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एमपी को भी आलाकमान का साफ संदेश

सार

कर्नाटक के बाद उछाल पर आई कांग्रेस की सियासत फिर हिचकोले खाने लगी है. यह अप्रत्याशित पैंतरा कांग्रेस ही चल सकती है कि राज्य के मुख्यमंत्री को ही अगले चुनाव में सीएम फेस मानने से मना कर दे. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के राजनीतिक विवाद के समाधान के लिए दिल्ली में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में हुई बैठक का अमृत यही निकला है कि राजस्थान में अगले चुनाव में कांग्रेस का कोई सीएम फेस नहीं होगा.

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विस्तार

आलाकमान का गहलोत के लिए यह साफ संदेश है कि अगर कांग्रेस की सरकार फिर से आती है तब भी उन्हें मुख्यमंत्री का मौका नहीं मिलेगा. इस राजनीतिक विस्फोट का सीधा मतलब यह है कि पार्टी ने सचिन पायलट से भविष्य में सीएम की ताजपोशी का मुंगेरी वायदा किया है. कांग्रेस गहलोत को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाकर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना चाहती थी और सचिन पायलट को ताज पहनाना चाहती थी लेकिन राजस्थान के संघर्ष में पांच साल निकल गए.अब चुनाव आ गए तो सचिन पायलट को साधने के लिए अशोक गहलोत को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का काम कांग्रेस द्वारा किया जा रहा है.

कोई मुख्यमंत्री जिसके नेतृत्व में राज्य में चुनाव लड़ा जा रहा है चुनाव बाद की परिस्थितियों में उसको नेतृत्व दिया जाएगा या नहीं दिया जाएगा यह निर्णय तो विधायक दल करता है लेकिन आलाकमान पहले ही यह सार्वजनिक कर दे कि वर्तमान सीएम चुनाव में सीएम फेस नहीं होंगे, इसका राजनीतिक मतलब बहुत साफ है कि गहलोत का राजस्थान की राजनीति में भविष्य लॉक कर दिया गया है. राहुल गांधी के घोड़ा पछाड़ दांव से अशोक गहलोत चारों खाने चित हो गए हैं. यह अलग बात है कि इसका असर राजस्थान के चुनावों में किस तरह से पड़ेगा यह परिणाम ही बताएंगे.

चुनावी राज्यों में सीएम फेस के लिए जोड़-तोड़ और सियासत चरम पर होती है. कांग्रेस में तो चुनाव में धन वही खर्च करता है जो सत्ता आने पर काबिज होने के लिए आश्वस्त होता है. फंड मैनेजर तब तक चुनावी फंड रिलीज नहीं करता जब तक उसे भविष्य की गारंटी ना हो. कांग्रेस जनता को तो गारंटी देने की बात चुनावी भाषणों में बहुत करती है लेकिन अपने नेताओं को ही गारंटी नहीं देती. जो मुख्यमंत्री वर्तमान में कुर्सी पर गारंटीड रूप से जमे हुए हैं उनकी भी वारंटी चुनाव के साथ ही समाप्त कर दी जाती है तो फिर जिन राज्यों में कांग्रेस विपक्ष में है वहां तो सीएम फेस का कोई सवाल ही उत्पन्न नहीं होता है.

कांग्रेस एमपी में भी सीएम फेस पर उलझी हुई है. भावी और अवश्यंभावी के नाम पर समर्थक कमलनाथ को सीएम फेस के रूप में बताने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं. मध्यप्रदेश के कांग्रेस के नेता सीएम के चयन के लिए संवैधानिक स्थतियों का हवाला देते हुए सीएम फेस की बात खारिज करते हैं. यहां तक की कांग्रेस आलाकमान की ओर से अभी तक एमपी में सीएम फेस के बारे में कोई संदेश नहीं दिया गया है.

जिस तरह से राजस्थान के नेताओं की बैठक दिल्ली में हुई है उसी तरीके से एमपी के नेताओं की बैठक दिल्ली में हो चुकी है. बैठक के बाद मीडिया से चर्चा करते हुए राहुल गांधी सीएम फेस के सवाल को टाल गए थे. अशोक गहलोत के बारे में लिए गए फैसले के बाद तो कांग्रेस आलाकमान का साफ संदेश है कि कमलनाथ भी मध्यप्रदेश में सीएम फेस घोषित नहीं होंगे.

