मृत्यु तक आखिरी चुनाव प्रक्रिया में भी शामिल हुई थीं. आदिवासियों की बेरुखी ने ही कांग्रेस को राजनीति में हाशिए पर पहुंचाया है.
जनजाति समाज मध्य प्रदेश का गौरव है. इस समाज की सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में हिस्सेदारी भी उतना ही गौरव पूर्ण होना चाहिए. आदिवासी नेताओं के भोलेपन का कई बार सत्ता के दलालों ने दुरुपयोग किया है. भोलापन तो अभी भी है, लेकिन जनजातीय नेताओं को अब ठगा नहीं जा सकता. परिस्थितियां नहीं हैं. जनजातीय समाज बढ़ेगा तो मध्य प्रदेश बढ़ेगा. प्रदेश में जनजातीय विकास की तस्वीर संतोषजनक दिखाई पड़ती है. अपने समाज का भविष्य सुरक्षित रखने में अब जनजाति समाज स्वयं काफी हद तक सक्षम और समर्थ है.
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