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चिंतित कांग्रेस का चिंतन, मंथन नहीं करना होगा परिवर्तन

सार

​​​​​​​सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अपने पतन से चिंतित होकर चिंतन कर रही है| इस अमृत मंथन से विष दंत तोड़कर पार्टी को सत्ता का अमृत पान कराने की कोशिश मानी जा रही है| ये कितनी सफल होगी यह तो वक्त ही बताएगा| नीति, नेतृत्व और बुजुर्ग चेहरे को बदले बिना, केवल चिंतन मनन से पार्टी की पहचान की वापसी कैसे संभव होगी? 

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विस्तार

सबसे पहले यह समझना होगा कि पार्टी की मुख्य समस्याएं क्या हैं जो उसे लगातार नीचे की ओर ले जा रही हैं| भाजपा ने विशेषकर नरेंद्र मोदी ने  राजनीति में वंशवाद के खतरे को एक मुद्दे के रूप में स्थापित कर दिया है| कांग्रेस आज देश में वंशवाद का प्रतीक बनी हुई है| वंशवाद के कारण ही कांग्रेस के नेतृत्व का संकट बना हुआ है| सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बीच कांग्रेस अध्यक्ष का पद पिछले कई वर्षों से झूल रहा है| वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति के आरोपों से कांग्रेस कैसे मुकाबला करेगी| इसके लिए तो कांग्रेस को वंशवाद से बाहर आना होगा| नया नेतृत्व गांधी परिवार के बाहर से देना होगा| गांधी परिवार को पार्टी का नेतृत्व किसी और को सौंपने में कोई कठिनाई नहीं है लेकिन सबसे बड़ी समस्या है कि उन्हें कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं दिख रहा है जो कांग्रेस को एकजुट रख सके| गांधी परिवार के नाम  पर भी आज कांग्रेस बटी हुई है| असंतुष्ट नेताओं का जी23 ग्रुप विधिवत अपना काम कर रहा है| गांधी परिवार ही कांग्रेस को एकजुट नहीं रख पा रहा है, तो दूसरा नेतृत्व कैसे नेताओं को एक रख सकेगा? यह बड़ा सवाल है कि पार्टी का नेतृत्व गांधी परिवार के पास होगा या बाहर के किसी नेता को मिलेगा, इसका पार्टी पर क्या असर होगा?

कांग्रेस को जिस दूसरे मुद्दे पर तत्काल चिंतन मनन करके निर्णय और काम करने की जरूरत है, वह पार्टी को समय के अनुरूप बदलने का है| ज्यादातर बुजुर्ग चेहरे आज कमान संभाले हुए हैं| युवा नेतृत्व निराशा में है| ऐसी स्थिति तब और खतरनाक है जब कांग्रेस की प्रतिद्वंदी पार्टी बीजेपी युवा नेतृत्व को मौका देती रही है| कांग्रेसी युवा नेतृत्व के पार्टी से बाहर जाने का कारण शायद यही रहा कि बुजुर्ग नेताओं ने युवाओं की संभावनाओं को समाप्त करने का प्रयास किया| बिना युवाओं को आगे लाये कांग्रेस का पुनरुद्धार संभव नहीं लगता| पार्टी को नई सोच, नई उमंग, नए कामकाज के तरीकों की “नई ऊर्जा” की जरूरत है| बुजुर्ग नेता पार्टी को वह नयापन नहीं दे सकते| 

गांधी परिवार के लिए यह चुनौती भरा अवसर है जब बुजुर्ग नेताओं को संभालते हुए युवा नेताओं को आगे आने का मौका दिया जाए| अभी तक कांग्रेस नेतृत्व इस मामले में असफल होता रहा है| मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, उत्तर प्रदेश में जितिन प्रसाद, आसाम में हेमंत विस्वा सरमा  कांग्रेस के युवा नेता के रूप में पॉपुलर थे| लेकिन उनको पार्टी छोड़कर बीजेपी में क्यों जाना पड़ा?

