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मोदी के आर्मी जैकेट पहनने पर बबाल क्यों? -अतुल पाठक

अतुल विनोद अतुल विनोद
Updated Sat , 25 May

सार

प्रधानमंत्री देश की न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी होता है| 

janmat

विस्तार

भारत के 130 करोड़ नागरिकों के निर्वाचित प्रधानमंत्री को आर्मी की कैमोफ्लेज जैकेट पहने जाने पर उसे यूनिफॉर्म बताकर सेना के नाम पर सियासत आजादी के समय की पार्टी के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती। राष्ट्रपति तीनों सेनाओं के सुप्रीम कमांडर होते हैं, तो प्रधानमंत्री देश के एग्जीक्यूटिव हेड होते हैं। भारत में न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी का प्रमुख प्रधानमंत्री होता है यानी परमाणु हथियारों का नियंत्रण प्रधानमंत्री के हाथों में है।   

पहले भी इस तरह से होता रहा है कि जब भी कोई निर्वाचित संवैधानिक मंत्री सीमाओं पर सेना के बीच जाता है, तब सेना सम्मान स्वरूप अपनी जैकेट और कैप भेंट करती रही है। यह एक सामान्य प्रथा है। यह कोई यूनिफॉर्म नहीं है। यूनिफॉर्म वह होता है, जिस पर सेना के वेजेस लगे होते हैं, प्रधानमंत्री जो जैकेट पहने हुए हैं, उसमें कोई सेना के वेजेस नहीं हैं और न सेना का पेंट उन्होंने पहना है, जिसे सेना का यूनिफार्म कहा जा सके।


 
राजनीति का स्तर कितना मुद्दाविहीन हो गया है कि देश के प्रधानमंत्री के पहनावे पर राजनीतिक बयानबाजियां होने लगी हैं। इससे तो यही प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री के विरुद्ध कोई मुद्दा ऐसा नहीं है, जिस पर राजनीति हो सके, तो ऐसी बातों पर राजनीति करके राजनीतिक कर्मकांड किया जा रहा है।
 
आजादी के समय भारत और पाकिस्तान दो राष्ट्र बने थे। दोनों राष्ट्रों में सिविलियन शासन और मिलिट्री की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर दिखाई पड़ता है। पाकिस्तान में सेना ने कई बार सिविलियन सरकार का तख्तापलट कर शासन पर कब्जा किया है, लेकिन भारत में कभी भी इस तरह का विचार ही उत्पन्न नहीं हुआ। सिविलियन और मिलिट्री को अलग अलग मनना पाकिस्तानी सोच हो सकती है। भारत में इस तरह की सोच को कभी भी स्वीकार नहीं किया गया।
 
इस पर जब विशेषज्ञों से बात की गई, तो ऐसा बताया गया कि इस तरह का कोई नियम नहीं है कि संवैधानिक पद पर बैठा कोई व्यक्ति आर्मी की यूनिफॉर्म नहीं पहन सकता, खासकर रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री।
 
सेना स्वयं सम्मान स्वरूप उनके बीच गए संवैधानिक व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए यूनिफार्म नहीं बल्कि अपनी जैकेट पहनाती रही है।
 
पहले भी कांग्रेस के समय और उसके बाद की सरकारों के रक्षा मंत्री जब भी सेना के बीच गये हैं, तब उन्होंने सेना की इस तरह की जैकेट पहनी है। इस तरह के चित्र भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।  फिर यह मुद्दा उठाए जाने के पीछे मंशा समझ के बाहर है।
 
भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सेना को पर्याप्त महत्व और संसाधन मुहैया कराए गए हैं। सेना को अत्याधुनिक हथियार और उपकरण भी जुटाए गए हैं। नरेंद्र मोदी की सेना में लोकप्रियता काफी बढ़ी है। सेनाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए वह हर साल दीपावली पर सैनिकों के बीच जाते रहे हैं। सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन की योजना भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच का परिणाम है।
 
राजनीतिक दल और राजनेता जब महसूस करते हैं कि सेना में किसी भी सरकार के प्रति सकारात्मक सोच बढ़ा है तब सेना  के नाम पर सियासत शुरू हो जाती है। जब पाकिस्तान पर सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की थी, तब भी सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाए गए थे। भले ही यह सवाल सिविलियन सरकार से पूछे गए थे, लेकिन इनका केंद्र बिंदु तो स्ट्राइक को अंजाम देने वाली सेना ही बनी थी।
 
संयोग से भारत की पाकिस्तान पर जीत और बांग्लादेश के निर्माण के 50 साल अगले महीने पूरे हो रहे हैं। जब युद्ध में भारत की सेना विजयी हुई थी, तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं उस वक्त तत्कालीन विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेई ने  इंदिरा गांधी को दुर्गा कहकर उनकी प्रशंसा की थी। उस समय के नेताओं ने 1971 की जीत का श्रेय इंदिरा गांधी को ही दिया था। लड़ी सेना थी, लेकिन उसका नेतृत्व निर्वाचित प्रधानमंत्री ने किया था। यही परंपरा है और जो सतत चल रही है ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री को सिविलियन कहकर शासन और मिलिट्री के नाम पर राजनीतिक बयानबाजी बेहद सस्ती मानसिकता का परिचायक लगती है, जो देश हित में नहीं कही जा सकती, जिस  इसके अलावा  प्रधानमंत्री मोदी को डिक्टेटर कहना अनुचित है। जो व्यक्ति करीब साल भर किसान आन्दोलन को बिना बाधा पैदा किये चलने दे  रहा है, उसे तानाशाह कहना किसी तरह उचित नहीं है। सख्ती और तानाशाही में अंतर होता है।