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रोजगार : आंकड़ों और हकीकत में भारी अंतर

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 01 Oct

सार

भारत में न्यूनतम वेतन 2006 के 4,398 रुपए से बढ़ कर 2021 में 17,017 रुपए प्रतिमाह हो गया, यह सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का आंकड़ा है. जब इसमें मुद्रास्फीति आंकी गई तो वास्तविक वेतन वृद्धि 2006 के 9.3 प्रतिशत से गिरकर 2021 में–0.2 प्रतिशत पर आ गई..!

janmat

विस्तार

० प्रतिदिन विचार-राकेश दुबे

26/12/2022

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन अर्थात आइएलओ ने दो रिपोर्टें जारी की हैं, जिनमें कोविड  दुष्काल के बाद वैश्विक रोजगार की स्थितियों के बारे में चर्चा की गई है। दरअसल, कोविड दुष्काल  के चलते बहुत सारे लोगों का रोजगार छिन गया और परिस्थितियां काफी खराब होती चली  गईं। दुष्काल का प्रभाव कम होने के बाद कुछ लोग तो वापस रोजगार से जुड़ गए, मगर अब भी बहुत सारे लोगों को उनका खोया रोजगार नहीं मिल पाया है।भारत की बात करें, सरकारी पक्ष और आंकड़ों में बेहद अंतर है|

भारत में न्यूनतम वेतन 2006 के 4,398 रुपए से बढ़ कर 2021 में 17,017 रुपए प्रतिमाह हो गया। यह सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का आंकड़ा है। जब इसमें मुद्रास्फीति आंकी गई तो वास्तविक वेतन वृद्धि 2006 के 9.3 प्रतिशत से गिरकर 2021 में–0.2 प्रतिशत पर आ गई। इस तरह वेतन और महंगाई में बढ़ोतरी का औसत निकाला गया तो पता चला कि वास्तव में उसकी आय कम हो गई है।

आइएलओ की वैश्विक रिपोर्ट, ‘ग्लोबल वेज रिपोर्ट 2022-23 : वेतन और क्रयशक्ति पर मुद्रास्फीति और कोविड-19 का प्रभाव’ के अनुसार, 2022 की पहली छमाही में वास्तविक रूप से मासिक वेतन में 0.9 प्रतिशत  की गिरावट आई है। यह इस बात का संकेत है कि इक्कीसवीं सदी में पहली बार वास्तविक मजदूरी वृद्धि नकारात्मक स्तर तक गिर गई है, क्योंकि वास्तविक उत्पादकता वृद्धि और वास्तविक वेतन वृद्धि के बीच असमानता बढ़ रही है।

रिपोर्ट में जुड़वां संकट की बात की गई है, जिसमें मुद्रास्फीति और आर्थिक मंदी की स्थितियां शामिल हैं। हकीकत में, महामारी के कारण वैश्विक स्तर पर चल रही आर्थिक गतिविधियां धीमी होती चली गर्इं। दूसरी तरफ महंगाई बढ़ती रही, क्योंकि मांग और आपूर्ति का नियम टूटते ही महंगाई बढ़ जाती है। परिणाम स्वरूप दुनिया भर में वास्तविक मासिक वेतन में आश्चर्यजनक रूप से गिरावट देखने को मिली।

 अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की दूसरी रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया महाद्वीप क्षेत्र में 2022 में लगभग 2.2 करोड़ नौकरियों का नुकसान हुआ है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर सबसे कम वेतन पाने वालों की क्रय शक्ति को बनाए नहीं रखा जाता है, तो आय, असमानता और गरीबी में और बढ़ोतरी होगी।अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन श्रम और रोजगार से संबंधित आंकड़े एकत्रित करता और उनसे जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए उपाय सुझाता है, वर्तमान में इसके 187 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल है।

