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JDU-RJD का फेल राजनीति विज्ञान दोबारा कितनी दूर जाएगा?

सार

देश में आज दो खबरें काफी चर्चा में हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान इसरो के नवविकसित लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएसएलवी पहले प्रक्षेपण पर फेल हो गया। निर्धारित कक्षा में नहीं पहुंचने से यह उपग्रह अब उपयोग के लायक भी नहीं रहा। दूसरी खबर बिहार में राजनीतिक उपग्रह के प्रक्षेपण की है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बीजेपी से गठबंधन तोड़ पूर्व में फेल हो चुके राजनीतिक यान पर सवार हो रहे हैं। यानी नीतीश ने अब बिहार सरकार बनाने, चलाने और अगला चुनाव फ़तेह करने के लिए जेडीयू,आरजेडी, कांग्रेस के साथ राजनीतिक यान लांच करने की तैयारी कर ली है। 

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विस्तार

नीतीश कुमार को सफल राजनीतिक मौसम विज्ञानी माना जाता है। महाराष्ट्र में शिवसेना में टूट के बाद नीतीश कुमार अपनी पार्टी के टूटने के लिए आशंकित हैं। इसलिए वह नए राजनीतिक यान का प्रक्षेपण करने जा रहे हैं। भारत की राजनीतिक कक्षा में इस यान के सफल होने की उम्मीद बहुत धुंधली दिखाई दे रही है। 

ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि नीतीश कुमार अपनी सारी राजनीतिक जमा पूंजी का उपयोग कर चुके हैं। 17 साल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद नीतीश कुमार बिहार में कोई बुनियादी बदलाव करने में सफल नहीं हो सके। बिहार आज भी अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा है। लालू यादव और नीतीश कुमार की पार्टियां बिहार में जाति की राजनीति के सहारे ही अभी तक चलती रही हैं। मॉडर्न जमाने में जाति की राजनीति कमजोर हो रही है। विकास और कल्याण के एजेंडे पर भारतीय राजनीति काफी आगे बढ़ चुकी है। ऐसे में जातिगत राजनीति का मिशन सफल होना कठिन लग रहा है। 
 
जेडीयू और बीजेपी के बीच में ताजा विवाद पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को लेकर शुरू हुआ है। नीतीश कुमार को ऐसा लगता है कि आरसीपी सिंह पार्टी में बीजेपी के लिए काम कर रहे थे। इसीलिए उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा गया। इसके परिणाम स्वरूप आरसीपी सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा। जेडीयू की ओर से उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों के लिए स्पष्टीकरण मांगा गया। इस पर उन्होंने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार के बीच शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब गठबंधन की बलि लेने तक पहुंच चुका है। 

बिहार के राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि नीतीश कुमार आरजेडी-कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट के साथ मिलकर वैकल्पिक सरकार बना सकते हैं। बीजेपी ने बिहार में अपना जनाधार बढाने के लिए शुरू से ही गठबंधन को प्राथमिकता दी है। नीतीश कुमार आज भाजपा के साथ मिलकर मुख्यमंत्री बने हैं जबकि विधायकों की संख्या बीजेपी की ज्यादा है। 

पिछले काफी दिनों से नीतीश कुमार बीजेपी के साथ दूरी बनाए हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग की महत्वपूर्ण बैठक में भी नीतीश कुमार शामिल नहीं हुए थे। इसके पहले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में तिरंगा अभियान को लेकर हुई देश के सभी मुख्यमंत्रियों की बैठक में नीतीश कुमार नहीं पहुंचे थे। यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के विदाई समारोह और नए राष्ट्रपति के स्वागत समारोह से भी उन्होंने किनारा कर लिया था। 
 
जेडीयू और बीजेपी के गठबंधन टूटने का भले ही तात्कालिक नुकसान भाजपा को दिखाई पड़ रहा हो लेकिन दीर्घकालीन राजनीति के नजरिए से देखें तो इसका खामियाजा नीतीश कुमार को ही भुगतना पड़ेगा। पार्टी को एकजुट बनाए रखना भी नीतीश के लिए बड़ी चुनौती होगी, जो भी राजनीतिक घटनाक्रम बिहार में होगा, वह एक-दो दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।  

राजनीतिक उठापटक के बीच बिहार में गवर्नेंस और विकास का विश्लेषण किया जाए तो जेडीयू की सरकार असफल ही दिखाई पड़ती है। विकास के मामले में बिहार की स्थिति बदतर ही है। नीति आयोग द्वारा जारी विकास के इंडेक्स में बिहार सबसे पीछे है। नीतीश कुमार भी अब बिहार के राजनीतिक भविष्य के रूप में नहीं देखे जा रहे हैं। उनका राजनीतिक सूरज अस्ताचल की ओर है। जो नेता किसी राज्य का 17 साल मुख्यमंत्री रहा हो और राज्य विकास के मामले में फिसड्डी हो तो उस मुख्यमंत्री का भविष्य क्या माना जा सकता है? जोड़तोड़ के गठबंधन से सरकार बनाई जा सकती है लेकिन देश की वर्तमान राजनीतिक हवा अब नीतीश के लिए दूसरे संकेत दे रही है। 

कांग्रेस तो ऐसी परिस्थिति के लिए तैयार ही रहती है। उसके पास जहां भी सरकार में शामिल होकर अपने वजूद को बढ़ाने का मौका दिखता है, वहां वह बिना शर्त खुद ही गठबंधन को तैयार रहती है। महाराष्ट्र में भी इसी तरह का बेमेल गठबंधन कांग्रेस ने किया था, जो अंततः खत्म हो गया। नीतीश कुमार के साथ भी कांग्रेस का राजनीतिक गठबंधन ऐसा ही दिखाई दे रहा है। 

बिहार में करीब तीन साल बाद विधानसभा चुनाव होना है। चुनाव की बात की जाये तो बीजेपी का जनाधार लगातार बढ़ रहा है। बीते विधानसभा चुनाव के बाद यह साफ हो गया था कि बिहार में बीजेपी के विस्तार को नीतीश के साथ गठबंधन से कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा जबकि इसके उलट बिहार में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के कारण नीतीश की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती दिख रही है। ऐसे में नीतीश ही बीजेपी के सहारे दिख रहे थे बीजेपी नीतीश के भरोसे नहीं।