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अन्नदाता और उसकी मुसीबतें 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 25 May

सार

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते दुनिया में खाद्यान्न संकट की आहट महसूस हो  रही है, मगर कीर्तिमान अनाज उत्पादन ने भारतीय किसानों की पसीने की महक देश को नया आत्मविश्वास दिया है..!

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विस्तार

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते दुनिया में खाद्यान्न संकट की आहट महसूस हो  रही है, मगर कीर्तिमान अनाज उत्पादन ने भारतीय किसानों की पसीने की महक देश को नया आत्मविश्वास दिया है। निस्संदेह कोरोना दुष्काल के बाद लगे सख्त लॉकडाउन के दौरान केवल कृषि क्षेत्र ने देश की जीडीपी को संबल दिया। इस बार बैशाखी की बयार किसानों में नई उमंग भर गई है दूसरी ओर किसानों की अंतहीन समस्याएं खत्म होती नजर नहीं आ रही हैं। 

जैसे मौसम  की मार के चलते अनाज की गुणवत्ता में गिरावट आई है, वहीं किसानों को मंडियों में अनाज ले जाने से लेकर बेचने तक की प्रक्रिया में तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह देखने में आता है कि  सत्ताधीश ग्रामीण विकास, सड़कों व मंडियों के रखरखाव तथा सुविधाओं के विस्तार के लिये आवंटित धन को अन्य मदों में खर्च कर देते हैं। इससे अन्नदाता की  अंतहीन समस्याओं का समाधान संभव नहीं होता। सर्वाधिक अनाज उत्पादक प्रदेश पंजाब से उदाहरण सामने आया है, वहाँ जहा ग्रामीण विकास फंड के दुरुपयोग के चलते केंद्र ग्रांट पर रोक लगाने की बात कर रहा था।

उसके बाद वित्तीय संकट से जूझ रही पंजाब सरकार ने कानून में बदलाव लाकर समस्या का युक्तिसंगत समाधान निकाला। पंजाब सरकार ने केंद्र की शर्तों के अनुरूप पंजाब ग्रामीण विकास (संशोधन) अध्यादेश-2022 को मंजूरी दे दी। इसके बाद राज्य सरकार रूरल डेवेलपमेंट फंड यानी आरडीएफ का पैसा केवल ग्रामीण विकास पर खर्च करेगी जिससे ११०० करोड़ रुपये की इस ग्रांट के पंजाब को मिलने का रास्ता साफ हुआ। दरअसल, इस ग्रांट को लेकर पंजाब का केंद्र से टकराव चल रहा था क्योंकि पूर्ववर्ती बादल व अमरेंद्र सरकार पर अनुदान का इस्तेमाल ग्रामीण विकास के बजाय अन्य कार्यों में खर्च करने के आरोप लगे। अब पंजाब सरकार कह रही है कि ग्रांट की धनराशि मंडियों व खरीद केंद्रों की सड़कों के निर्माण, मरम्मत, पेयजल व्यवस्था व भंडारण आदि पर खर्च की जायेगी। 

इस बात का पूरे देश में अनुसरण होना चाहिये।  हरियाणा के किसान भी गर्मी की वजह से कम पैदावार के संकट से जूझ रहे हैं। उन्हें भरोसा दिया गया है कि गेहूं की पैदावार औसत से कम हुई तो बीमा कंपनियां नुकसान की भरपाई करेंगी। दरअसल, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत कृषि विशेषज्ञ प्रत्येक गांव में फसल की औसत पैदावार का निर्धारण करेंगे। जनवरी में बेमौसमी बारिश व मार्च माह के मध्य में अप्रत्याशित गर्मी से गेहूं की फसलों को नुकसान पहुंचा है। आशंका है कि रबी की दूसरी फसलों का उत्पादन भी अन्य वर्षों के मुकाबले कम रह सकता है। राज्यों में गेहूं की कटाई शुरू हो चुकी है। दस से पंद्रह फीसदी कम उत्पादन की बात कही जा रही है।

वहीं किसानों को अधिक तापमान के चलते कई तरह की अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ रहा है। हरियाणा के कई जिलों में खड़ी फसलों में आग लगने की घटनाएं सामने आ रही हैं। झुलसाती गर्मी व तेज हवा आग को फैलाने की वजह बनती हैं वहीं पंजाब की मंडियों में गेहूं की फसल एफसीआई द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं आने से खरीद एजेंसियां खरीद में संकोच कर रही हैं। इसके बाद राज्य एजेंसियों के इंस्पेक्टर्स हड़ताल पर चले गये। यदि गेहूं की कम मानकों पर खरीद होती है और एफसीआई द्वारा कोई छूट नहीं दी जाती तो उसकी जवाबदेही इन इंस्पेक्टरों की होती है जिसके चलते वे कुछ समय के लिए खरीद प्रक्रिया से हट गये। ऐसा कमोबेश हर राज्य में होता है।

कई  राज्यों ने खरीद सीजन में गेहूं के सिकुड़े दानों के नियमों पर पुन: विचार करने का आग्रह केंद्र सरकार से किया था जिसे बाद में केंद्र ने मान भी लिया। गर्मी के कारण गेहूं की फसल पर पड़े प्रभाव के आकलन का दायित्व इंडियन ग्रेन स्टोरेज मैनेजमेंट  एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट को सौंपा गया है।इस संस्थान की चार टीमें देश के विभिन्न हिस्सों में  पहुंच रही हैं। विशेषज्ञों की टीमों ने विभिन्न जनपदों की मंडियों में पहुंचकर नमूने ले रहे हैं। निस्संदेह, खून-पसीने से फसल उगाने वाले किसानों की समस्याओं के प्रति सत्ताधीशों को संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए ताकि किसान खुशी-खुशी मंडी पहुंचे और प्रसन्न मन से अनाज का दाम लेकर घर जायें।