इस पर कांग्रेस नेतृत्व को न केवल मंथन करना पड़ेगा, बल्कि उन कारणों को सख्ती के साथ रोकना होगा जिसके कारण युवा नेतृत्व निराश हो रहा है|

राजस्थान जहां चिंतन शिविर हो रहा है, वहां सचिन पायलट और अशोक गहलोत के राजनीतिक संघर्ष से पार्टी को नुकसान स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है| लोगों को ऐसा लगता है कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनने का हक बनता था, लेकिन बुजुर्ग नेताओं ने षडयंत्र पूर्वक अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनवा दिया| सचिन पायलट भले ही पार्टी से बाहर नहीं गए हों लेकिन उनका जोश तो कम ही हुआ है| कांग्रेस को यह तय करना होगा कि 70 वर्ष के ऊपर के किसी भी नेता को ना सरकारों में और ना पार्टी में कोई पद दिए जाएंगे| पार्टी ने उनको बहुत कुछ दिया है| अब इन बुजुर्ग नेताओं को पार्टी का कर्ज चुकाने का समय है| उन्हें मार्गदर्शक की भूमिका में युवाओं को राजनीति आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए| मध्यप्रदेश में  युवाओं ने महंगाई के खिलाफ शंखनाद आंदोलन किया| आंदोलन में 75 साल के कमलनाथ और बाकी नेताओं ने युवाओं में जोश भरने का काम किया| युवाओं को कमजोर करने का जो काम कर रहे हैं वही उनमें जोश भरने का दिखावा कर रहे हैं| इससे क्या लाभ होने वाला है?

कांग्रेस की यह भी बड़ी समस्या है कि समय के साथ पार्टी ने अपनी नीतियों, सिद्धांतों, विचारधारा को नया स्वरूप नहीं दिया| नेताओं के दागी चाल, चरित्र और चेहरे से भी पार्टी को नुकसान होता रहा है| देश के मुद्दों पर कांग्रेस की नीतियां हमेशा अस्पष्ट रही| मुस्लिमों के तुष्टीकरण के कारण कांग्रेस आज बहुसंख्यक समाज से कट गई है| आज कांग्रेस पर यह टिप्पणी आम आदमी भी करता है कि यह तो मुस्लिमों को हर मुद्दे पर समर्थन करने के लिए जानी जाती है| जब भी कहीं सांप्रदायिक दंगों की स्थिति आती है, कांग्रेस मुस्लिमों के पक्ष में खड़ी होती दिखाई पड़ती है| राजस्थान में कई स्थानों पर सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं| राजस्थान की सरकार इन सभी घटनाओं में मुस्लिम समाज के पक्ष में देखी गई है| इस प्रकार की प्रवृत्ति के कारण एक बड़े समाज में कांग्रेस का विश्वास खत्म हो रहा है| यह परिस्थितियां राजस्थान में कांग्रेस को अगले चुनाव में भारी पड़ सकती हैं| तुष्टीकरण के आरोपों से कांग्रेस को बाहर निकला होगा| 

जनता के मुद्दे, महंगाई, बेरोजगारी, बुनियादी सुविधाओं पर कांग्रेस को ईमानदार राजनीति करना होगा| वैसे कांग्रेस के सामने धर्म संकट यह है कि देश की सभी समस्याओं के पीछे कहीं ना कहीं उनकी सरकारों की भूमिका रही है| आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस ने केंद्र और राज्यों में शासन किया है| इसके कारण आज व्याप्त समस्याओं को पैदा करने  या बढ़ाने में कांग्रेस की भूमिका देखी जाती है|

आज देश की राजनीति का मुद्दा बदल गया है| बहुसंख्यक समाज के मुद्दे प्रमुखता के साथ उठाए जा रहे हैं| कांग्रेस पार्टी के प्रति बहुसंख्यकों  में विश्वास कम हो रहा है| इसके बाद भी कांग्रेस तुष्टीकरण की राजनीति क्यों नहीं छोड़ना चाहती?

