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अपराध से अपराध का नहीं होता अंत

सार

तीर्थराज प्रयागराज में माफिया डॉन अतीक और अशरफ की कैमरों के सामने पुलिस कस्टडी में बेखौफ अपराधियों द्वारा जिस तरह से हत्या की गई है उससे भले ही एक माफिया का अंत हो गया हो लेकिन दूसरा माफिया उगता हुआ दिखाई पड़ रहा है. अपराध से अपराध का अंत ना कभी हुआ है ना हो सकेगा..!

janmat

विस्तार

अपराध का मनोविज्ञान और पूरी दुनिया में गैंगवार का इतिहास देखा जाए तो राख़ से फिर अपराध पैदा हो जाता है, अगर अपराधी की नजर से देखा जाए तो अतीक और अशरफ के अंत को पाप की सजा कहा जा सकता है लेकिन जिन लोगों ने हत्या की है उन्होंने भी पाप किया है. अपराध का अंत और सजा, न्याय से ही आपराधिक प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने के लिए कारगर होती है. आध्यात्मिक और सांस्कृतिक नगरी प्रयागराज जिसका वैभवशाली और पुण्यदायी इतिहास है ऐसे ऐतिहासिक नगर को अपराध की काली छाया कलंकित कर रही है.

अतीक और अशरफ़ अपराध के जरिए प्रसिद्धि और राजनीति में मुकाम हासिल करने के प्रतीक के रूप में देखे जा रहे थे. जिन शूटर्स ने उनकी हत्या की है उन्होंने भी प्रारंभिक जांच में यही कहा है कि प्रसिद्धि पाने के लिए उन लोगों ने माफिया डॉन की सरेआम हत्या की है. तीनों हत्यारे नौजवान हैं. उनका मन अपराध के जरिए प्रसिद्धि पाने के उन्माद तक कैसे पहुंचा? यह समाज के लिए झगझोरने वाला है. अतीक अहमद को पिछले दिनों ही प्रयागराज की अदालत में उमेश पाल के अपहरण के मामले में आजीवन कारावास की सजा दी गई है. उमेश पाल की हत्या के मामले में पूछताछ के लिए अतीक को साबरमती जेल से और अशरफ को बरेली जेल से प्रयागराज लाया गया था.

न्यायालय से कस्टडी प्राप्त कर पुलिस उनसे पूछताछ कर रही थी. इसी दौरान अस्पताल में मेडिकल के लिए दोनों को ले जाया जाता है और कैमरों के सामने तीनों अपराधियों द्वारा दोनों को गोलियों से भून दिया जाता है. आकस्मिक हुई इस घटना को लेकर पुलिस की चूक से ज्यादा प्रतिक्रियाएं राजनीतिक नजरिए से आ रही हैं. योगी सरकार को उनके विरोधियों द्वारा इस बात के लिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है कि इसके पीछे कोई षड्यंत्र है. न्यायिक जांच आयोग गठित किया जा चुका है. पुलिस की एसआईटी बनाई जा चुकी है. जांच के बाद ही सारे तथ्य सामने आएंगे.

अतीक और अशरफ दोनों ने अपनी हत्या की आशंका व्यक्त की थी. यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के नाम उनके द्वारा लिखे गए गोपनीय पत्र की जानकारियां भी सामने आ रही हैं. किसी भी सरकार का माफिया डॉन को नेस्तनाबूद करना लक्ष्य होना चाहिए. इसके लिए न्याय व्यवस्था ही जरिया हो सकता है. शूटआउट में हत्या पर सवाल उठ रहे हैं. राजनीतिक सवालों के जवाब तो लंबे समय तक दिए जाते रहेंगे लेकिन इस सारे घटनाक्रम से जो कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं जिससे शासन-प्रशासन की कमजोरी और नाकामी की परिस्थितियां सामने आ रही है, उन पर जरूर ईमानदारी के साथ चर्चा होना चाहिए.

