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मध्यप्रदेश की आदिवासी राजनीति में आया नया दौर

सार

आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनाने की नरेंद्र मोदी की रणनीति से मध्यप्रदेश कांग्रेस में भूचाल आ गया है। निर्वाचित राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के लिए मध्यप्रदेश में कांग्रेस विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग की गई है। जो खबरें सामने आ रही हैं, उसके मुताबिक 19 विधायकों ने पार्टी के खिलाफ विद्रोह कर अंतरात्मा की आवाज पर आदिवासी राष्ट्रपति के लिए वोट किया है। मतदान के पहले ही यह खबरें प्रकाशित हुई थीं कि कांग्रेस के अधिकांश आदिवासी विधायक एनडीए की राष्ट्रपति उम्मीदवार को सपोर्ट करेंगे..! 

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विस्तार

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने उस समय सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि बीजेपी राज्य में क्रॉस वोटिंग के लिए आदिवासी विधायकों की खरीद- फरोख्त कर रही है। यद्यपि बीजेपी ने इस वक्तव्य को शरारतपूर्ण बताया था लेकिन अब चूंकि कांग्रेसी विधायकों की क्रॉस वोटिंग जगजाहिर है, ऐसी स्थिति में कांग्रेस अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि विधायकों को कितनी कीमत पर किसके द्वारा खरीदा गया है? सवाल यह भी उठता है कि अगर खरीद-फरोख्त हुई है तो पैसे का जो लेनदेन हुआ है उसका पता लगाने कमलनाथ जांच की मांग क्यों नहीं कर रहे हैं?  

राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए प्रत्याशी की जीत के लिए किसी भी क्रॉस वोट की जरूरत नहीं थी, फिर भी कांग्रेस के विधायकों ने आदिवासी अस्मिता के नाम पर क्रॉस वोटिंग कर एनडीए को लाभ पहुंचाने से ज्यादा कांग्रेस के राज्य नेतृत्व के खिलाफ आदिवासी राजनीतिक विद्रोह का बिगुल बजाया है। 

मध्यप्रदेश में आदिवासी राजनीति हमेशा सत्ता तय करती रही है। जिस भी पार्टी को आदिवासियों का समर्थन मिलता है वही पार्टी प्रदेश में सरकार बनाती रही है। साल 2018 के चुनाव में आदिवासी समाज के समर्थन के बाद ही कमलनाथ सरकार बनाने में सफल हुए थे। यह सब ऐतिहासिक तथ्य हैं कि किन कारणों से सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस में विद्रोह हुआ और कांग्रेस सरकार का पतन हुआ। सरकार चली गई लेकिन राज्य में कांग्रेस की कार्यशैली और तौर तरीके नहीं बदले। इसी कारण कांग्रेस में राष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग के नाम पर दूसरा राजनीतिक विद्रोह सामने आया है। 

सिंधिया के विद्रोह के समय जो विधायक उनके साथ गए थे उनमें आदिवासी विधायक नगण्य थे। अब ऐसा माना जा रहा है कि आदिवासी अस्मिता के नाम पर इस बार क्रास वोटिंग अधिकांश इसी समुदाय के विधायकों द्वारा की गई होगी। इस बारे में पहले कुछ विधायकों के बयान भी आए थे। जिसमें ऐसा आभास दिया गया था कि इस समाज की मांग है कि आदिवासी महिला राष्ट्रपति के पक्ष में समाज के विधायक मतदान करें। 

राष्ट्रपति चुनाव के एक दिन पहले नगर निगम के प्रथम चरण के परिणाम घोषित हुए थे। कांग्रेस को नतीजों से थोड़ा आशा का संचार हुआ था दूसरे चरण में आए नतीजों ने तो उन्हें जश्न मनाने का मौका दिया था लेकिन जश्न मना पाते, उसके पहले ही राष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग का मातम सामने आ गया। इस निर्वाचन में पार्टी का व्हिप नहीं था, इसलिए अंतरात्मा की आवाज में मतदान करने वाले विधायकों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो सकती लेकिन दलीय शासन व्यवस्था में इसे पार्टी के खिलाफ धोखा ही माना जाएगा, पार्टी सिंबल पर निर्वाचित जनप्रतिनिधि पार्टी निर्देश के विरुद्ध मतदान करने की नैतिकता नहीं रखते। ऐसी हालत में जब क्रॉस वोटिंग से परिणामों में कोई बदलाव नहीं आने वाला तब इससे केवल राजनीतिक संदेश ही दिया जा सकता है, शायद कांग्रेस के आदिवासी विधायकों ने यही किया है। 

