उत्तराखंड से शुरु यूसीसी की प्रक्रिया अब बीजेपी शासित राज्यों में सबसे प्रमुख एजेंडा बन गया है. गुजरात लागू कर चुका है. एमपी, यूपी और महाराष्ट्र में कमेटियां इस पर विचार कर रही हैं. अब असम में नई सरकार की पहली कैबिनेट में यूसीसी लाने का ऐलान कर दिया गया है..!!
बंगाल में भी नई सरकार जल्दी ही इस पर निर्णय लेगी. जिस तरह से बीजेपी की राज्य सरकारें समान नागरिक संहिता के मामले में आगे बढ़ रही है. उससे यह तय माना जा सकता है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले राष्ट्रीय स्तर पर भी यूसीसी बीजेपी और कांग्रेस के बीच टकराव का प्रमुख मुद्दा बनेगा.
यूसीसी का पूरा मामला एक तरह से महिलाओं के हितों के संरक्षण से जुड़ा है. यूनिफॉर्म सिविल कोड में मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और गोद लेने, भरण-पोषण और लिविंग रिलेशनशिप जैसे विषयों पर भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करने का विषय है. वर्तमान में विभिन्न धर्म, लिंग और जाति में इन मामलों में अलग-अलग विधान प्रभावशील है. यूसीसी का उद्देश्य है, कि धर्म लिंग या जाति की परवाह के बिना व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों में एक समान कानून देश में लागू हो.
सबसे पहले उत्तराखंड में यूसीसी कानून लागू किया गया है. इस कानून में आदिवासी और जनजातीय समूह की परंपराओं और रीति-रिवाज को प्रोटेक्शन दिया गया है. प्रयास यह किया गया है, कि परंपराओं और रीति-रिवाजों को संरक्षित करते हुए कानूनी रूप से सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू हो सके. इसमें विवाद परंपराओं और पर्सनल कानून को लेकर किया जा रहा है. पहले इस विचार को मुस्लिम विरोधी साबित करने का प्रयास किया गया. फिर इसे आदिवासी और जनजातीय समूह की परंपराओं के खिलाफ बताया गया.
बीजेपी के जो तीन वैचारिक मुद्दे थे, उनमें अयोध्या में राम मंदिर, कश्मीर में धारा 370 की समाप्ति और समान नागरिक संहिता लागू करना शामिल था. दो विषयों का समाधान हो चुका है. अब यूनिफॉर्म सिविल कोड पर भाजपा राज्यों में कदम बढ़ाया जा रहा है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसका विरोध कर रहा है. कांग्रेस सहित विपक्षी दल भी इसके विरोध में है.
जो भी राज्य सरकार यूसीसी पर आगे बढ़ रही है. वह मूल रूप से उत्तराखंड में लागू कानून को ही आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है. उत्तराखंड में यह कानून लागू हुए लंबा समय बीत चुका है. अब तक वहां पर ऐसा कोई सामाजिक विवाद उत्पन्न नहीं हुआ है. यूसीसी के तहत हलाला मामले में पहला आरोप पत्र रुड़की में दाखिल किया गया है. तीन तलाक केस मामले में पुनर्विवाह की शर्त के तौर पर हलाला को लेकर यूसीसी के प्रावधानों के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. महिला पर हलाला का दबाव बनाने के लिए पति समेत नौ आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया गया है.
हमारा संविधान यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की बात करता है. सुप्रीम कोर्ट और दूसरी अदालतों द्वारा अनेक बार यूसीसी लागू करने के निर्देश दिए गए हैं. इसमें जितने भी विषय हैं वह सब महिलाओं से जुड़े हुए हैं. वैसे तो जनजातीय समाज भी हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कानून का पालन करता है. केवल मुस्लिम समाज में ही पर्सनल कानून के अंतर्गत इन सभी विषयों पर निर्णय लिए जाते हैं. यह प्रगतिशील और वैचारिक विषय है. कई ऐसे मुस्लिम देश हैं जहां प्रगतिशील कानून के अंतर्गत इन विषयों पर अमल किया जाता है.
तीन तलाक पर जब कानून बनाया गया था तब उसका भी विरोध किया गया था. समाज में सुधार की दृष्टि से जो भी कदम उठाए जाते हैं, उन पर राजनीति से बचना राष्ट्र हित में होता है, लेकिन राजनीति तो बहुमत के प्रबंधन का नाम है. देश की राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदू ध्रुवीकरण पर टिक गई है.
इससे एक बात यह भी समझी जा सकती है कि मुस्लिम समाज में भी विभाजन हो रहा है. प्रगतिशील सोच वाले मुस्लिम बीजेपी को समर्थन करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं. समान नागरिक संहिता को धर्म से जोड़कर देखना ही न्याय संगत नहीं है. जब भारत के प्रत्येक नागरिक को दूसरे मामलों में कानूनी समानता है, तो फिर पारिवारिक विषयों पर यह समानता क्यों नहीं होना चाहिए?
यूनिफॉर्म सिविल कोड में सर्वाधिक विवाद मैरिज को लेकर दिखाई पड़ता है. यह कोड सभी धर्मों के लिए विवाह की एक समान प्रक्रिया और नियम निर्धारित करता है, जबकि वर्तमान में अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं. एक विवाह और बहु विवाह का मामला भी विवाद का कारण है. वैसे सामान्य रूप से बहु विवाह की स्थितियां अपने आप नगण्य होती जा रही हैं, लेकिन फिर भी कानूनी रूप से उस पर व्यवस्था स्थापित करना जरूरी लगता है.
यूनिफॉर्म सिविल कोड जरूरत है, लेकिन न्यूनतम विवाद के साथ इसे लागू किया जाए, तो यह सबसे बेहतर होगा. जो भी राज्य सरकारें यूनिफॉर्म सिविल कोड की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, उन्हें राजा विक्रमादित्य की सिंहासन बत्तीसी ध्यान में रखना चाहिए. प्राचीन भारतीय लोक कथाओं और कहानियों के इस संग्रह में सम्राट विक्रमादित्य के साहस, न्याय और बुद्धिमत्ता का वर्णन किया गया है.
हर शासन को अपने निर्णय में न्याय के साथ साहस और बुद्धिमत्ता का पूरा उपयोग करने का अधिकार है. सरकार उस अधिकार का उपयोग संवैधानिक स्ट्रक्चर में करते हुए विधि सम्मत फैसला करेगी, तो प्रत्येक नागरिक को मनाना बाध्यता होगी.
यूसीसी आधुनिक सरकारों की सिंहासन बत्तीसी का कथानक बन सके यही प्रयास राष्ट्रीय भावना है.
संविधान में यूसीसी की ज़रूरत और इस पर हो रही राजनीति टकराहट का करण नहीं बनना चाहिए.