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 विकसित भारत: लक्ष्य अभी बहुत दूर 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 14 Jul

सार

सवाल यह है ‘विकसित भारत’ का क्या मतलब है? उत्तर में अर्थव्यवस्था का आकार कई कारणों से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह मानदंड अकेले ही विकसित देश का दर्जा पाने की पात्रता नहीं है..!

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विस्तार

अगला आम चुनाव नज़दीक है। सरकार का लक्ष्य इसके पहले  ‘विकसित भारत’ की कल्पना को साकार करना था। सवाल यह है ‘विकसित भारत’ का क्या मतलब है? उत्तर में अर्थव्यवस्था का आकार कई कारणों से महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह मानदंड अकेले ही विकसित देश का दर्जा पाने की पात्रता नहीं है। जैसे चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और इसे एक महाशक्ति माना जाता है जो अंततः अमेरिका से आगे निकल जाएगा, लेकिन इसे विकसित नहीं माना जाता है क्योंकि इस देश के औसत नागरिक औसत अंग्रेजों की तुलना में चार गुना गरीब है और औसत अमेरिकी नागरिकों की तुलना में छह गुना गरीब हैं।अब भारत की बात, भारत अब ब्रिटेन से आगे निकलकर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है लेकिन औसत भारतीय औसत अंग्रेजों की तुलना में 20 गुना गरीब हैं। ऐसे में हमें विकसित और प्रगतिशील देश वाले वाले मानदंड पर एक लंबी राह तय करनी है।

आँकड़ा पुराना है, वर्ष 2022 में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 41 देशों को विकसित अर्थव्यवस्थाओं के तौर पर वर्गीकृत किया लेकिन इसकी परिभाषा स्पष्ट या समय के साथ सुसंगत नहीं दिखती है। विश्व बैंक 2022 की कीमतों के आधार पर प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के लिए 13,205 डॉलर की सीमा का उपयोग करते हुए लगभग 80 देशों को ‘उच्च आय’ वाली श्रेणी में वर्गीकृत करता है।संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम में मानव विकास सूचकांक, प्रति व्यक्ति आय में मानव जीवन के अहम आयामों (जीवन प्रत्याशा, शिक्षा आदि) को जोड़ता है और यह 66 देशों को ‘उच्च मानव विकास’ श्रेणी में वर्गीकृत करता है जो एक विकसित अर्थव्यवस्था की मोटी परिभाषा के अनुरूप है।

मौजूदा स्तर पर विकसित देश के 13,205 डॉलर के प्रति व्यक्ति आय स्तर तक पहुंचने में प्रति व्यक्ति आय में सालाना 7 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ अभी भी 25 साल लगेंगे। इसका मतलब है कि जनसंख्या वृद्धि को ध्यान में रखते हुए अगले 25 वर्षों तक प्रति व्यक्ति आय में प्रति वर्ष लगभग 8 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी होनी चाहिए। हाल के वर्षों में चीन को छोड़कर कुछ देशों ने यह वृद्धि निरंतर हासिल की है।

वर्ष 2021 में भारत का स्कोर 0.633 था और 0.8 के उच्च मानव विकास की सीमा तक पहुंचने के लिए प्रति वर्ष लगभग 0.9 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि की आवश्यकता होगी। वर्ष 1990 और 2021 के बीच में भारत की वृद्धि लगभग 1.25 प्रतिशत सालाना थी।याद रखे कि जैसे-जैसे आप इस पैमाने पर ऊपर जाते हैं, यह और अधिक कठिन हो जाता है क्योंकि जीवन प्रत्याशा और स्कूली शिक्षा ऊपरी सीमा के स्तर पर पहुंच जाती है और बेहतर अंक हासिल करने के लिए आमदनी वृद्धि में भी अच्छी वृद्धि लाजिमी होगी।

भारत का मानव विकास सूचकांक वर्ष 2010-21 से केवल 0.88 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ा। इसलिए, बहुत उच्च मानव विकास श्रेणी की सीमा तक पहुंचने के लिए हमें अगले 25 वर्षों के लिए इस दर को बनाए रखने की आवश्यकता होगी हालांकि ऐसा करना इतना आसान नहीं है।
भारत का स्कोर मानव विकास सूचकांक 2018 में 0.647 से गिरकर 2021 में 0.633 हो गया। कोरोना दुष्काल के कारण आमदनी को नुकसान पहुंचा, लेकिन स्कूली शिक्षा और जीवन प्रत्याशा भी प्रभावित हुई क्योंकि लाखों की मौत हो गई।

तुलनात्मक रूप से,  कोरोना दुष्काल के बावजूद बांग्लादेश और थाईलैंड के मानव विकास सूचकांक स्कोर में वृद्धि हुई। भारत को इसलिए भी अधिक नुकसान हुआ कि विकास के अपने स्तर पर, इसके हिस्से में 77 प्रतिशत अस्थायी रोजगार का असंतुलित अनुपात में एक बड़ा हिस्सा है।बांग्लादेश में यह 55 प्रतिशत है जहां मोटे तौर पर भारत की हिस्सेदारी होनी चाहिए। ऐसे में यह वित्तीय संकट या दुष्काल के झटकों के लिए अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। वर्ष 2022 में 23.2 प्रतिशत पर युवा बेरोजगारी भी बहुत अधिक है, यह दर अब भी कम नहीं हुई है । महिला श्रम बल की भागीदारी बहुत कम है और यह लगातार घट रही है। भारत को अपनी कामकाजी आबादी का उपयोग अब तक की तुलना में बेहतर तरीके से करना चाहिए। बढ़ती असमानता ने भी नुकसान पहुंचाया है।

अनुमान है कि असमानता के कारण भारत के मानव विकास सूचकांक स्कोर में 24 प्रतिशत की गिरावट है। असमानता को आधा करने से भारत का मानव विकास सूचकांक स्कोर 0.7 से ऊपर बढ़ जाएगा और भारत को उच्च  मानव विकास सूचकांक श्रेणी में वर्गीकृत किया जाएगा। ‘विकसित बनने के लिए हमें न केवल अधिक ‘समृद्ध भारत’ आवश्यकता है, बल्कि एक और ‘समावेशी भारत’ बनाने की भी आवश्यकता है।

भारत, अब एक निम्न मध्यम आय वाला देश है जिसे सबसे पहले उच्च मध्यम आमदनी वाली स्थिति तक पहुंचने के प्रयास करने चाहिए जिसके लिए वर्ष 2022 की कीमतों के लिहाज से प्रति व्यक्ति 4,255 डॉलर आय की आवश्यकता होती है। यदि भारत, प्रति व्यक्ति आय में 7 प्रतिशत सालाना दर से वृद्धि करता है तब यह 2032 तक उच्च आमदनी वाली स्थिति में पहुंच जाएगा। यह 2022 की कीमतों के आधार पर 6-7 लाख करोड़ रुपये वाली अर्थव्यवस्था होगी जो आसानी से तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकती है लेकिन अब भी यह एक विकसित अर्थव्यवस्था की स्थिति से बहुत दूर है।