मध्यप्रदेश में आदिवासी राजनीति कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही रही है। छत्तीसगढ़ बनने के पहले कांग्रेस को लगातार सरकार में रहने का मौका इसीलिए मिलता रहा क्योंकि आदिवासियों का समर्थन कांग्रेस के साथ था। भाजपा के सत्ता में आने के बाद आदिवासी समाज धीरे-धीरे कांग्रेस से दूर होने लगा लेकिन पिछले चुनाव में इस समाज का पर्याप्त समर्थन कांग्रेस को मिला था।

मध्यप्रदेश की कांग्रेस की राजनीति और आदिवासियों की भागीदारी का विश्लेषण किया जाए तो ऐसा स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि कांग्रेस के नेताओं ने आदिवासियों के नाम पर सत्ता तो हथियाई लेकिन नेतृत्व में हमेशा उन्हें दोयम दर्जे पर ही रखा गया। आदिवासी नेता शिवभानु सिंह सोलंकी मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे और अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया था। श्रीमती जमुना देवी, प्यारेलाल कँवर को उपमुख्यमंत्री के रूप में ही संतोष करना पड़ा था। कांग्रेस की ओर से आदिवासी नेताओं को नेतृत्व कभी नहीं दिया गया। 

कांग्रेस में क्रॉसवोटिंग कर द्रौपदी मुर्मू को वोट करने वाले आदिवासी विधायकों का राजनीतिक संदेश स्पष्ट और दूरगामी है। युवा आदिवासी लीडरशिप अब पिछलग्गू राजनीति बर्दाश्त नहीं करेगी। उसे समानता के साथ हिस्सेदारी और नेतृत्व चाहिए। इसके साथ ही समाज के नाम पर एकजुटता का लाभ भी आदिवासी नेताओं को समझ आ गया है। 

क्रॉस वोटिंग से विचलित कांग्रेस नेताओं की ओर से बयान सामने आ रहे हैं, जिसमें यह कहा गया है कि जिन विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है। वह आस्तीन के सांप हैं। जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि आदिवासी विधायकों को क्रॉस वोटिंग के लिए खरीद-फरोख्त की जा रही है तो फिर अब क्रॉस वोटिंग के बाद इसमें कोई संदेह ही नहीं रहा। अधिकांश विधायकों ने आदिवासी समाज के लिए आदिवासी महिला राष्ट्रपति के पक्ष में वोटिंग की होगी। यदि यह सही है तो फिर आदिवासी विधायकों को आस्तीन का सांप कहना कहाँ तक उचित है? ऐसा नहीं है कि क्रॉस वोटिंग पहली बार हुई है। पहले भी कई अवसरों पर ऐसी घटनाएं हुई हैं लेकिन समाज के नाम पर पहली बार शायद ऐसा हुआ है। 

कांग्रेस को अब भविष्य की राजनीति में आदिवासियों को इग्नोर कर चलना मुश्किल हो जाएगा। जो समय निकल गया है वो निकल गया लेकिन अब भविष्य में कांग्रेस लीडरशिप आदिवासियों को दोयम दर्जे पर रखने की राजनीति नहीं कर सकेगी। क्रॉस वोटिंग का संदेश अगर सही ढंग से नहीं लिया गया तो मध्यप्रदेश की आदिवासी राजनीति में आया यह नया दौर कई मठाधीशों और जमे जमाए नेताओं की गणित में उलटफेर जरूर कर देगा। कांग्रेस में चल रहा आंतरिक घमासान प्रदेश की राजनीति में भाजपा के लिए हमेशा फायदे का सौदा रहा है। कांग्रेस के आदिवासी विद्रोह पर भी भाजपा की नजर है। अगले विधानसभा चुनाव में नई सरकार के गठन में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी और भाजपा अब कांग्रेस के इस आदिवासी विद्रोह का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।