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सबसे पहले भारतीय बने, फिर कुछ औरआ

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 16 Jun

सार

हर राष्ट्र का एक प्रभावी नैरेटिव होता है और नायक इसी का प्रतिनिधित्व करता हुआ होना चाहिए है।७५ वर्ष बाद हमारा उद्देश्य यही होना था |

janmat

विस्तार

देश के पूर्व उप राष्ट्रपति की आशंका को निर्मूल साबित करने के लिए भाजपा का प्रचार तंत्र सक्रिय है , आज इस बात की कोई संभावना भी नहीं दिखती है कि कोई समूचे भारत का सर्वमान्य नायक बन सकें। वास्तव में जिन परिस्थितियों में हमारे देश को एक विभाजित आजादी मिली थी, उसमें स्वाभाविक ही था कि साझे नायकों की संभावना और कम हो और अब यह शून्यवत होती जा रही है । प्रत्येक राष्ट्र अपने लिए नैरेटिव गढ़ता है और इस प्रक्रिया में एक समान शिक्षा, सोच और व्यवहार बड़े काम का होता हैं। स्वतंत्र भारत में नैरेटिव गढ़ने की विचित्र गाथा है।जब आजादी मिली थी तो इस अवधारणा के साथ कि दो अलग राष्ट्र हैं और वे साथ नहीं रह सकते। इस धारणा को लेकर हम जब तब आमने- सामने हो जाते हैं और भूल जाते हैं कि हम पहले भारतीय हैं फिर कुछ और |

जब हमारे पड़ोस में एक इस्लामी गणराज्य कायम हो रहा था , हमारे समझदार व प्रगतिशील नेतृत्व ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को मानने से इनकार कर दिया और भारत को एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बनाया। एक रंजित बंटवारे की पृष्ठभूमि में तब यह नैरेटिव बनाना कि “हम” सह-अस्तित्व में लम्बे समय से रह रहे हैं और रचनात्मक उत्कृष्टता का लम्बा इतिहास है, कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। ऐसे समय में एक नायक के रूप में गांधी जी काम आए। आजादी के फौरन बाद की पाठ्य-पुस्तकों ने इसमें हमारी मदद की। गांधी के ईद-गिर्द शांति, अहिंसा, धार्मिक सद्भाव और सहिष्णुता के ताने-बाने बुने गए, उनके अपने जीवन के प्रसंगों में ही सारे सूत्र उपलब्ध थे, और इस तरह से वह सब हुआ, जो किसी भी राष्ट्र के निर्माण की जरूरी शर्त हो सकता था।

हर राष्ट्र का एक प्रभावी नैरेटिव होता है और नायक इसी का प्रतिनिधित्व करता हुआ होना चाहिए है।७५ वर्ष बाद हमारा उद्देश्य यही होना था | वैविध्य से भरी भारत भूमि में अहिंसा और सद्भाव में गुंथे मूल्य-बोध ही एक मजबूत राष्ट्र-राज्य बना सकते हैं। अलग-अलग खान-पान, कपड़े-लत्तों, भाषा-बोली या रीति-रिवाज वाले समाज को आधुनिक अर्थों में एक राष्ट्र-राज्य में बदलना न तब और न अब किसी चमत्कार से कम नहीं |आज तक जो भी संभव हुआ, वो सिर्फ एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के चलते ही तो हुआ । किसी समाज ने मांग नहीं की कि यह स्थान किसी देवी-देवता को मिलना चाहिए।

आज नये पैरोकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पड़ोस में एक कट्टर धर्मांध राष्ट्र बना था और वह कुछ ही वर्षों में ही टूटकर दो टुकड़ों में तब्दील हो गया। आज और अब सवाल यह महत्वपूर्ण और रेखांकित करने वाला है कि क्या हम भी वैसा ही अनुदार और पिछड़ा समाज बनाना चाहते हैं?

हमारे लिये यह आत्ममंथन का भी मौका है। साथ ही यह विचार करने का, क्या देश की विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका उस कसौटी पर खरी उतर पा रही हैं, जिसकी उम्मीद देश के संविधान निर्माताओं ने संविधान को अंतिम रूप देते वक्त की है। यूं तो कोई भी स्तंभ क्षरण की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं है, लेकिन सवाल यहां क्षरण के स्तर का भी है। देश में व्याप्त राजनीतिक विद्रूपताएं समय की सच्चाई है। धनबल का लोकतंत्र में बढ़ता दखल और राजनीति में दागियों की लगातार बढ़ती संख्या हमारी चंद विफलताओं में शीर्ष पर हैं। दल बदल की राजनीति कानून बनने के बाद भी खत्म होने के बजाय बढ़ी है और दल बदल ने अपने तौर-तरीके बदले हैं।

ऐसे में सरकार की विभिन्न आसंदियों पर बरसों मचकने और राजप्रसाद का बरसों सुख भोगने के बाद विषबुझी बातें करना कृतघ्नता का चरम है | वह भी महज इसलिए कि आपका “पर्सनल नेरेटिव” पूरा नहीं हो सका | हम कुछ भी हों, हमारी भाषा- भूषा, उपासना पद्धति कुछ भी हों हम पहले भारतीय है और विश्व हमें इसी तरह समझें इसके प्रयास पूरे प्राणपण से होना चाहिए | सारे मुगालते- अकीदे छोड़िये कुछ और बनने से पहले भारतीय बनिए | आज भातीय बन कर ही दुनिया के उन चौधरियों को जवाब दिया जा सकता है जो खुद अपने हालातों को नजरअंदाज कर भारत के मामले कुछ तो भी बोलते हैं |