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नई दिशा दिखाती एक किताब..!

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 05 Mar

सार

भारत एक अजीब दौर से गुजर रहा है, कुछ लोग आदतन कह देते हैं कि भारत में इस्लाम खतरे में है..!

janmat

विस्तार

भारत एक अजीब दौर से गुजर रहा है, कुछ लोग आदतन कह देते हैं कि भारत में इस्लाम खतरे में है, दूसरी तरफ कुछ लोग अपने निहित स्वार्थवश इस्लाम के खतरों से आगाह करते रहते हैं, राजनीतिक माहौल बनता रहता है, देश का माहौल? भीड़ चाहे छोटी हो या समुदाय बड़ा हो विवेक इस्तेमाल कम होता है, ऐसे में जो नई किताबें आती है उन्हें समझने की कोशिश करना चाहिए भले ही आपका दृष्टिकोण आलोचनात्मक हो कम से कम दृष्टिपात तो करना ही चाहिए |

भारतीय इस्लाम के बारे में एक किताब संयुक्त अरब अमीरात में प्रकाशित हुई है, जिसमें भारतीय इस्लाम या इस्लाम के भारतीयकरण की तारीफ की गई है। भारत में इस्लाम का जो रूप है, उसकी तारीफ नई नहीं है। विश्व मुस्लिम समुदाय परिषद के तहत प्रकाशित इस पुस्तक में इस्लाम के किसी एक ही रूप को न मानते हुए उसके क्षेत्रीय रूपों को भी स्वीकार करने की बात कही गई है।

चूंकि इस्लाम के अरबीकरण की  यह कोशिश नई नहीं है, इसलिए भी भारतीय इस्लाम पर लिखी गई इस किताब धर्मशास्त्र, न्यायशास्त्र और समकालीन परंपरा: इस्लाम का भारतीयकरण  सांगोपान विवेचन  होना चाहिए, खुद पढ़े तो बेहतर, किसी अन्य की विवेचना में स्वार्थ का पुट आने से इंकार नहीं किया जा सकता।

वैसे यह प्रकाशन यूएई के उभरते बहुसांस्कृतिक स्वरूप को भी सामने रखता है। यूएई एक उदार समावेशी मुस्लिम बहुल देश के रूप में खुद को खड़ा कर रहा है। भारतीय इस्लाम की तारीफ या स्वीकारोक्ति में ऐसी किताब का आना यूएई और भारत के रिश्तों को और मजबूत बनाने की कोशिश ही फ़िलहाल दिखती है।

यूएई की इस मुस्लिम परिषद के विद्वान शोधकर्ता डॉक्टर अब्बास पनक्कल ने उचित ही कहा है कि मात्र अरब संस्कृति को इस्लाम के रूप में बढ़ावा देने और इस्लाम के सिर्फ एक स्वरूप को मानने में कई तरह की समस्याएं हैं। अलग-अलग क्षेत्रों व देशों में सक्रिय मुस्लिम विद्वानों ने लिखा है कि कैसे इस्लाम हिन्दुस्तानी जमीन पर पहुंचा और वहीं की संस्कृति व कला के साथ घुल-मिल गया। मस्जिदों की वास्तुकला में भी हिन्दुस्तानकी तत्समय मौजूद वास्तु कला का असर हुआ, यह तथ्य भारत में साफ उजागर भी हुआ है।

ऐसा अक्सर कह दिया जाता है कि यवन हमलावरों के साथ ही इस्लाम भारत आया था, पर वास्तव में इस्लाम तो उन व्यापारियों के साथ भी आया था, जो न धर्म के आधिकारिक प्रतिनिधि थे और न सरकारी अधिकारी थे। ऐसे में, सहजता के साथ, विशेष रूप से केरल में इस्लाम फैला। सदियों से केरल में इस्लाम का अलग ही रूप है। हां, इधर वहां भी मजहब के अरबीकरण की कोशिश दिखने लगी है, अत: इस किताब को पढने की जरूरत और बढ़ गई है।

यह पुस्तक एक तरह से यह संदेश देना चाहती है कि अरब का इस्लाम अपनी जगह है और केरल का अपनी जगह। जब हम दुनिया में इस्लाम के विविध रूपों को देखते हैं, तो आश्चर्य नहीं होता। एक खलीफा वाला कट्टर इस्लाम  भी था और एक अतातुर्क वाला आधुनिक इस्लाम भी रहा, और एक भारतीय इस्लाम भी है, जिसके स्वरूप की ज्यादा चर्चा होनी चाहिए।

यह किताब बताती है कि भारत में ऐसे मुस्लिम शासक भी हुए हैं, जिन्होंने मंदिरों को अनुदान देकर, गोहत्या पर प्रतिबंध लगाकर और हिंदुओं को अहम पदों पर बिठाकर सांस्कृतिक मेल-जोल को बढ़ावा दिया। मुसलमानों ने भी ईसाइयों और यहूदियों की तरह हिंदुओं को अपनापन दिया।

कुछ मुस्लिम शासकों ने अपनी मुद्राओं पर  धन की देवी लक्ष्मी  जी और नंदी की आकृतियों को भी मंजूर किया। यूएई के अबू धाबी स्थित मुस्लिम परिषद का मानना है कि भारतीय इस्लाम मॉडल दुनिया भर में कई मुस्लिम समुदायों के लिए एक बेहतरीन मिसाल के रूप में कारगर हो सकता है, आज देश में इस मॉडल पर सबसे अधिक चर्चा की जरूरत है  । वैसे यह किताब पूरे भारतीय समाज के लिए उपयोगी हो सकती है।

भारत ने ज्यादातर इतिहास में अरब की दिशा से आते हमलावरों का सिलसिला ही देखा है, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात से आई  यह किताब सामाजिक समरसता के भविष्य की ओर इशारा है। भारत ही नहीं विश्व को एक ऐसी संस्कृति की जरूरत है जिसका मूल मानवतावाद  पर टिका हो|