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चुनाव 2024: ये तैरते मुद्दे

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 20 Jul

सार

प्रधानमंत्री मोदी अमृत काल की बात कर रहे हैं जिसे बीते वर्षों के गरीबी हटाओ के नारे का समकक्ष माना जा सकता है..!!

janmat

विस्तार

देश का राजनीतिक परिद्र्श्य 1971 की याद दिला रहा है। इस समय मौजूदा विपक्षी दल मोदी हटाओ कहते हुए एकजुट हुए हैं, तब ऐसे ही विपक्ष ‘इंदिरा हटाओ’ नारा लेकर एकजुट हुआ था। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमृत काल की बात कर रहे हैं जिसे बीते वर्षों के गरीबी हटाओ के नारे का समकक्ष माना जा सकता है।

वैसे, अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी और अब तक नए जमावड़े ‘इंडिया’ ने कुछ बुनियादी व्यवस्थाओं को एकजुट करने पर ही ध्यान केंद्रित किया है। अगले कदम में इस जमावड़े को यह यक़ीन दिलाना होगा कि (1) मतदाताओं को उनके मोदी को हटाने की बात पर क्यों यकीन करना चाहिए (2) आखिर यही गठबंधन क्यों एक बेहतर विकल्प है?

फ़िलहाल ऐसा लगता है कि इंडिया की योजना 2019 के कांग्रेस के प्रचार अभियान को दोहराने की नहीं है। उस वक्त राहुल गांधी ने व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के आरोपों पर ध्यान केंद्रित किया था, लेकिन उससे कोई लाभ नहीं हुआ। अभी तो कांग्रेस वैसे नकारात्मक वोट की उम्मीद भी नहीं कर सकती जैसे आपातकाल के बाद या कुछ हद तक 2014 में देखने को मिले थे प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता बहुत ऊंचे स्तर पर आंकी जा रही है।

वैसे, कई लोग मोदी की कड़ी आलोचना करते हैं क्योंकि उन्होंने संस्थानों को कमजोर करने का काम किया है जबकि उनकी बदौलत कार्यपालिका अधिक जवाबदेह हो सकती थी। इस आधार पर मतदान करने वालों की तादाद अपेक्षाकृत कम रहेगी और वे यह भी देख ही सकते हैं कि कई विपक्षी दल भी सत्ता में रहते हुए अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं। अगर विपक्ष जीत की उम्मीद कर रहा है तो नए गठजोड़ को केवल सरकार की आलोचना से आगे बढ़कर एक बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना होगा।

वैसे, अभी विपक्ष के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो मोदी के मुकाबले खड़ा दिख सके,यही एक बड़ा कारण है जिसके चलते भाजपा का विधानसभा चुनावों की तुलना में लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन दिखा है। अभी विपक्ष के पास चुनाव लड़ने के लिए सीमित संसाधन हैं और उसका प्रचार अभियान भी सत्ताधारी दल की तुलना में कम संगठित रहेगा। भारत में यदि अगर जनता का मिजाज प्रतिकूल हो तो धन बल भी खास मददगार नहीं होता। जनता का मूड खिलाफ क्यों होगा?इसके दो कारण है (1) मुद्रास्फीति और (2)बेरोजगारी।

इन दोनों को बेअसर करने के लिए मोदी भारतीय जनता पार्टी के मूल एजेंडे के आधार पर आगे बढ़ेंगे। जैसे - अयोध्या में मंदिर का निर्माण, जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करना और अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण समाप्त करना। वह भारत का वैश्विक कद मजबूत करने और इससे राष्ट्रीय गौरव उत्पन्न होने के बारे में तथ्यों और अतिरंजना को मिलाकर एक कथानक भी पेश कर सकते हैं।

वैसे, नागरिक आजादी के बारे में उनकी सरकार के प्रदर्शन की विदेशों में आलोचना ही हुई है। एक पल के लिए चीन को भुला दिया जाए तो वह राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में भी आक्रामक ढंग से बात कर सकते हैं और भारत के दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ने का भी।

डिजिटलीकरण की विभिन्न पहलुओं, कल्याण योजनाओं, और विकास के उदाहरणों के साथ भी सामने आ सकते हैं: मसलन अधोसंरचना निर्माण और तेज गति से चलने वाली ट्रेनों की शुरुआत आदि। नोटबंदी और कोविड लॉकडाउन की यादों के धुंधला पड़ने के साथ कई मतदाता शायद इन बातों की वजह से तीसरी बार मोदी को अवसर देना चाहें।

वैसे, अभी शुरुआत है और आने वाले दिनों में विपक्षी गठबंधन इस बारे में विस्तृत योजना पेश कर सकता है कि वह जीतकर क्या कुछ करेगा। वह कई नि:शुल्क चीजों की घोषणा कर सकता है जैसा कांग्रेस ने हाल में कर्नाटक में किया। आम आदमी पार्टी भी ऐसा करती रही है। नया गठबंधन 2004 में वाजपेयी सरकार के खिलाफ अपनाए गए तरीके को दोहरा सकता है जहां उसने तेज विकास के बीच पीछे छूट गए लोगों पर ध्यान केंद्रित किया था।