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जवाबदेही नदारद, टपकता स्वार्थवाद

सार

परफॉर्मेंस मेरिट और मंत्री पद चुनावी राजनीति में फिट नहीं बैठता है. मंत्रिमंडल गठन के दिन ही सबसे पहले यही स्थापित किया जाता है कि, कैसे इसमें क्षेत्रीयता और जातीयता का संतुलन कायम किया गया है. यह कभी नहीं बताया जाता कि इसके गठन में परफॉर्मेंस और मेरिट को आधार बनाया गया है..!!

janmat

विस्तार

    विभागों में मंत्रियों का परफॉर्मेंस अकेले उनकी क्षमता और योग्यता पर नहीं आंका जा सकता है. मंत्री लीड करते हैं लेकिन परफॉर्मेंस तो विभागीय सिस्टम देता है. मंत्री का व्यक्तिगत रूप से आचरण, व्यवहार, आम लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं से सहजता से मिलना, यही उसके हाथ में है. इसी से उसका परफॉर्मेंस आंका जा सकता है.

    संगठन आधारित बीजेपी की शैली में मंत्रियों के परफॉर्मेंस का टेस्ट एक स्टाइल बन गई है. इस टेस्ट का वास्तविक रूप से परफॉर्मेंस के सुधार पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह कहना मुश्किल है. संगठन भले ही टेस्ट लेकर अब हिसाब मांग रहा हो लेकिन पब्लिक के सामने तो यह सारा हिसाब खुली किताब की तरह उपलब्ध है. 

    राजधानी से लगाकर जिला प्रशासन तक एक भी स्थान नहीं होगा जहां जनप्रतिनिधियों और ब्यूरोक्रेसी के बीच टकराव न हो. जहां तक जन प्रतिनिधियों के आचरण का सवाल है, वह भी सार्वजनिक रूप से कई बार ऐसा देखा गया है, जो गंभीर आपत्तिजनक कहा जा सकता है. मंत्री, विधायक और उनके परिवारजन किस तरह से शासकीय सेवकों के साथ व्यवहार करते हैं, उसके  उदाहरण पिछोर और अलीराजपुर की घटनाओं से महसूस किए जा सकते हैं.

    बहुत लंबा समय नहीं हुआ है. बरगी में एक क्रूज के कारण कितने लोगों को जल समाधि लेनी पड़ी है.उज्जैन में बस में आग लगने की घटना भी किसके परफॉर्मेंस के रूप में देखी जाएगी? यह सारी अव्यवस्थाएं सरकारी सिस्टम के कारण ही चल पा रही हैं. अगर क्रूज़ का मेंटेनेंस और प्रापर संचालन की व्यवस्था रही होती तो शायद उस घटना को रोका जा सकता था.

    बसों में आग लगने की घटनाएं तो लगातार हो रही हैं. इनके संचालन, मेंटेनेंस और फिटनेस को नियंत्रित करने वाले विभाग के परफॉर्मेंस पर क्या किसी टेस्ट की आवश्यकता है. आरटीओ दफ्तर जाने वाले किसी भी व्यक्ति से बिना टेस्ट के सच्चाई जानी जा सकती है.

     पूरा सिस्टम स्वार्थवाद की भेंट चढ़ता दिखाई पड़ता है. ऊपर से लेकर नीचे तक जवाबदेही का अभाव है. किसी भी अनियमितता या दुर्घटना के लिए जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है. बिना किसी टेस्ट के रोज मीडिया में सिस्टम की अराजकता को लेकर खबरें प्रकाशित होती हैं, अगर उन खबरों पर ही वास्तविक तथ्यों का पता लगा लिया जाए तो बिना किसी टेस्ट के मंत्री और सरकार के परफॉर्मेंस को समझा जा सकता है. 

    ऐसी खबरें सामने आई है कि, भोपाल के पास गुरारीघाट गांव में आईपीएस और आईएएस अफसरों ने बड़ी तादाद में सस्ती दामों पर जमीनी खरीदीं. कुछ महीनो के बाद सरकार की प्लानिंग में उनकी जमीनों के पास से बाईपास की योजना बनती है. इसके कारण उन जमीनों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो जाती है. कानूनी रूप से यह गलत नहीं है लेकिन नैतिकता को लेकर सवाल अवश्य खड़े होते हैं. 

