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अदालतों की इंटीग्रिटी पर सवाल, बुनियाद पर चोट

सार

राजनीति का बौद्धिक आतंकवाद अदालतों की इंटीग्रिटी तक पहुंच गया है. जेल से सरकार चलाने वाली पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल शराब घोटाला केस में हाई कोर्ट जज को बदलने के लिए अदालत की इंटीग्रिटी पर ही सवाल खड़े करने लगे..!! 

janmat

विस्तार

    राजघाट पर धरना दिया. सोशल मीडिया पर न्यायाधीश और उनके परिवार के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाया. अब न्यायाधीश ने केजरीवाल का केस सुनने से अपने को अलग कर लिया है, लेकिन अदालत की इंटीग्रिटी के खिलाफ़ प्रचार अभियान चलाने के लिए आप पार्टी के नेताओं पर अवमानना का केस शुरु कर दिया है. कोर्ट से अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और संजय सिंह को नोटिस दिया गया है. अब तक अदालतों के साथ राजनीति कम देखने को मिलती थी, लेकिन आम आदमी पार्टी ने अदालत को ही राजनीति में घसीट लिया. जेल में रहते हुए अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली सरकार चलाने का जो अहंकार और दुस्साहस दिखाया था, उसका जवाब तो डेमोक्रेसी ने दे दिया है. नेताओं के ऐसे आचरण डेमोक्रेसी को ताकत दे रहे हैं या इसको ही कमजोर कर रहे हैं.

    न्यायाधीशों के फैसलों पर सवाल खड़े करना जायज हो सकता है, लेकिन उसकी इंटीग्रिटी पर ही सवाल डेमोक्रेटिक स्ट्रक्चर की बुनियाद पर ही चोट कर रहा है. आम आदमी पार्टी आंदोलन से निकली है. खुद को इंटेलेक्चुअल साबित करती है. राजनीति को प्रभावित करने वाले अनेक मुद्दे हैं जो अदालत में चल रहे हैं. अदालत के निर्णयों से ही राजनीति की दिशा प्रभावित होती है. पब्लिक और राजनीति के दबाव में सरकारें तो मजबूरी में ही ऐसे फैसले करती हैं, जिससे व्यवस्था में सुधार की संभावना हो.

   आस्था और धर्म से जुड़े मुद्दों पर तो सरकारें चुप्पी साध लेती हैं. ऐसे मामलों में अदालतों को ही निर्णय करना पड़ता है. अदालतों की इंटीग्रिटी पर कभी भी संदेह नहीं व्यक्त किया जाता है. कई बार अदालती फैसले किसी व्यक्ति या पक्ष को पसंद नहीं आते हैं. ऐसे फैसलों की तार्किक आलोचना भी की जा सकती है. अब तो राजनीति में यह फैशन बन गया है कि न्यायाधीशों की इंटीग्रिटी पर ही सवाल खड़ा कर दिया जाए.

    आम आदमी पार्टी को हाई कोर्ट दिल्ली की ओर से जो कंटेम्पट का नोटिस दिया गया है, उस पर कोर्ट को कानून के अंतर्गत सख्त कदम उठाने की जरूरत है. इस तरह की प्रक्रिया को रोका जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर भी सवाल खड़े किए जाते हैं. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ऐसे नियम हैं कि जो भी पीआईएल फाइल की जाती है, उसकी सुनवाई चीफ जस्टिस ही करते हैं. अधिकांश महत्वपूर्ण मामले पीआईएल में ही सामने आते हैं. चीफ जस्टिस उस पर फैसला करते हैं. 