कांग्रेस नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच कनेक्ट बहुत कम हो गया है| एक बार कोई नेता कांग्रेस में प्रभावी भूमिका में आ जाए, सत्ता आने पर सरकार में भागीदारी का अवसर मिल जाए तो फिर उसकी समृद्धि इतनी तेजी से बढ़ती है कि इतनी तेजी से वृद्धि किसी भी व्यवसाय में नहीं होती| ऐसा नहीं है कि सब छिपा रहता है यह सब जनता की नजरों में दिखता रहता है| इसके कारण नेताओं और कार्यकर्ताओं का विश्वास जनता से घटता जाता है| पार्टी इस पर कैसे नियंत्रण करेगी? यह भी सोचना पड़ेगा| कांग्रेस नेताओं की बात पर लोग भरोसा करें यह फिर से स्थापित करने की जरूरत है|

कांग्रेस पार्टी की सरकारों की गवर्नेंस भी तुष्टिकरण का साफ संकेत देती हैं| जनता से किये वायदों  को पूरा नहीं किया जाता| किसानों की ऋण माफी के मामले में मध्यप्रदेश में यह देखा गया है| कांग्रेस सब कुछ गलत कर रही है ऐसा भी नहीं है| लेकिन कांग्रेसी लंबे समय तक सरकारों में रहे हैं इसलिए उन्हें अपने कामकाज को बताने के लिए कुछ कहने की जरूरत नहीं है| लोगों ने कांग्रेसी नेताओं, उनकी सरकारों के कामकाज के तरीकों को लंबे समय तक अनुभव किया है, भुगता और झेला है| अब अगर यह पार्टी कुछ नया करने की बात करती है और यह बात उन्हीं चेहरों के मुंह से सामने आती है जिन्होंने पहले सरकारें चलाई है तो फिर तो पब्लिक बिल्कुल भी उस पर विश्वास नहीं करती| इसलिए पार्टी को न्यू लीडरशिप को आगे बढ़ाना ही पड़ेगा|

ऐसा कहा जा रहा है कि उदयपुर के चिंतन शिविर में कांग्रेस पार्टी एक परिवार, एक  टिकट पर कोई फैसला करने वाली है| देखिए फैसला किस प्रकार का होता है और उसे लागू कैसे किया जाता है?

कांग्रेस के पुराने चेहरों के साथ एक समस्या यह भी है कि उनके साथ भ्रष्टाचार के दाग जुड़े हुए हैं| उनके मुंह से कही गई कोई भी बात पुराने भ्रष्टाचारों की याद दिलाती है| कांग्रेस संकट के दौर से गुजर रही है| कांग्रेस का पुनरुद्धार लोकतंत्र के लिए जरूरी है| किसी भी एक दल का लगातार प्रभुत्व लोकतंत्र के हित में नहीं होता| 

अपनी नीतियों को भी कांग्रेस को स्पष्टता के साथ रखना होगा| देश हित में जो है उस पर बात करना पड़ेगा| किसी भी समुदाय के तुष्टिकरण का नजरिया छोड़ना होगा| चिंतित कांग्रेस चिंतन मनन में लगी हुई है| गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव के साथ विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया प्रारंभ होगी| इसके बाद मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव होंगे| फिर लोकसभा चुनाव  होगा| 

कांग्रेस को पहले अपना नया स्वरूप, नया नेतृत्व और युवा नेतृत्व खड़ा करना होगा| चुनाव में जीत मिले या हार कांग्रेस अगर स्वच्छ और ईमानदार राजनीति की तरफ बढना चाहती है तो उसकी सफलता में कोई संशय नहीं लगता| सवाल केवल देशहित और ईमानदारी पर प्रतिबद्धता का है| 

राजनीति में आप का उभार कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।