चुनाव में विरोधियों से दो-दो हाथ करने के पहले कांग्रेस में नेताओं के बीच में जमावट और तोलमोल का काम चल रहा है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के कई फैसले कांग्रेस आलाकमान द्वारा बदल दिए गए हैं. कुछ जिलों में अध्यक्षों की नियुक्तियों में दिग्विजय सिंह ने बाजी मार ली है. भोपाल और इंदौर में दिग्विजय समर्थकों की जिला अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के निहितार्थ दूरगामी बताए जा रहे हैं. यद्यपि दिग्विजय सिंह बार-बार राजनीतिक रूप से यह कहते रहे हैं कि कमलनाथ के नेतृत्व में ही चुनाव होंगे और वही कांग्रेस का सीएम फेस होंगे लेकिन सियासत में कथनी और वास्तविकता में तालमेल कम ही होता है.

प्रियंका गांधी एमपी में चुनावी अभियान की शुरुआत जबलपुर से कर चुकी हैं. ग्वालियर में उनकी अगली सभा की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. सीएम फेस और फंड मैनेजमेंट के अंतर्निहित राजनीतिक सफर को आसान बनाने के लिए चुनाव के पहले जो राजनीतियां दिखाई पड़ती हैं वह चुनाव बाद एकदम से बदली हुई दिखती हैं. वैसे भी एमपी की  पॉलिटिक्स में युवाओं और उम्रदराज नेताओं के बीच हितों के टकराव के दृश्य दिखाई पड़ते हैं.

चुनावी भविष्य एकजुटता और कार्यकर्ताओं के जमीनी मैनेजमेंट पर निर्भर करता है. सत्ताधारी दल के लिए सत्ता विरोधी रुझान को नियंत्रित करने की चुनौती रहती है. विपक्ष में होने के बाद भी कांग्रेस ने भविष्य की सत्ता हासिल करने की कल्पना और धारणा ऐसे ओढ़ ली है कि बिना सत्ता के ही कांग्रेस को सत्ताविरोधी टकराव का सामना करना पड़ सकता है. कांग्रेस से जुड़े ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं में अति आत्मविश्वास उफान मार रहा है. हर नेता यह मान चुका है कि सत्ता उसकी आ चुकी है. केवल समय की बात है. ऐसे आत्मविश्वास और हालात में कांग्रेस में टकराव भी चुनाव तक बढ़ने की पूरी संभावना है.

विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों का चयन कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकती है. पार्टी ने काफी पहले से ऐसा आभासी माहौल बनाया है कि उनकी सरकार आने ही वाली है. इस आभासी एहसास से मदहोश कार्यकर्ता टिकटों के लिए दबाव बनाने में जुटे हुए हैं. हर विधानसभा क्षेत्र में टिकट के लिए मारामारी साफ-साफ देखी जा सकती है. सर्वे के नाम पर टिकट वितरण में भाई भतीजावाद और पट्ठेबाजी की संभावनाओं से आशंकित नेता राष्ट्रीय स्तर पर जमावट की जुगाड़ में दिखाई पड़ते हैं.

राजनीति की परिस्थितियां और हालात जितनी तेजी से बदलते हैं उतनी तेजी से बदलाव कम ही देखा जाता है. सरकारी धन से जनता को फ्री में लोकलुभावनी योजनाओं का लाभ लुटाने वाले गहलोत ने कभी नहीं सोचा होगा कि उन्हें चुनाव में सीएम फेस बनने से रोक दिया जाएगा. अब कोई लोग तो सीएम बनके सीएम नहीं रह पाते. वर्तमान में जो जी नहीं सकता वह भविष्य के लिए कितने भी सपने संजोए लेकिन उसका वर्तमान हमेशा मन मुताबिक नहीं होता. मन की चाल पर वर्तमान नहीं चलता है. सियासत की चाल तो मन की चाल से भी तेज चलते दिखाई पड़ती है.