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जनतंत्र से साजिश, माफी की गलबहियों का राजनीतिक विष

सार

सत्ता की कामना और हवस से कुंठित राजनीति माफी के राजनीतिक विष से मध्यप्रदेश में अमृत लुटाना चाहती है. सत्ता के आंगन में अपने लोभ और मोह की भूख के लिए अभी भी मध्यप्रदेश के भविष्य को माफी की राजनीति तक ही सीमित रखना चाहते हैं.

janmat

विस्तार

आसमान में उड़ने वाले अब जमीन के किसानों के लिए न्याय की योजना ला रहे हैं. बिना अन्याय के न्याय की जरूरत क्या है? जब तक किसी के साथ अन्याय नहीं होगा तब तक किसी को न्याय की भी कोई आवश्यकता नहीं है. किसानों के लिए माफी की घोषणाओं के मृग मरीचिका किसान को कितना लाभ या नुकसान पहुंचाएगी यह अपनी जगह है लेकिन इसके नाम पर राज्य के खजाने से की जाने वाली राजनीतिक लूट टैक्सपेयर के साथ राजनीतिक अन्याय के अलावा क्या कही जाएगी?

भारत के गांव में भरे पेट जुगाली करने के लिए एक कहावत है ‘भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराय’ इसका मतलब है कि भैंस का जब पेट भरा होता है तब वह केवल जुगाली करती है. कुछ भी बात उसके लिए निरर्थक होती है आज राजनीति का भी यही हाल है. सब भरे पेट माफी की जुगाली कर रहे हैं. अपनी जेब से भिखारी को एक रुपए देने में भी प्राण निकलेंगे लेकिन सरकारी खजाने से माफी लुटाने में यह भी देखने को तैयार नहीं कि टैक्सपेयर के साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है?

आज राजनीति लोगों को कर्महीन और तृष्णा का प्यासा बना रही है. कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने आज जो घोषणाएं की हैं उनमें किसानों को पांच हॉर्स पॉवर तक निशुल्क बिजली, कर्ज माफी और बिजली बिलों की माफी की बात कही गई है. ऐसा लगता है कि जैसे मध्यप्रदेश में अगले चुनाव के लिए माफी की बोली लगी हुई है. इस बात की प्रतियोगिता चल रही है कि कौन कितनी माफी की योजनाएं लाकर जनता को अपने साथ जोड़ सकता है. बिजली बिल माफ करने की शुरुआत कांग्रेस द्वारा ही पहले की गई है. पांच हॉर्स पावर तक के सिंचाई पंपों को भी दिग्विजय सरकार में निशुल्क बिजली दी गई थी. झुग्गीवासियों को एक बत्ती कनेक्शन की शुरुआत भी कांग्रेस ने ही की थी.

केवल माफी और निशुल्क योजनाएं हीं अगर सत्ता प्राप्त करने के लिए सबसे कारगर माध्यम होतीं तो फिर कांग्रेस को 18 साल से राज्य की सत्ता से दूर नहीं होना चाहिए था. साल 2003 का जनादेश कांग्रेस की तमाम निशुल्क योजनाओं के बाद आया था. कांग्रेस को योजनाओं की गारंटी और न्याय देने का भूत सवार हो गया है. कर्नाटक में जीत के बाद तो यह भूत सिर पर चढ़कर बोलने लगा है. सड़क,बिजली, पानी की बुनियादी सुविधाओं पर कांग्रेस का नजरिया राज्य के लोगों ने 10 साल की सरकार में देखा है.
 
हर मैच एक ही रणनीति पर नहीं जीता जा सकता. जो रणनीति कर्नाटक में सफल हुई है वही रणनीति कांग्रेस कई राज्यों और लोकसभा चुनाव में पहले भी उपयोग कर चुकी है लेकिन उसके हाथ असफलता ही लगी. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने तमाम आर्थिक विशेषज्ञों से विचार-विमर्श के बाद देश के प्रत्येक परिवार को प्रतिमाह 6 हज़ार और वर्ष में ₹72 हज़ार की सहायता देने के लिए न्याय योजना का ऐलान अपने घोषणा पत्र में किया था. कांग्रेस को मिले जनादेश से यह साबित होता है कि इस पर देश ने भरोसा नहीं किया था. उत्तरप्रदेश के चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में ऐसी ही घोषणाएँ की थी जिन पर अगर राज्य की जनता विश्वास कर लोभग्रस्त हो जाती तो कांग्रेस की वहां ऐसी हालत नहीं होती.