    देश का बौद्धिक जगत राजनीति के आधार पर बंटा हुआ है. निष्पक्ष इंटेलेक्चुअल वर्ग खोजना लगभग असंभव है. राजनीति भी सेकुलर और हिंदुत्व में बंटी हुई है. सेकुलर राजनीति करने वाले दल और उससे जुड़े इंटेलेक्चुअल उनकी सरकारों की कमजोरी और अन्यायपूर्ण कार्रवाहियों का ना विरोध करते हैं और ना ही उन पर कोई राय व्यक्त करते हैं. इसी इंटेलेक्चुअल विभाजन में मीडिया भी अपना काम करता है.

     पांच राज्यों के चुनाव परिणामों से ऐसा उभरा है कि हिंदुत्व की राजनीति को चुनावी सफलता मिल रही है. राजनीति का बौद्धिक आतंकवाद इन परिणामों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करने के लिए चुनाव आयोग को ही कटघरे में खड़ा करने लगा है. डेमोक्रेसी और संविधान की रक्षा, मतदाता सूची के शुद्धिकरण से हो रही है या इसके पहले हो रही थी. बंगाल का ही अगर उदाहरण लिया जाए तो वहां के परिणामों ने देश के सेकुलर  इंटेलेक्चुअल वर्ग को चिंतित कर दिया है. वहां बिना हिंसा के चुनाव हुए. एसआईआर में करोड़ों नाम काट दिए गए. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर लंबित प्रकरणों के निराकरण के लिए ज्यूडीशिल कमीशन बनाए गए. एक भी मतदाता यह कहने के लिए सामने नहीं आया, कि उसका नाम सभी दस्तावेज होने के बावजूद, मतदाता सूची से हटा दिया गया है. लेकिन बौद्धिक आतंकवादी चुनाव आयोग पर ना मालूम क्या-क्या आरोप लगा रहे हैं.

   न्यायपालिका की अपनी कमजोरी हो सकती हैं. न्यायिक फैसलों पर टिप्पणी भी की जा सकती है. लेकिन न्याय के लिए अगर उन पर भरोसे को कमजोर किया जाएगा तो यह डेमोक्रेसी को भी कमजोर करेगा.

    राजनीति में दलों और विचारधाराओं की लड़ाई स्वाभाविक है. कम से कम अदालतों को तो इस विभाजन से अलग रखना चाहिए. सेकुलर और हिंदुत्व दोनों तरफ इंटेलेक्चुअल आतंकवादी हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर जूता फेंकने की घटना भी हुई थी. यह भी इसी तरह की कार्रवाही है, जैसी अरविंद केजरीवाल ने न्यायाधीश के खिलाफ अपने प्रचार अभियान में की है. सोशल मीडिया के टूल का खुलकर दुरुपयोग किया जा रहा है. इस पर कोई नियंत्रण नहीं है. इसका विस्तार इतना ज्यादा है कि इसको हर स्तर पर पकड़ना कठिन हो गया है. 

    जो भी न्यायाधीश हैं, उनके भी परिवार हैं. न्यायाधीश के लिए अपनी न्यायिक आचार संहिता है. उसके विपरीत आचरण करने वाले न्यायाधीशों के खिलाफ एक्शन की भी न्यायपालिका की आंतरिक व्यवस्था है. किसी को भी न्यायाधीश से शिकायत होने पर न्यायपालिका के निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता है. न्यायाधीश और अदालत की इंटीग्रिटी को सवालों के घेरे में लाना ऐसा कृत्य है, जो अगर रोका नहीं गया तो पूरी डेमोक्रेसी को हिला कर रख देगा. 

    अदालतों से ही सबको न्याय की उम्मीद है और अदालतों पर ही सबके सवाल भी हैं, क्योंकि देश के सारे महत्वपूर्ण मामले अदालतों में ही तय हो रहे हैं. इसलिए अदालतों और न्यायाधीशों की इंटीग्रिटी पर सवाल खड़े कर न्यायपालिका पर अविश्वास पैदा करने की राजनीति हो रही है. पहले संवैधानिक संस्थाओं पर चोट की गई, अब अदालतों और न्यायाधीशों की इंटीग्रिटी पर हमला हो रहा है.