सबसे पहला सवाल कि अपराध के जरिए प्रसिद्धि पाने और राजनीति में मुकाम हासिल करने की प्रवृत्ति क्यों और किन परिस्थितियों में पनपती है? अतीक और अशरफ का ही उदाहरण लिया जाए तो पहले अपराध जगत में इन दोनों ने अपना मुकाम हासिल किया जब उन्हें अपराध जगत में प्रसिद्धि मिली तब राजनीति में उन्हें अवसर देकर उनका लाभ उठाने और उन्हें लाभ पहुंचाने की शुरुआत जिन राजनीतिक दलों द्वारा की गई क्या इस सारे घटनाक्रम में उनकी भूमिका बिल्कुल विस्मृत कर दी जाएगी? अगर राजनीति में इस माफिया डॉन को मौका नहीं मिला होता तो क्या इतने लंबे समय तक अपने अपराध के व्यापार को यह कायम रख सकता था? 

आज भले ही इस माफिया डॉन की हत्या हो गई हो लेकिन पूर्व सांसद या पूर्व विधायक के नाते देश की संसद या विधानसभा में निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने का क्या उसका रिकॉर्ड मिटाया जा सकता है? पूर्व सांसद पूर्व विधायक को सदन में श्रद्धांजलि देने की भी परंपरा है इस परंपरा का लाभ क्या इस दुर्दांत को नहीं मिलेगा? और अगर ऐसा होगा तो फिर क्या लोकतंत्र की परंपरा में अपराधियों का महिमामंडन नहीं होगा?

वैसे तो दो साल की सजा के बाद संसद या विधानसभा की सदस्यता समाप्त हो जाती है तो फिर ऐसी ही व्यवस्था पूर्व सांसद व पूर्व विधायकों के बारे में क्यों नहीं की जानी चाहिए? नियमों में इस तरह का संशोधन किया जाना चाहिए कि दो साल से अधिक सजा पाने वाले पूर्व विधायक और पूर्व सांसदों का संसद और विधानसभाओं से सदस्यता का रिकॉर्ड समाप्त कर दिया जाए, अगर ऐसा हो सकेगा तो फिर अपराध की सजा प्राप्त पूर्व सांसद और पूर्व विधायक को निधन के बाद सदन में श्रद्धांजलि देने की परंपरा को नहीं निभाना पड़ेगा.

जिन तीन शूटर्स ने गोली मारी है, वह कह रहे हैं कि उन्होंने ऐसा प्रसिद्धि पाने के लिए किया है. मतलब एक माफिया डॉन को मारने के लिए दूसरे माफिया डॉन का जन्म हुआ है. हर माफिया डॉन का अंत ऐसा ही होता है. इसलिए जो नए जन्म लेने वाले माफिया हैं उनका भविष्य भी ऐसा ही होगा तो यह परिस्थितियां समाप्त कब होंगी ? गैंगवार और पुश्तैनी दुश्मनी के मामले में अक्सर ऐसा देखा गया है कि पूरे खानदान तक समाप्त हो जाते हैं लेकिन फिर पीढ़ियों बाद फिर से परिवार का कोई न कोई व्यक्ति बदला लेने के लिए अपराध की दिशा में आगे बढ़ जाता है.

अपराध के प्रति प्रसिद्धि के लिए इतना उन्माद क्या लोकतंत्र के लिए सही कहा जाएगा? अपराध खत्म करने के लिए जरूरी है कि वर्तमान अपराधियों को समाप्त किया जाए लेकिन नए अपराधी भी ना पैदा हों. अगर नए अपराधी पैदा होते रहेंगे तो फिर अपराध तो कभी भी समाप्त ही नहीं होगा. अपराध से राजनीति में मुकाम हासिल करने की प्रवृत्ति बहुत घातक दिखाई पड़ रही है.

