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काले धन वाले सौदे रोकने की क़वायद ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Thu , 29 May

सार

अधिसूचना में यह स्पष्ट किया गया है कि नियमित सेवाओं मसलन लेखाकारों का पंजीयन अथवा वित्तीय सलाह देने का शुल्क आदि को के धन शोधन निरोधक 2002 के अंतर्गत दायरे में नहीं लाया जाएगा..!

janmat

विस्तार

अब देश में अचल संपत्ति की खरीद-बिक्री, क्लाइंट के पैसे का प्रबंधन, प्रतिभूतियों एवं अन्य परिसंपत्तियों, बैंक, बचत और प्रतिभूति खातों का प्रबंधन, कंपनियों के निर्माण, परिचालन और प्रबंधन के लिए योगदान की व्यवस्था और सीमित दायित्व वाली साझेदारियों या न्यासों का प्रबंधन अथवा कारोबारी संस्थाओं की खरीद या बिक्री अब धन शोधन निरोधक अधिनियम 2002 के अधीन आ गए हैं। सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके सभी सक्रिय सनदी लेखाकारों कंपनी सेक्रेटरीज और कॉस्ट ऐंड वर्क्स अकाउंटेंट्स को अपने क्लाइंट के लिए किए जाने वाले इन चुनिंदा कामों के लिए धन शोधन निरोधक अधिनियम 2002 के अधीन ले आई है। सरकार इसे काले धन से संबंधित लेनदेन की रोकथाम के लिए एक व्यावहारिक कदम मान रही है। नतीजे प्रतीक्षित हैं।

गत सप्ताह जारी हुई इस अधिसूचना के तहत अब अचल संपत्ति की खरीद-बिक्री, क्लाइंट के पैसे का प्रबंधन, प्रतिभूतियों एवं अन्य परिसंपत्तियों, बैंक, बचत और प्रतिभूति खातों का प्रबंधन, कंपनियों के निर्माण, परिचालन और प्रबंधन के लिए योगदान की व्यवस्था और सीमित दायित्व वाली साझेदारियों या न्यासों का प्रबंधन अथवा कारोबारी संस्थाओं की खरीद या बिक्री जैसे कार्य शामिल हैं।

सनदी लेखाकारों, कंपनी सेक्रेटरीज और कॉस्ट ऐंड अकाउंटेंट्स वर्क्स से कहा गया है कि वे ऐसे लेनदेन के मामलों की जानकारी धन शोधन निरोधक अधिनियम 2002के अंतर्गत  प्राधिकारियों को दें और वे जिन क्लाइंट के लिए इस प्रकार के लेनदेन करेंगे उनके लिए “अपने क्लाइंट को जाने”  के मानकों को भी पूरा करें। इसका अर्थ यह होगा कि अब सनदी लेखाकारों, कंपनी सेक्रेटरीज और कॉस्ट ऐंड वर्क्स अकाउंटेंट्स ऐसे लेनदेन के लिए धन शोधन निरोधक अधिनियम 2002के अंतर्गत   बराबर जिम्मेदार होंगे। अधिसूचना में यह स्पष्ट किया गया है कि नियमित सेवाओं मसलन लेखाकारों का पंजीयन अथवा वित्तीय सलाह देने का शुल्क आदि को के धन शोधन निरोधक 2002 के अंतर्गत   दायरे में नहीं लाया जाएगा।

इस बदलाव की तात्कालिक जरूरत फाइनैंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स के इस वर्ष नवंबर में होने वाले आकलन की वजह से हुई है । फाइनैंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स सन 1989 में स्थापित निगरानी संस्था है जो वैश्विक स्तर पर धन शोधन तथा आतंकी गतिविधियों की फाइनैंसिंग पर नजर रखती है। भारत 2010 में फाइनैंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स के आकलन में शामिल हुआ और पिछली बार महामारी के कारण इसे टाल दिया गया था ।

स्मरण रहे अनुपालन की इस कवायद के अधीन ही सरकार ने मार्च में धन शोधन के नियमों में संशोधन करके बैंकों, वित्तीय संस्थानों के लिए यह जरूरी कर दिया था कि वे गैर लाभकारी संस्थानों और गैर सरकारी संस्थानों तथा राजनीतिक रसूख़ वाले लोगों के वित्तीय लेनदेन का हिसाब रखे। राजनीतिक रसूख़ वाले लोगों में वे लोग शामिल हैं जिन्हें किसी विदेशी राष्ट्र, राज्याध्यक्षों या सरकार ने काम पर रखा हो, वरिष्ठ राजनेताओं, वरिष्ठ सरकारी या न्यायिक या सैन्य अधिकारियों, सरकारी उपक्रमों के वरिष्ठ कार्यकारियों तथा राजनीतिक दलों के महत्त्वपूर्ण अधिकारी भी इनमें शामिल हैं।

अनुमान के मुताबिक ही अंकेक्षण समुदाय ने इस अधिसूचना में उल्लिखित शर्तों को लेकर आशंकाएं प्रकट की हैं। उन्होंने उचित ही यह प्रश्न किया है कि अधिवक्ताओं और विधिक पेशेवरों को इस नए प्रावधान के दायरे से बाहर रखा गया है।

सरकार ने इसकी वजह स्पष्ट करते हुए कहा कि हालांकि अधिवक्ता अपने क्लाइंट के लिए ऐसे वित्तीय लेनदेन करते हैं, लेकिन उन्हें ऐसी सेवाओं के लिए पैसे लेने की मनाही है क्योंकि अधिवक्ता अधिनियम उन्हें एजेंट के रूप में काम करने से रोकता है। वहीं दूसरी ओर पेशेवर लेखाकार ऐसी सेवाएं देते हैं क्योंकि उन पर ऐसा कोई कानून लागू नहीं होता। यह अंतर बेमानी सा है।

अगर यह मान लिया जाए कि सनदी लेखाकारों, कंपनी सेक्रेटरीज और कॉस्ट ऐंड अकाउंटेंट्स वर्क्स को क्लाइंट के लेनदेन का जवाबदेह बनाने की वजह धोखाधड़ी वाले व्यवहार का पता लगाना और धन शोधन की जानकारी सामने लाना है तो यह समझ पाना मुश्किल है कि अधिवक्ताओं और विधिक् पेशेवरों को इससे बाहर क्यों रखा जाना चाहिए?

तार्किक रूप से देखें तो किसी लेनदेन के लिए शुल्क लेने अथवा न लेने से लेनदेन की प्रकृति निर्धारित नहीं होती। अगर ताजा अधिसूचना का अर्थ वैश्विक टास्क फोर्स का अनुपालन है तो भी काले धन वाले सौदे रोकने में इसकी उपयोगिता को इस प्रकार की अन्य संस्थाओं को बाहर रखकर शिथिल नहीं किया जाना चाहिए जो स्वयं ऐसी ही भूमिका निभाते हैं।