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हाथ ना मुठी और फड़फड़ा उठी

आशीष चौबे आशीष चौबे
Updated Mon , 29 Feb

सार

बड़े बड़े पत्रकारों और सियासी पंडितों का आकलन,  तीक्ष्ण दृष्टि और समझ सब, हवाहवाई ही साबित हुये..!!

janmat

विस्तार

अपनी रणनीति और बिखरे समीकरणों को बटोरते हुए भाजपा आखिरकार सत्ता को खिलौना समझ, गपक ही गई। अटकलों, अतिआत्मविश्वास की हवा निकली तो मीडिया की अक्ल का अजीर्ण भी भरभरा कर आम सा हो गया। बड़े बड़े पत्रकारों और सियासी पंडितों का आकलन,  तीक्ष्ण दृष्टि और समझ सब, हवाहवाई ही साबित हुये। कोई शक नही है कि चुनाव से ठीक तीन महीने पहले तक सारे समीकरण कांग्रेस के पाले में खड़े थे। पार्टी भी फूंक फूंक कर सधी रणनीति के साथ आगे बढ़ रही थी लेकिन लाडली बहना, मोशा की संतुलित और ठोस चाल ने सब कुछ पलटना शुरू कर दिया। 

तब तक कांग्रेस के कर्णधारों से लेकर अय्यारों तक में अतिविश्वास इतना घर कर गया कि जमीनी हकीकत को समझना तो छोड़िए..उसको लेकर सुनना भी छोड़ दिया। मीडिया को भी मौका मिल गया। काठ की हांडी को आग पर चढ़ाने का। नेताओं से ज्यादा मीडिया को जो अपने मुफीद लगा उसे ही समझा और वो ही समझाने में जुट गया।  अनुभव के अखंड मुगालते के चलते सिर्फ और सिर्फ घुइयां वाला मसाला पटकते रहे। 

मोदी,बीजेपी से इतनी कोफ़त .. हाय रे, पत्रकार की भूमिका से इतर पार्टी प्रवक्ता से भी ऊंचे हो गए। यदि किसी ने भी  सच बताया तो गोदी मीडिया या फिर कोरी बकवास करार देकर वहीं का वहीं दफन करने कोई कोई संकोच ना दिखा। बिल्कुल ऐसा ना था कि मतदाता एक दम मौन था। 

हां..बदलाव की बात जरूर कहता लेकिन अंत में अपनी बात को इन शब्दों से विराम देता कि..उनसे तो यही ठीक भले। 

नाथ..जीत की आशा में इतने डूबे कि उनके करीबी ही फसल काटने के चक्कर में चूना लगाते गए। मतदाता..जीत, विपक्ष के लिए परोसे बैठे थे। मगर हेकड़ी, अनावश्यक की अटकलों, आधारहीन खबरों,सूचनाओं और बहसों ने उस थाली को सामने से खींच लिया। 

एक बात और स्पष्ट हो गई। मीडिया वक्त के साथ खोखला ही साबित हुआ है। कर्नाटक,हिमाचल,बंगाल,गुजरात और अब छत्तीसगढ़,मप्र ने साबित कर दिया कि.. धेले भर की ना जमीनी पकड़ है और ना ही जानकारी..बस है तो अक्ल का हैजा..।

यही बड़ी वजह है कि आम लोगों का  खबरों और मीडिया पर्सन से भरोसा उठा है। सियासत ने भी आइना दिखाया है। कमलबाबू तो आए दिन टुनका देते थे कि जीत के बाद कैलाश बाबू ने भी..दरबारी मीडिया का झुलझुलू पकड़ा दिया।  इस स्थिति में असल कामकाजी मीडिया का मरण है। व्यवसायिक मीडिया के आगे सारे फर्ज दफन.. खैर..ठसक, हनक अब भी कम न होगी..और हां..अक्ल का अजीर्ण भी..