वर्तमान में भी सभी दलों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक प्रकरण की लंबी संख्या है. यूपी में तो जैसे माफिया डॉन राजनीति में सफलता का पैमाना बन चुके हैं. क्षेत्रीय दलों की राजनीति में इस तरह की प्रवृत्ति को ज्यादा बढ़ावा मिला है. राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में इस प्रवत्ति को ज़रूर रोकने की कोशिश की जाती है. क्षेत्रीय दल स्थानीय स्तर पर सफलता के लिए अपराधियों का सहारा लेने से नहीं चूकते हैं. 

अतीक अहमद के मामले में भी ऐसा ही हुआ है. इसके अलावा भी कई माफिया हैं जो राजनीति में निर्वाचित जनप्रतिनिधि बने हुए हैं. अपराधियों को राजनीति में मुकाम हासिल होने की प्रवृत्ति से राजनीतिक दलों को बचने के लिए विशेष प्रयास करना पड़ेगा. लोकतंत्र के भविष्य के लिए ऐसी सियासत प्रतिगामी ही साबित होगी.

अपराध और राजनीति में घालमेल से मुकाम हासिल करने वाले माफिया डॉन अकूत संपत्ति बना लेते हैं. मतलब धन हासिल करने का यह मॉडल सबसे कारगर दिखाई पड़ता है. अतीक के शूटर्स भी शायद इसी मॉडल पर आगे बढ़ना चाहते हैं. इसीलिए प्रसिद्धि पाने के नजरिए से इतना बड़े कांड को अंजाम दिया है.

सारे घटनाक्रम में पुलिस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. जो भी खामियां होंगी वह सामने आएंगी और कार्यवाही भी होगी. प्रथम दृष्टि में जिम्मेदार पुलिसवालों को निलंबित किया जा चुका है. इस सारे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण पक्ष जर्नलिस्ट की भूमिका भी है. तीनों हत्यारे जर्नलिस्ट के रूप में कैमरे और माइक आईडी के साथ वहां पहुंचे थे.

इस पूरे हत्याकांड में पत्रकारों के भेष में पहुंचे अपराधियों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में भी मानव बम के रूप में जो महिला पहुंची थी उसने अपनी पहचान पत्रकार के रूप में  बताई थी. इस घटना के बाद केंद्रीय गृह विभाग द्वारा पत्रकारों  के लिए SOP बनाने की चर्चा हो रही है. जिस तरह से आपराधिक घटनाओं में पत्रकारों  के रूप में अपराधियों द्वारा प्रवेश किया जाता है उसके कारण पत्रकारों को भी बदनाम होना पड़ता है. अपराधियों को मीडिया में इतना हाइप  देना भी शायद उचित नहीं कहा जाएगा. अतीक के मामले में पिछले एक सप्ताह से पूरा मीडिया 24 घंटे उस पर ही खबरें चलाते हुए देखा गया है.

अपराधियों का महिमामंडन मीडिया के जरिए सारी सीमाएं तोड़ता हुआ दिखाई पड़ रहा है. लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण होती है लेकिन व्यवस्था के अंतर्गत यदि प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा. क्या अतीक को मेडिकल कराने के लिए हॉस्पिटल ले जाना ही का एकमात्र विकल्प था? क्या मेडिकल की टीम पुलिस थाने नहीं बुलाई जा सकती थी? इतनी रात में मीडिया को इतने दुर्दांत अपराधी के पास इतना करीब जाने की इजाजत क्यों दी गई?

सारे घटनाक्रम पर आ रही राजनीतिक  प्रतिक्रियाएं और उनके पीछे छिपे संदेशों को अगर ध्यान से पढ़ा जाए तो हर शब्द और वाक्य के पीछे कहीं ना कहीं भविष्य की राजनीतिक भूमिका और योजनाएं छिपी हुई दिखाई पड़ती हैं. अपराध की सियासत को बढ़ावा सियासत का सबसे बड़ा अपराध कहा जाएगा.