कोई भी राजनीतिक दल जन सहयोग से क्रांतिकारी बदलाव के लिए पार्टी स्तर पर कोई पहल करने की हिम्मत क्यों नहीं करता? सारा ठीकरा राज्य के खजाने पर ही फोड़ा जाएगा? कांग्रेस की 15 महीने की सरकार में वायदे के मुताबिक किसानों का कर्जा माफ कर दिया गया होता तो फिर से कर्जा माफ करने की घोषणा की आवश्यकता क्यों पड़ती? इसका मतलब है कर्जा माफी की घोषणा का अमृत किसानों को नहीं मिला बल्कि कांग्रेस सत्ता की संजीवनी पाने में सफल हो गई थी.

कांग्रेस में बगावत और टूट का कारण भी सार्वजनिक रूप से तो यही बताया जाता है कि किसानों के साथ किए गए वायदों को पूरा नहीं किया जा रहा था. इसलिए एक ग्रुप ने बगावत कर दी थी. राजनीति के पाखंड, दोगलेपन और संवेदनहीनता पर वास्तविकता जाहिर करने के लिए शब्द भी कम पड़ रहे हैं.

कांग्रेस माफी की घोषणाएं कर रही है तो बीजेपी की ओर से सरकार के प्रवक्ता नरोत्तम मिश्रा यह दावा  कर रहे हैं कि सरकार कोरोनाकाल में किसानों का बिजली का बिल पहले ही माफ कर चुकी है. उनका कहना है कि पांच हॉर्स पावर के सिंचाई पंपों पर 90% से ज्यादा सब्सिडी सरकार पहले से ही दे रही है. किसानों पर लगे मुकदमों की वापसी की घोषणा पर भी उनकी यही प्रतिक्रिया है कि ऐसे केस पहले ही वापस लिए जा चुके हैं.

इसका आशय यह है कि सरकारी खजाने की लूट से राजनीतिक समर्थन बढ़ाने की दौड़ इतने खतरनाक दौर में पहुंच चुकी है कि राजनीतिक दलों को तो अब माफी के लिए कोई नई सलाह भी नहीं मिल पा रही है और ना ही उनके मस्तिष्क में कोई नया विचार आ पा रहा है.

मध्यप्रदेश के साथ न्याय कौन करेगा? अलग-अलग समुदायों के साथ अलग-अलग जातियों के साथ तो न्याय करने की बात राजनीतिक दल सीना ठोक कर करते हैं लेकिन कोई भी दल यह कहने का साहस नहीं करता कि वह मध्यप्रदेश के साथ न्याय करेगा. न्याय तभी कहा जाएगा जब किसी के साथ भी अन्याय ना हो.

राजधानी भोपाल में ही कालोनियों और बस्तियों में पहुंच मार्ग की हालत देखने के लिए राजनेताओं की नजर नहीं जाती. माफी लुटाने के लिए सरकारों के खजाने में पैसे की कोई कमी नहीं है. सेवा के लिए राजनीति की कल्पना अब बेमानी ही कही जाएगी. अब तो सारी राजनीति जनता के धन से ही जनता के सिर पर ही फ़ोड़ी जा रही है. जनधन पर सबका बराबर अधिकार है. फिर राजनेता सियासी लाभ के लिए इसे एक तरफा लुटाने का काम क्यों करना चाहते हैं?

ऐसा लगता है कि सियासी अमीरी का षड्यंत्र ही गरीबी है. सियासी सूरमा जनधन से निशुल्क योजना और माफी तो ऐसे बांट रहे हैं कि जैसे उनकी परम शक्ति अस्तित्व के भी ऊपर है. कांग्रेस की ओर से नर्मदा की सेवा के लिए नर्मदा सेवा सेना बनाने का भी ऐलान किया गया है. सेना की सोच तो युद्ध के लिए होती है सेवा के लिए समर्पण की जरूरत होती है सेना की नहीं. 

पिछले विधानसभा चुनाव के समय नर्मदा सेवा और नर्मदा यात्रा पर भी प्रतियोगिता हो चुकी है. कांग्रेस पांच विधानसभा सीटों से चुनाव परिणामों में आगे निकल गई थी तो शायद फिर से सोचा गया होगा कि नर्मदा सेवा का कोई टोटका निकाला जाए. सरकार की ओर से भी नर्मदा सेवा यात्रा निकाली गई थी. नर्मदा सेवा न्यास भी बना था. नर्मदा के हालात पर कहने से ज्यादा समझने की जरूरत है.

जनधन से माफी की गलबहियां कुर्सी पर कब्जे की जंग जीतने के लिए एटम बम के रूप में उपयोग की जा रही हैं. इसमें कौन आगे है कौन पीछे है, इस पर फैसला बहुत मुश्किल से ही हो पाएगा. प्रदेश की जनता के लिए जीवन और भविष्य का चुनाव लोभ और मोह से आगे बढ़कर करने की जरूरत है. राज्यों के धन के उचित उपयोग के लिए उत्तरदायित्व पूर्ण खर्च के विधान भी बने हुए हैं. सियासत इन विधानों को भी नोच-नोच कर न्याय न्याय चिल्लाने से गुरेज नहीं कर रही है.