वेतन पर आइएलओ की यह रिपोर्ट बताती हैं कि कर्मचारियों के वास्तविक और न्यूनतम वेतन में काफी अंतर बना हुआ है। दरअसल, न्यूनतम वेतन वह सामान्य वेतन होता है, जो किसी कर्मचारी को उसके नियोक्ता द्वारा मासिक या वार्षिक स्तर पर गणना करके प्रदान किया जाता है। न्यूनतम वेतन में अगर किसी भी स्तर पर वृद्धि होती है तो उसमें महंगाई को समायोजित नहीं किया जाता।

रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई में होने वाली वृद्धि के हिसाब से ही वेतन में वृद्धि की जानी चाहिए, क्योंकि अगर महंगाई के हिसाब से व्यक्ति के वेतन में बढ़ोतरी नहीं होगी, तो वास्तव में उसके वेतन में गिरावट ही आएगी। मसलन, अगर वेतन में वृद्धि केवल एक फीसद हुई हो और महंगाई दस फीसद बढ़ गई हो, तो हम देखते हैं कि उसकी वेतन वृद्धि नकारात्मक ही रहती है। इसलिए जरूरी है कि महंगाई में जितने फीसद की बढ़ोतरी हुई हो, उसकी गणना करके उसके हिसाब से वेतन में वृद्धि की जानी चाहिए।

आइएलओ कहना है कि हमें कम आय वाले लोगों पर ज्यादा ध्यान देना होगा, ताकि हम उनको मिलने वाली आय को इस तरह से समायोजित करें, जिससे महंगाई का दबाव उनके ऊपर न बढ़े। बढ़ती असमानता चिंताजनक है और एशिया प्रशांत स्तर पर केवल उच्च कौशल वाले व्यवसाय कोविड दुष्काल से उबर पाए हैं। 2019 से 2021 तक उच्च कुशल श्रमिकों के बीच लगभग 1.6 प्रतिशत की रोजगार वृद्धि भी देखी गई है, लेकिन यह वृद्धि निम्न और मध्यम कौशल वाले श्रमिकों के बीच नहीं दिखी।जो महिलाएं कोविड दुष्काल के चलते किसी रोजगार से बाहर हो गई, उनके लिए फिर से उस रोजगार से जुड़ना कठिन हो गया। इसके अलावा छोटे व्यवसायियों का व्यवसाय एक बार बंद हो जाने पर, उनकी आय भी बंद हो गई और फिर उस व्यवसाय को शुरू करना उनके लिए बहुत कठिन हो गया । ऐसे में बहुत से छोटे व्यवसायी अपना व्यवसाय खो चुके हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, जी-20 देशों में शामिल विकसित और विकासशील देशों के बीच वास्तविक मजदूरी के औसत स्तर में भी महत्त्वपूर्ण अंतर है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में जहां लगभग चार हजार डालर प्रतिमाह प्राप्त होता है, वहीं उभरती अर्थव्यवस्थाओं- जिसमें भारत भी शामिल है- में लगभग अठारह सौ डालर प्रतिमाह मिलता है। इस अध्ययन में यह भी पता चला है कि कोविड दुष्काल  के दौरान साढ़े सात से साढ़े नौ करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में चले गए हैं।

इसका समाधान भी सुझाया गया है कि नीतिगत विकल्प चुने जाने चाहिए और भविष्य में विवेकपूर्ण न्यूनतम वेतन समायोजन पर ध्यान देना चाहिए, ताकि लोग कम से कम इतना वेतन प्राप्त कर सकें कि वे गरीबी और असमानता वाली स्थितियों से बच सकें। कम आय वाले परिवारों के जीवन स्तर की सुरक्षा करना बहुत जरूरी है। श्रम बाजार संगठनों और वेतन नीतियों को मजबूत करना होगा। हमें ऐसे रोजगारों का निर्माण करना होगा, जहां वेतन की स्थितियां बेहतर हों और औपचारिक रूप से लोगों को रोजगार मिल सके।