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हे ! किसान पुत्र, किसानों की मूल समस्या को समझो

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sun , 23 Apr

सार

प्रदेश के किसान किसान पुत्र से यह अपेक्षा तो कर ही सकते हैं | आज का “प्रतिदिन” पढने के बाद एक सवाल उठेगा , क्या किसानी कर रहे हो?

janmat

विस्तार

 
जमीन उस पर खेती, जमीन की खरीद फरोख्त,उसका ऋण पुस्तिका में चढना, खाते का दुरुस्त होना और भू अभिलेख का दुरुस्त होना एक किसान की जिन्दगी के अहम हिस्से हैं , ऐसे में यदि किसान ने किसी तरह का ऋण लिया तो उसकी फजीहत और न लिया हो तो मुसीबत का सामना करने वाला इस प्रदेश में किसान है | ऐसे लाखों किसान तहसील, कलेक्टर कार्यालय और बैंको में दिख जायेंगे, इसके विपरीत सरकार अपने कीर्तिमान बनाने में व्यस्त है | प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने को किसान पुत्र कहते हैं, पर मूलभूत समस्याओं का कोई निदान नहीं है |

कल प्रदेश की सरकार ने ढिंढोरा पीटा कि उसने “२२ माह में एक लाख ७६ हजार करोड़ रुपए किसानों के खाते में डालने का चमत्कार किया है। यह किसानों की सरकार है, किसानों के कल्याण में कोई कसर नहीं । प्रदेश में सिंचाई की योजनाओं का जाल बिछा कर प्रदेश के हर सूखे खेत में फसल लहलहाने के लिए राज्य सरकार निरंतर कार्यरत है। मुख्यमंत्री ने किसानों के खाते में खरीफ २०२० और रबी २०२०-२१ की४९ लाख दावों में ७६१८ करोड़ रुपए की राशि का सिंगल क्लिक से अंतरित की|” अब तो प्रदेश के किसानो को सरकार की जय-जयकार करना चाहिए |सरकार का दावा है कि इस प्रकार पिछले २२ महीनों में एक लाख ६४ हजार ७३७ करोड़ रुपए किसानों के खातों में डाले गए हैं। इसमें यदि कल जारी हुई राशि को जोड़ दिया जाए तो किसानों के खातों में एक लाख ७६ हजार करोड़ रुपए जारी किए गए हैं । सरकार का दावा है कि पूर्व की सरकार ने किसानों का केवल ६००० करोड़ का ऋण माफ किया था। इसमें से भी आधे की जिम्मेदारी बैंकों और सोसाइटी पर डाल दी गई थी, परिणाम स्वरूप किसानों का ऋण माफ ही नहीं हुआ था।

अब सवाल किसानी के इस धंधे और मजबूरी की है| जिसे सुधरने की कोई कोशिश नहीं हुई है | कर्ज माफ़ी राहत हो सकती है पर मुसीबत से निजात नहीं | प्रदेश में पारिवारिक बंटवारे से या जमीन खरीद कर किसानी का जीवन जिया जा सकता है | अब इस जीविका के शुरू होते ही राजा टोडरमल के जमाने से चली आ रही मुसीबतों से सामना करना होता है | आप कैसे भी जमीन के मालिक हो जाये, उसे आपके नाम अंतरित होने में वर्षों आज भी लग रहे हैं, सरकार के विभागों में आपसी तालमेल नहीं है | कहने को प्रदेश में इंच- इंच जमीन का कम्प्यूटरकृत रिकार्ड है पर भू अधिकार पुस्तिका /ऋण पुस्तिका में उसका दर्ज होना टेढ़ी खीर है | कई जिलों के किसान से लेकर कलेक्टर इस कवायद में आज भी चकर-घिन्नी होते रहे हैं | दावा कुछ भी होना यह चाहिए, जमीन का पंजीयन होते ही स्वत: उसका अभिलेख दुरुस्त हो जाना चाहिए पर ऐसा होता नहीं है | पंजीयन विभाग के रिकार्ड की स्वत: राजस्व विभाग में दर्ज होने की कोई व्यवस्था बनी ही नहीं है | रजिस्ट्री हाथ में लेकर तहसील के चक्कर काटते कई किसान देखे जा सकते हैं | अगर बंटवारे में जमीन मिली हैं, तो बटान लिखवाना आसान का नहीं है | इसमें १६ बैंकों से ऋण मुक्ति लिखवाने जैसा भी एक काम अनिवार्य है | बैंक के अपने तौर तरीके हैं |

प्रदेश को ऐसी लम्बी प्रक्रिया से निजात की जरूरत है | नियमों के सरल बनाने और प्रक्रिया को स्वत: चलने लायक बनाने की जरूरत है | प्रदेश के किसान किसान पुत्र से यह अपेक्षा तो कर ही सकते हैं | आज का “प्रतिदिन” पढने के बाद एक सवाल उठेगा , क्या किसानी कर रहे हो? उत्तर कल की जगह आज ही दे दूँ मेरे पास कहीं कोई किसानी नहीं है, पर किसानो के दुःख दर्द रोज सुनता- देखता हूँ | किसान पुत्र कुछ करेंगे,इसी आशा के साथ किसान के दुखद पुराण का एक अंश लिख दिया|