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आत्मबोध से लबरेज ‘चायवाला” वर्सेस “गाइडेड धान रोपने वाला’ कैसे होगा मुकाबला?

सार

राहुल गांधी अपने को खोज रहे हैं या आम आदमी दिखने के लिए फोटो फ्रेम के अवसर खोज रहे हैं, यह समझना थोड़ा मुश्किल हो रहा है. पिछले कुछ दिनों से हर एक दो-दिन बाद राहुल गांधी का ऐसा कोई ना कोई चित्र अखबारों में देखने को मिल जाता है जिसमें वह कभी ट्रक ड्राइवर के साथ यात्रा करते हुए दिखते हैं, कभी मोटर मैकेनिक के पास जाकर कुछ समझते हुए दिखाई पड़ते हैं, कभी ट्रैक्टर चलाते हुए तो कभी धान की रोपाई करते हुए दिखाई पड़ते हैं. राहुल गांधी की यह सारी कोशिश स्वाभाविक से ज्यादा राजनीतिक एजेंडा दिखाई पड़ती है.

janmat

विस्तार

केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को बेदखल करने वाला एक ऐसा लीडर जो 'चायवाला' की आम गरीब की इमेज को आगे बढ़ाते हुए भारत के आम लोगों का भरोसा जीतने में कामयाब हुआ है. उसके मुकाबले के लिए कांग्रेस 2024 में राहुल गांधी को भी कॉमन मैन की इमेज डेवलप करने के एजेंडे पर काम कर रही है. कॉमन मैन के जनजीवन से जुड़े फोटो फ्रेम का पॉलिटिकल गेम राहुल गांधी की इमेज सुधारने में तब तक ज्यादा असरकारी नहीं हो सकेगा, जब तक कि राहुल गांधी को भारतीय राजनीति का आत्मबोध नहीं होगा.

चाय बेचना जीवन की हकीकत थी और धान रोपने का फोटो राजनीति की रणनीति दिखाई पड़ती है. फोटो अपॉर्चुनिटी तो हर नेता निर्मित करता है, उपयोग करता है, लेकिन कुछ फोटो फ्रेम स्वाभाविक दिखते हैं और कुछ फोटो फ्रेम राजनीतिक वास्तविकता का मुकाबला बनावटी रणनीति से करते दिखाई पड़ते हैं.

भारत की राजनीति के प्रथम परिवार में जन्मे राहुल गांधी ने राजनीति और सत्ता के शिखर से अपने जीवन की शुरुआत की है. सियासत और हकीकत का इसके बाद भी आत्मबोध अगर नहीं हो सकता है तो फिर कॉमन मैन बनने का पॉलीटिकल एजेंडा कैसे सफल होगा? जिसके पास जीवन के सारे सुख और साधन उपलब्ध हों उसमें जनकल्याण की दृष्टि का उतरना स्वाभाविक प्रक्रिया है.

यह तभी संभव हो सकता है जब व्यक्ति को इस बात का बोध हो जाए कि वह जिस क्षेत्र में आगे जा रहा है उसकी वास्तविकता क्या है और उसका लक्ष्य क्या है. राहुल गांधी की मेहनत से उनके प्रति जनदृष्टिकोण जरूर परिवर्तित हुआ है. भारत जोड़ो यात्रा और कॉमन मैन दिखने के एजेंडे का सतही तौर से भले ही प्रभाव दिखाई पड़ता हो लेकिन इसके दूरगामी परिणाम मुश्किल ही लगते हैं. राजनीति की सच्चाई देखने के लिए जरूरी है की सहमति और असहमति से ऊपर उठकर देखा जाए.
 
बातें प्रेम और मोहब्बत की और अहंकार का प्रदर्शन जीवन के सत्य को समझने नहीं देता. राहुल गांधी मोहब्बत की दुकान तो खोलना चाहते हैं, मोहब्बत की दुकान नफरत के बाजार में ही चल सकेगी इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहते. मोदी समाज के मानहानि के मामले में सजा, और संसद सदस्यता गंवाने के बाद अभी तक राहुल गांधी को न्यायालय से राहत नहीं मिल सकी है. माफी नहीं मांगने का उनका अहंकार भारतीय संस्कृति और जीवन पद्धति का अनादर ही कहा जाएगा.

