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सिविल सेवा कैसे, बन गयी सीएम सेवा? सरयूसुत मिश्र

सार

कार्यपालिका की रीढ़ है नेशनल सिविल सेवा. यह सर्विस क्वालिटी, क्वांटिटी, कनेक्टिविटी और कॉम्पिटेंसी  में लगातार नीचे जा रही है. किसी भी राज्य में देख लें यह सेवा राजनीति की शिकार दिखाई पड़ेगी. जो सम्मान और विश्वास सिविल सेवा के अधिकारियों के लिए कभी हुआ करता था वह आज नहीं दिखता है. जनसेवा के लिए सबसे बड़ी सिविल सेवा दुर्भाग्य से “सीएम सेवा” में कैसे परिवर्तित हो गई ? 

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विस्तार

सिविल सेवक स्वयं को एलिट क्लास मानता है| सामान्य नागरिकों में मिक्स-अप होना और उनके बीच काम करना इस क्लास की तौहीन मानी जाती है| हमने देखा है कि सिविल सेवा का एक भी अफ़सर अगर नियम कायदों को सख़्ती से जनहित में लागू करे तो वह आमूलचूल बदलाव ला सकता है|
 
देश में बहुतायत में ऐसे अफसर रहे हैं जिन्होंने अपने समय में ऐसे ऐसे काम किए जिससे सेवा का सम्मान बढ़ा| मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के दौर की याद कीजिए| लेकिन आज सिविल सेवा के अधिकारियों की निष्पक्षता की कसमें नहीं खाई जाती| सिविल सेवा में राज्यों में सबसे बड़ा पद मुख्य सचिव का होता है|

मुख्य सचिव की संस्था आज कहां पहुंच गई है? सीएस की नियुक्ति आज सिस्टम से नहीं बल्कि सीएम की कृपा और उपकार पर होती है| जब उपकार पर कोई पद मिलेगा तो पूरा कार्यकाल उसका बदला चुकाने में निकल जाएगा| किसी भी राज्य में सीएस नाम की संस्था की कोई पहचान, चमक और परफॉर्मेंस दिखाई पड़ती है? यह संस्था डु एज़ डायरेक्टेड का केंद्र बन गई है| इसे हम क्लेरिकल वर्किंग एट टॉप कह सकते हैं | 
 
आज जिस तरह की चीजें शासन-प्रशासन में हो रही है, उसमें कभी कोई सिविल सेवा का अधिकारी नियम कानून की बात ताकत से रखते हुए दिखता है? मुख्यमंत्री जो चाहते हैं वही प्रशासन के लिए नियम है| मान्यता है सिविल सेवा में ईगो चरम पर होता है| डायरेक्ट और प्रमोटी की फीलिंग भी खत्म नहीं होती| डायरेक्ट रिक्रूट हीरो होते हैं| वह प्रमोटी को विलेन ही मानते हैं|  सिविल सेवा के अधिकारियों में भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति ने भी इस सेवा की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया है| कितने ही सिविल सेवकों (मुख्य सचिव स्तर तक) को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल तक जाना पड़ा है| 
 
“सीएम सेवा” में पूरी सिविल सेवा का समर्पण देखकर इस महान सेवा को श्रद्धांजलि देने का भाव पैदा होता है| देश की सबसे बड़ी सेवा कमोवेश हर राज्य में विभिन्न प्रांतों के अफसरों के गुटों के रूप में चर्चित होती है| पंजाबी लॉबी, साउथ इंडियन, बिहारी और यूपी जैसे मूल राज्य की गुटीय परम्परा साफ साफ देखी जा सकती है| जनसेवा और नवाचार शायद सिविल सेवा से लुप्त हो गया है| यस सर सुनने की आदी सिविल सेवा के अफ़सर यस सर कहने के सिद्धहस्त हो गए हैं| “नो” शब्द शायद अब उनकी डिक्शनरी में नहीं है|  

फ्री योजनाओं से राज्य डूब रहे हैं| लेकिन सिविल सेवा के अफसर ऐसी योजनाओं के खिलाफ मुंह नहीं खोलते| शायद इसलिए कि सीएम साहब योजना चलाना चाहते हैं| राज्य डूब जाए चलेगा, लेकिन सीएम साहब को ना कह कर नाराज नहीं करना है| नेशनल सिविल सेवा के अफसर, प्रशासन के लीडर “चेहरा” होते हैं| जब लीडर ही सीएम सेवा में समर्पित होगा तो नीचे तक का तंत्र वही रास्ता अपनाएगा|
 
सिविल सेवाओं में व्यापक सुधार की आवश्यकता है| क्वालिटी सुधारना होगा, जिनकी परफॉर्मेंस सही नहीं है ऐसे अफसरों को अलग करना होगा| पॉलीटिकल इंटरफेरेंस जनहित की कसौटी तक ही स्वीकार करना उचित है| सिविल सेवा की गरिमा की पुनर्स्थापना आवश्यक है| 
 
रिटायरमेंट के बाद अन्य पदों पर काबिज होने की प्रवृत्ति सिविल सेवकों का मनोबल कमजोर करती है| बाद में कोई पद मिल जाए इसके लिए “सीएम सेवा” की प्रतियोगिता में आगे निकलने की सोच छोड़ना होगा| साधन सुविधाओं के मामले में इस सेवा के लोगों को उदाहरण पेश करना होगा| 
 
सिविल सेवा के पद समय पर भरे जाना जरूरी है| लेकिन यह पिरामिड भी अपने आप नहीं गड़बड़ाया इसके पीछे भी सोची-समझी योजना होगी| प्रशासन की छवि में गिरावट कहां जाकर रुकेगी यह तो वक्त ही बताएगा| सिविल सेवकों को आत्म सुधार करना है|

यथास्थितिवाद भी इस सेवा के सम्मान को लील रहा है| सेवा में इंडक्शन ट्रेनिंग की शपथ को अफसरों को हमेशा याद रखने की जरूरत है| सब कुछ खत्म हो गया है ऐसा नहीं है| लेकिन सिविल सेवाओं के अफसरों ने रास्ता जरूर ढलान का पकड़ लिया है| बुलडोजर शासन की संस्कृति पर भी कभी न कभी सिविल सेवाओं को ही जवाब देना पड़ेगा|