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कानूनी विजय से हिंदुत्व की जय

सार

आस्था की टकराहट वाले विवादास्पद मुद्दों में कानूनी संघर्ष ही एक रास्ता है. धर्म, संस्कृति और आस्था के प्रतीकों को लेकर अदालतों में चल रहे मुकदमों का लंबा सिलसिला है. मध्य प्रदेश में भोजशाला को लेकर चल रहा मुकदमा हिंदुओं के पक्ष में आया है.

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विस्तार

    हाई कोर्ट इंदौर ने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर मानते हुए इसे हिंदुओं को सौंप दिया है. इसमें होने वाली नमाज को रोक दिया गया है. निर्णय के बाद एएसआई के निर्देश पर भोजशाला में हर रोज पूजा अर्चना प्रारंभ हो गई है. वाग्देवी की मूर्ति के चित्र की स्थापना कर दी गई है. अब तो लंदन के संग्रहालय से मूर्ति को वापस लाने पर सब की निगाहें हैं. हाईकोर्ट ने इसे वापस लाने का भी निर्देश अपने निर्णय में दिया है.

    देश में अदालतों पर सबका भरोसा है. छुटपुट प्रतिक्रियाओं के अतिरिक्त इस निर्णय पर सबकी सहमति दिखाई पड़ रही है. यह जरूर कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष द्वारा अपील की जाएगी. यह उनका संवैधानिक अधिकार है. इतने बड़े मामले में बिना सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगे कोई भी पक्ष कैसे अपना दावा पूरी तरह से छोड़ सकता है.

    भोजशाला का फैसला अयोध्या में राम जन्मभूमि की तर्ज पर दिया गया है. एएसआई की रिपोर्ट पर पूरा निर्णय निर्भर है. इस केस में इंदौर हाई कोर्ट के दोनों न्यायाधीश जिन्होंने फैसला दिया है, सुनवाई के पहले ही भोजशाला का निरीक्षण किया था. भोजशाला में चारों ओर जिस तरह के चिन्ह दिखाई पड़ रहे हैं, वह यही बताते हैं कि यह वाग्देवी का मंदिर ही रहा  होगा. 

    भोजशाला का संघर्ष लंबे समय से चल रहा है. इसमें तमाम सारे मोड़ आए, लेकिन अब कोर्ट के ऑर्डर पर यह पूरी तरह से हिंदुओं को मिल गया है. एएसआई के संरक्षण  में यह स्मारक सनातन आस्था की उस माला को आगे बढ़ाएगा जो आक्रांताओं द्वारा तोड़ने की कोशिश की गई थी. ऐसे और भी विवाद विभिन्न अदालतो में चल रहे हैं. 

    मथुरा की कृष्ण जन्म भूमि, काशी में विश्वनाथ मंदिर में ज्ञानवापी मुद्दा अदालत में चल रहा है. भोजशाला के जजमेंट में मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए भूमि मांगने पर राज्य सरकार को कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है. एमपी के सीएम मोहन यादव ने अपनी प्रतिक्रिया में यही कहा है, कि न्यायालय के निर्णय का पालन करने के लिए उनकी सरकार प्रतिबद्ध है. 

    सनातन और हिंदुओं की आस्था की जितनी भी मुकदमे अदालतो में चल रहे हैं, उससे राजनीति भी प्रभावित हो रही है. भोजशाला के मामले में भी राजनीति अपनी भूमिका से दूर नहीं रह सकती है. हिंदू कंसोलिडेशन इस समय देश की राजनीति को प्रमुखता से प्रभावित कर रहा है.

    अभी पांच राज्यों के चुनाव परिणाम पर विदेशी मीडिया ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है, उसमें यही कहा गया है कि भारत में हिंदू नेशनलिस्ट पार्टी तेजी से आगे बढ़ रही है. प्रश्न  यह उपस्थित होता है कि हिंदुत्व की राजनीति के लिए तो केवल एक ही पार्टी बीजेपी क्लेमेंट है. मुस्लिम वोट बैंक के लिए तो कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल खुलकर राजनीति करते हैं. लेकिन हिंदुत्व के लिए सीधी राजनीति करने से परहेज करते हैं.

   भोजशाला का मामला सनातन विचारधारा के लिए काफी महत्वपूर्ण है.वाग्देवी शिक्षा की देवी सरस्वती की प्रतीक हैं. भारतीय संस्कृति में सरस्वती की आराधना जीवन की शुरुआत से ही शामिल हो जाती है. धार्मिक विषय राजनीति से अलग होने चाहिए. लेकिन हमारी सामाजिक स्थिति ऐसी बन गई है कि कोई भी मुद्दा राजनीति से अलग नहीं हो पाता है.  

    वैसे तो कोई भी आस्था और धर्म  से जुड़ा विवाद उससे जुड़े पक्षों के बीच आपसी सहमति और संवाद से हल होना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. इसमें तो कोई संशय नहीं है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति को नष्ट करने में कोई कमी नहीं रखी है. उन आक्रांताओं के साथ भारत का मुसलमान अपने आप को नहीं जोड़ सकता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हुआ. यह भले ही कहा जाए कि ऐसे विवादों में राजनीति का अपना रोल होता है, लेकिन इससे राजनीति में सक्सेस की कोई गारंटी नहीं होती.

    अयोध्या में ही अगर इसका आंकलन किया जाए तो राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद जो पहला लोकसभा निर्वाचन हुआ था, उसमें अयोध्या की संसदीय सीट समाजवादी पार्टी ने जीती थी. बीजेपी जो कि राम जन्मभूमि आंदोलन से सीधे जुड़ी रही, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद मंदिर निर्माण के लिए सभी तरह की प्रक्रिया को सुगम बनाया. प्रधानमंत्री ने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की. फिर भी चुनाव में अयोध्या संसदीय सीट से बीजेपी को हार का मुंह देखना  पड़ा.

    भोजशाला में भी ऐसा ही माहौल दिखाई पड़ता है. यह धार विधानसभा और संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है. धार से विधायक और सांसद के रूप में बीजेपी और कांग्रेस दोनों समय-समय पर विजयी होते रहे हैं. वोट बैंक की पॉलिटिक्स अपनी जगह है, लेकिन धर्म और आस्था के मुद्दों पर जो पक्ष सनातन और हिंदुत्व के संघर्ष से किनारा करने की कोशिश करता है, उसको दीर्घकाल में भले ही कुछ प्रभाव पड़े, सनातन और हिंदू अपनी आस्था के प्रति बहुत देर से जागते हैं. 

    अदालतें निश्चित रूप से तथ्य और प्रमाणों के आधार पर अपना निर्णय देती है. अदालती निर्णयों से यही साबित होता है कि हिंदुओं की आस्था के साथ कितने लंबे समय तक खिलवाड़ होता रहा है. हिंदू समाज इस खिलवाड़ के लिए उस दौर की सरकारों और राजनीतिक दलों को भी जिम्मेदार मानते हैं. 

    भोजशाला के निर्णय से सनातन की माला को जोड़ने में निर्णायक दिशा मिलेगी. सनातन हिंदू आस्था के प्रतीकों पर चल रहे कानूनी मामलों में भी तेजी आ सकती है.

    प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट की चाल भी  सनातन और हिंदू संस्कृति की आस्था की गति को रोक नहीं पा रहे हैं. वक्त कितना भी लगे तथ्य और प्रमाण अदालतों को सत्य तक पहुंचा ही देते हैं.