भारतीय संस्कृति तो क्षमा याचना को सबसे बड़ा धर्म और व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत स्वीकार करती है. सियासत में तो इंसान के बोल का सबसे बड़ा महत्व है. यह सुप्रसिद्ध गीत जीवन की सच्चाई है कि “एक दिन मिट जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल”. 

जिस तरह के कानूनी विवादों में राहुल गांधी एक सामान्य इंसान दिखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, वह उनके कॉमन मैन दिखने के संपूर्ण पॉलिटिकल एजेंडे को महत्वहीन बना रहा है. इंसान जब अपने प्रति आत्मबोध से भरता है तभी उसमें वह प्रकाश जन्म लेता है जिससे जीवन के दूसरे क्षेत्रों में फैले प्रकाश को आत्मसात कर सके. फिल्मी नायक ऐसे तमाम करुणा और हृदयस्पर्शी दृश्य का पर्दे पर निर्वहन करते हैं. लेकिन जनमानस नायकों को अपना रियल नायक स्वीकार नहीं करता. इसका स्पष्ट मतलब है कि किसी भी दृश्य को देखकर दृश्य के नायक के प्रति जनमानस अपने दृष्टिकोण और विश्वास के आधार को तय नहीं करता, बल्कि उसके जीवन की सच्चाई उस दृश्य से जुड़ी हुई है तभी उस पर जन विश्वास पैदा होता है.

नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुकाबले के लिए कॉमन मैन का कांग्रेस का एजेंडा उनके राजनीतिक इतिहास के कारण भी कारगर होता दिखाई नहीं पड़ता. कांग्रेस कॉमन मैन की समर्थक दिखना चाहती है और इसके विपरीत नरेंद्र मोदी कॉमन मैन के लिए काम कर रहे हैं. केंद्र की आम आदमी के जीवन से जुड़ी योजनाएं आज क्यों बिना कहे ही यह संदेश देने में सफल हो रही हैं कि इसके पीछे आत्मबोध से लबरेज ऐसे लीडर का हाथ है जो खुद आम आदमी की परिस्थितियों से तपकर आगे निकला है. बिना तपे हुए कोई सोना बनने का सपना देखे तो इसका टूटना निश्चित रूप से तय होता है. 

संदेह के आधार पर संघर्ष भी नुकसान ही पहुंचाता है. जब किसी का पूरा विचार दूसरे से लिया गया उधार हो, प्रोफेशनल एजेंसी या पार्टी के एजेंडे पर निर्धारित विचार भी दूसरे से उधार लिया गया हो, तो फिर इसकी मौलिकता अपने आप शून्य हो जाती है. दूसरे को बदलना राजनीति का सामान्य लक्ष्य कहा जाता है, लेकिन खुद को बदलना सबसे बड़ा धर्म है.
 
कांग्रेस के टाइटेनिक को सुरक्षित चलाने के लिए राहुल गांधी 'कॉमन पोलिटिकल मैकेनिक' बनने की कोशिश कर रहे हैं. मोहब्बत से नफरत का मुकाबला नहीं बल्कि इसे प्रेम में बदला जा सकता है. राजनीति का कटु सत्य राहुल गांधी को तभी उद्घाटित हो सकेगा जब प्यार और नफरत दोनों सुनिश्चित धारणा और दृष्टिकोण से उपर उठकर सोचा जायेगा, तभी हर चीज स्पष्ट हो सकेगी. केवल राजनीतिक लाभ के लिए लोभ से प्रेरित कोई भी 'मोहब्बत की दुकान' या 'एजेंडा' भटकाव के अलावा कुछ रचनात्मक हासिल करने में सफल नहीं होता.