    खबर सामने है कि, सत्ताधारी पार्टी के एक विधायक की जमीन तक सरकारी तंत्र से सड़क बनाई गई है. संभव है, जमीन पर होने वाली ऐसी स्वार्थवादी कार्रवाईयो के तथ्य मंत्रालय के बड़े-बड़े कक्षों तक ना पहुंचते हैं लेकिन जमीन पर आम लोगों को सब कुछ पता होता है. 

   संगठन और सरकार का सबसे पावरफुल कोर ग्रुप जिस दिन मंत्रियों का टेस्ट ले रहा है, उसी दिन यह खबर छपी है कि राज्य में पोषण का संकट है. तीस जिलों में बीते तीन महीने से टेक होम राशन नहीं पहुंचा है. क्या यह संकट सिस्टम की अराजकता का प्रमाण नहीं है. इस संकट के लिए क्या जिम्मेदारी तय नहीं की जानी चाहिए.

    राज्य की अर्थव्यवस्था की चिंतनीय स्थिति के लिए क्या किसी टेस्ट की जरूरत है. हर विभाग, निगम, मंडल कर्जों से दब रहे हैं. यह क्या उच्च स्तर पर पता नहीं है कि, राज्य के बड़े शहरों के मास्टर प्लान नहीं बन पा रहे हैं. इसके लिए कौन जिम्मेदार ठहराया जाएगा. लॉ एंड ऑर्डर पर तो आये दिन सवाल खड़े होते हैं. 

   मंत्री जिस सिस्टम को चलाने की जिम्मेदार हैं, वह सिस्टम कितनी सक्षमता और ईमानदारी से काम कर रहा है, इस पर कभी विचार किया जाता है? वास्तव में सिस्टम और मंत्रियों का ईमानदारी से टेस्ट लिया जाना है तो फिर उन्हीं से हिसाब मांगने के बदले पब्लिक के चुने हुए लोगों को आमंत्रित कर सरकार के परफॉर्मेंस का टेस्ट और हिसाब लेना चाहिए.

    टेस्ट की यह प्रक्रिया तो केवल औपचारिकता दिखाई पड़ती है. अगर किसी मंत्री का परफॉर्मेंस खराब भी पाया जाता है तो क्या इसी आधार पर मंत्री को हटाया जा सकता है? मंत्री बनने और हटाने में इस टेस्ट का कोई रिलेशन है? क्या परफॉर्मेंस का कुछ भी रोल होता है. 

    मध्य प्रदेश के ही आदिवासी वर्ग से आने वाले एक मंत्री को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. कार्रवाई करने के लिए निर्देशित किय गया है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है. क्योंकि वह जिस जनजातीय समाज से आते हैं, उसके समर्थन के बिना किसी भी सरकार के गठन की कल्पना नहीं की जा सकती.

     पिछली भाजपा सरकार में भी वह महोदय मंत्री पद पर विराजित थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री की पत्नी के विरुद्ध अमर्यादित टिप्पणी के कारण उन्हें पद से हटाया गया था लेकिन उनकी जनजातीय पृष्ठभूमि और पार्टी के लिए उसके महत्व को देखते हुए उन्हें फिर से मंत्री बनाना पड़ा था.

    ढाई साल का हिसाब बाद में लेने से ज्यादा परिणाम हासिल होने की उम्मीद नहीं है. परफॉर्मेंस के परिणाम तो पहले ही आ चुके हैं. पब्लिक के मन में परफॉर्मेंस दर्ज हो चुका है. 

   डेमोक्रेटिक स्ट्रक्चर में तुलनात्मक बेहतरी भले ही किसी पार्टी को संतोष के लिए पर्याप्त हो लेकिन यह बेस्ट नहीं है. परफॉर्मेंस टेस्ट तभी सफल होगा जब इसका लक्ष्य, बेस्ट हासिल करना होगा.